00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिननदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रीका के प्रधान संपारक
00:12विद्या वाचस पती गुलाब कोठारी जी का इस पंदन में प्रकाशित आलिक जिसका शीरशक है, कृतग्यता भाव है, श
00:29तग्यता के भाव से जुड़ पाता है। फित अज़ग्य शब्द में शक्ति भी है, पूर्ण नियंतरित कती भी है और
00:36भीतर से उटकर, भीतर तक छूने वाली भावना भी है। जब कि किसी का किया काम मेरे अंतरतम को छू
00:43लेता है, मुझे द्रवित कर देता हैं, तब मेर
00:46आत्मा का एक अंश निकल कर उसके आत्मा का अंग बन जाता है अब्भव पराया नहीं लगता हम भगवान से
00:54कष्ट दूर करने की प्रार्जना करते हैं हमारी आँखे भीगी होती हैं कष्ट दूर होने पर हम लोटकर भी वही
01:02आते हैं उनहीं भीगी पलकों से कृतग्यता के �
01:21।
02:03।
02:04Pravik Gita Cha Ta Kiuriți
02:07Pranding Toambaggas
02:08gains ahi bashi
02:41।
02:50व्यक्ति नत्मस तक हो सकता है, उसी के आगे जो स्वयम के भीतर बैठा है।
02:56कृतग्यता ग्यापित करना जीवन का दिव्यतम पहलू है, जीवन का वर्तमान है और भविश्य का मोक्षवार है, भविश्य के लक्षय
03:04पर द्रिश्टी नहीं है।
03:07वर्तमान के सदुप योग पर द्रिश्टी है, कृतग्यता को आत्म साथ किया जाता है, आजरन का अंग बन जाती है,
03:16इसमें बंधन भी नहीं है, यूँकि इसके साथ किसी फल की कामना भी नहीं जुडित होती।
03:22प्रिश्टी ने गीता में शायद इसी को अकर्म कहा है।
03:52प्रिश्टी नहीं मिलता हूँखार और प्रूर पश्वों में भी यह गुण होता है।
03:57मांसाहारी जीवों की कृतग्यता के उधारन में कथा प्रसिद्ध है, एक शेर के पंजे में काटा चुप जाता है।
04:05तभी एक वनेचर उसे देखता है और उसका कांटा निकाल देता है।
04:09एक बार वनेचर किसी अपराध के कारण कैद कर लिया जाता है।
04:14सजा के तौर पर उसे शेर के समक्ष खाने के लिए रखा जाता है।
04:19सयोबश यह वही शेर था जिसके पंजे से वनेचर ने काटा निकाला था।
04:26शेर ने वनेचर को देखा और पहचान लिया और उसका भक्षन भी नहीं किया।
04:31जीवर में हमें जो कुश प्राप्थ हुआ हैं उसके लिए हमें कृतग्यता का अनुभों करना चाहिए।
04:37प्रति दिन एसी दस वस्तूओं पर द्रिश्टी रखनी चाहिए जिनसे हमें खुशी मिलती है।
04:55नकारात्मक परिस्थितियां तब ही पैदा होती हैं जब हम लंबे समय तर कृतग्यता के भाव में जीते हैं।
05:02We help us in this journey to this journey.
05:09Namaskar
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