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  • 6 hours ago
अतिथि भी प्राकृतिक संयोग

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिजन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादग
00:11विद्या वाचस्पती गुलाप उठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेख, जिसका शीर्षक है अतिथी भी प्र
00:28भुजन करना चाहिए, ये दैविक कर्म है, अतिथी को जिस विशेश उद्देश्य को लेकर भेजा गया, वह तब ही पूरा
00:36होगा, जब व्यक्ति उसका स्वागत करता है, आतिथ्य से उसे प्रसन करता है, उसके आशिर्वाद में सारा भेद छिपा है,
00:44बहुत रहस्य में ह
00:45होते हैं ये देवता, क्या ये स्वयम चल कर आते हैं, जो बुलाये जाते हैं, उनके आने न आने के
00:53ज़्यादा अर्थ नहीं होते हैं, वे जीवात्मा की इच्छा का परिनाम है, उनका आपसी संबंध अपनी भूमी का निभाता है,
01:01जो स्वयम आते हैं, वे अतिथी देव �
01:05नियोजन का अंग होते हैं, विशेश प्रयोजन के साथ भीजे जाते हैं, प्रकृति का एक तत्व है ब्रम्भ, जिसका विस्तार
01:13जगत है, प्रकृति का एक तत्व जीवात्मा है, जो कर्म फल के अनुसार आकरती बदलता रहता है, हर जन्म में
01:22जो पिछले जन्मों के फल �
01:24प्रकृति का एक स्वरूप आकरती है, जो उसके स्वभाव के अनुरूप होती है, प्रकृति की अभिव्यक्ति कामना के मार्धम से
01:33होती है, कामना मन में उठती है, इस थूल शरीर में इंद्रिय, सर्वेंद्रिय मन होता है, सूख्ष्म शरीर में महन
01:42मन होता है, कारण शरी
01:48ॐ ॐ ॐ
02:22इसका एक और कारण भी है हमें पूर्व जन्मों की कर्म भी भूगने पड़ते हैं जिनको हम टाल नहीं सकते
02:30हो सकता है कि हमार हमन अमुख कामना की पूर्ती को राजी नहों फिर भी करना पड़ता है
02:36हम बिमार भी होते हैं दुरगटना ग्रस्त भी होते हैं कौन चाहता है बिना किसी योजना के आते जाते रहते
02:45हैं करते रहते हैं बोलते रहते हैं इन्हीं गतिविद्यों में कई अन्होनी हो जाती है होनी होती है यह होनी
02:54ही प्रक्रति की अभिव्यक्ति है प्रक्रति की एक औ
02:58और अभिव्यक्ति भी है जिसको अंतर मन या इंट्यूजन कहते हैं।
03:02टैलीपैत्थी भी ऐसी ही है।
03:05या किसी भी घटना की पूर्व सूचना हैं,
03:08जो मन में स्वधधः स्फूर्थ उपती जाती हैं।
03:12सूचना या जेदावनी रूप में।
03:15इसी प्रकार किसी समय निकली चर्चा सत्य साबित हो जाती है, एक और स्वरूप है प्रक्रती के भविश्य की तैयारी
03:22का।
03:22राम को वनवास मिला, किसको मालुम था कि इसका लक्षय रावन बद्धा, लंका द्वस्त करना था, बीच में भी अनेक
03:30कार्य हो गए, जिस प्रकार प्रक्रती कुछ कर्म अनायास ही करा देती है, वैसे ही कुछ लोगों से भी अनायास
03:37ही मिला देती है, जो आगी चलकर महत्व
03:40व्यकून साबित होते हैं, जैसे राम से मिले हनुमान, इसके लिए प्रक्रती संयोग तै करती है, ऐसे ही कभी कभी
03:49कोई व्यक्ती आपके पास चला आता है, कुछ मांगने के बहाने ही सही, कोई घर के बाहर खाना मांग रहा
03:56हो होता है, तब हम क्या उस और ध्यान देते हैं,
04:00अधिकांश बार नकार देते हैं, जबकि शास्त्र कहते हैं अतिथी देवो भगा, यह अतिथी कौन सा देवता होता है, यह
04:08भिमाया का ही जाले, पती पत्नी भी पहली बार अतिथी के रूप में ही मिलते हैं, बाद में एक दूसरे
04:15के भविश्य निर्मान में सायोगी हो जा
04:18संतान भी अतिथी ही है, जीवन में उसकी भी भूमी का महत्वफून ही है, भले ही वह स्वतंत्र जीव हैं,
04:26जीवन भर व्यक्ति स्वयम भी अतिथी बनकर चलता जाता है, और लोग भी अतिथी रूप में मिलते हैं, और जीवन
04:34में कुछ न कुछ जोड़ देते हैं, प्रक�
04:45Kama Shah, Vyakti Kekshar, Akshar, Avya Bhakke Niyantah hai.
04:50Mool mein toh Tino bhi Adithi hi hai.
04:53Prakrati hi ha'mare Prakratik Jeevan ka Sanchalan karthi hai.
04:57Putr ho, Atva Shishya.
04:59In ko bhi Adithi rup mein hi bhejati hai.
05:03Matah, Pita aur Guru toh kival Pratna hi kar sakate hai.
05:07Bhagyashali Adithi ke liye.
05:09Issi prakara Dainik Jeevan mein bhi Adithi ka utna hi bada mahatwa hai.
05:14Voha eek prakratik saiyog ban kar aata hai.
05:17Vriddhan, Mahila, Vigari, Saadhu atva sahayyatri ban kar prakat ho ta hai.
05:23Or kisi vishish swarup mein jeevan se jude jata hai.
05:27Adhiktaar, ha'm avsar ko pahachan nahi paathe.
05:30Pyaakti aaker jala jata hai.
05:32Jeevan ke kai pрашna anuptarit rahe jata hai.
05:35Namaskar.
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