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  • 6 weeks ago

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्तान पत्रिकाथ के प्रधान संपादक
00:10विद्या वाचस पती गुलाब कोठारी जी का शरीर ही रमभान श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आले, जिसका
00:29रस तथा माया को बल कहा जाता है, स्रिष्टी में जो कुछ दिखाई देता है वह ब्रह्मु का ही विवर्थ
00:35है, इसमें से माया भाव के हटते ही फिर से पुरुष भाव ब्रह्मु में लीन हो जाता है, यही कारण
00:42है कि स्रिष्टी को पुरुष प्रधान कहते हैं, इसका ए
00:58ुपुरुष प्रधान श्रिष्टी का आधार है। इसलिए ही पुरुष की भोगता संग्या है।
01:04जब भी अगनी सोम अथ्वा रस बल से स्रिष्टी होती है। इसमें यदि रस की प्रधानता हो तो उसे मन
01:11प्राण वाप कहते हैं।
01:17सत्वगुन प्रकाश्रुप प्रजोगुन प्रभरतिकारक तथा तमोगुन आवरक हैं।
01:23मन प्राण वाप में भी प्राण क्रिया वाचक है, सत और तम निश्चल है।
01:302. When the three kinds of senses are in their way, it is said he says.
01:373. When the 3 kinds of senses are in their way, it is what we make.
01:44The love of the mind is the love of theเปeth.
01:52ुરહહજતા પરહહત્તી કામ੍લા પ્રહથના પ્રહહય૫ કામાલાં કહે પ્રહહતી હેતું સ્વહહહહતી સ્વહહ�
02:22इनको आत्म साथ नहीं कर लिया जाता, तब तर प्रजा की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
02:27इस थूल जगत में भी यग्य में पत्नी के योगत का भिप्राय यही है।
02:32पत्यूर्णो यग्य सयोगे इस पाणिनिय सिध्धान्त के अनुसाय यग्य में योग होने से ही पत्नी शब्द निश्पन्र होता है।
02:40बिना पतनी के यग्या अपून रहता है
02:43शत्पत राम्मन में पातनीवत ग्रह याग भी इसी संदर्भ को विवेचित करता है
02:49यहां केवल साथी की उपस्थिती नहीं, बलकि यग्या के पूनता भाव की भी अनिवार्यता है
02:55पतनी भी यजमान की उर्जा, समर्पन और ग्रहस्थ जीवन की पूनता की दियोतक महत्वपून इकाई है
03:03याग्यक प्रक्रिया में पातनीवत ग्रह एक विशेश पात्र है, जो अगनी और देव पतनियों को समर्पित होता है
03:11रिग्वेट में पातनी व्रत का अर्थ यज्यकी प्रक्रिया में पती पतनी के सावं ही कल्यान भाव से हैं, जहां दोनों
03:19मिलकर यज्यक को पून करते हैं
03:21मूलतह यह सोम्याग है, यागी प्रक्रिया में इस अनुष्ठान को 40 ग्रह पात्रों से पून किया जाता है, जिसमें 38
03:30ग्रह आगनेय हैं, विशात्मक हैं, 49 ग्रह पात्निवत ग्रह कहलाता है, जो सौम्य है, योशा है, और 40 हरी योजन
03:40ग्रह चंद देविता से संबद्ध है
03:42यह मूलतह इंद्र प्राण का दियोतक है, इंद्रो बई मरूतह, शुती वचन के अनुसार मरूत प्राण ही इंद्र है, गर्भ
03:50प्रतिष्ठा और गर्भ चुती, दोनों ही अवस्थाओं में यह मरूत प्राण विशेश सहयोगी है, इसको मातरिश्वा वायू भी कहा जात
03:58है, साथ ही यह गर्भ काल में भी गर्भस्त की रक्षा करता है, 38 ग्रह पुरुशत्व, वीर्य और इस्थिरता के
04:07प्रतीक है, यह 38 सुक्ष्व धाराय हैं जो बीज के भीतर छिपी सभी श्त्रिष्टी शक्तियों को एकत्रित करती हैं, इस्त्रिपात्र
04:16इस्त्रित्व गर्
04:28है, जहां पुरुश धाराय इस्त्रि पात्र में प्रवेश करती हैं, यू तो इस्त्रि पुरुश दोनों में सखी 40 गर्भ रहते
04:35हैं, किन्तु पुरुशों में पुरुश गर्भ प्रधान रहते हैं, इस्त्रियों में इस्त्रि गर्भ प्रधान रहते हैं, पुरुश गर्
05:02state. This is a part of the soul. This soul is ancient.
05:10This soul is superior to the soul.
05:10The soul is better than the soul.
05:14The soul is equal to being a soul.
05:17The soul is more than the soul.
05:19It is the soul.
05:19This soul is the soul.
05:22The soul is the soul.
05:26पात्नी वत्त ग्रह यग्य अधुरा रहता है, अत्हयग्यों में देव पत्नियों को भी शामिल किया जाता है।
05:33इन 38 ग्रहों में 36 रिष्टी की जड़ सनरशना से जुड़े हैं और दो तत्व प्राण और चेतना हैं।
05:4136 ग्रहों में 5 महाभूत, 5 तनमात्र, 10 इंद्रिया, 4 अंतह करण, प्राण वायू, 3 गुण, 4 आत्म तत्व समाहित
05:50रहते हैं।
05:51ये 40 पात्र सोम के सुख्ष्म रूपों के प्रतीत हैं।
05:55जो गर्भ में मात्रिक कर्म, पित्रिक कर्म और जीवात्मा की प्राण धुकों मिलाकर शिशों के भविश्य का निर्मान करते हैं।
06:044th pateleon Me Hara Soam Jab Santulit Hota Haen, Tab Shrishthi Karta Haen,
06:09Or Jab Asantulit Hota Haen, Tog Shaya Karta Haen.
06:12Shatpat Brahman Me Ka Ka Haya Hai, Soomo Vai Reta Ha.
06:16Yagya Me Soam Ras Nikal Na, Or Usai Pateleon Me Bharna Vashuta Ha,
06:20Vijya Ko Garbh Me Ishthaapit Karne Ka Vyadik Roo Pa Khe.
06:24Garbh Me In 38 Dharatao Ka Prabhav Moolat Ha,
06:27Tien Guhoon Sae Prabhavit Rhe Ta Ha.
06:29गर्भ में हर्प्षण में देव और असुर्भावों का संघर चलता रहता है यह बाहरी युद्ध नहीं बलकि मा के भीतर
06:37चलने वाली सूक्ष्मक्रिया हैं
06:39सत्व प्रधान अवस्था में शिशु को समय पर पोशन मिलता है अंग प्रत्यंग ठीक बनते हैं मा का मन शांत
06:47और भय मुक्त रहता है प्रसर समय पर और सहज प्रक्रिया से होता है राजिसिक अवस्था में गर्भु में असामान्य
06:55रूप से तेज या कम हर्चल महसूस की जा
06:58सकती है मा में चिर्चिडापन, बेचैनी और घबराहट बढ़ने लगती है इस कारण समय पूर्व प्रसव होने की आशंका बढ़
07:06जाती है तमोगुण जब प्रभावी होता है तब आलस्य और साज और नकारात्पक भावी मा को घीरते हैं जिसका सीधा
07:15प्रभाव गर्भस
07:16शिशु पर पढ़ता है उसके पोशन में रुकावट आने से शिशु का पूर्ण विकास नहीं हो पाता विप्रिती की संभावना
07:24बढ़ जाती है व्यद्यकियत रिष्टि से गर्भकाल मूलतह चालिस सप्टह अर्थात दस महीने का होता है संबस्र चक्र में छै
07:33रितूओं
07:34का दो-दो माह का काल माना गया है वसंत वहकाल है जब प्रजनन्ज्ग्य का प्रारंब होता है इसे मधुमास
07:41भी कहते हैं सर्वत्र माधुल्य का वर्षन रक्रति के मात्प्रित्व भाव के प्रसुटन और सृष्टी का कारप काल होने से
07:49यह विश्ष्ठ बन जाता है वसंत
08:04GARBHASTH SHISHU POURN VIKSHIT HOKAR BHUMISHT HOTA HAY NAMASKAR

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