00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिननन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:12विद्या वाचसपती गुलाब कुठारी जी का स्पंदन में प्रकाशित आलेख, जिसका शेशक है स्वयम की स्वयम से पहच
00:21किसी व्यक्ति, वस्तू, आधी के विशिष्ट गुणों के आधार पर उसको जानना ही उस व्यक्ति या वस्तू की पहचान बन
00:29जाती है।
00:50यह साथ ही हमारी पहचान का प्रथम अवसर उपस्थित होता है। अमुकवंश में जन्म हुआ है, यह लड़का है यह
00:57लड़की है, यह पुरुष और महिला, माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी है इसके।
01:03यक्ति की क्या इतनी ही पहचान महत्व कौन है, यह समझना भी आवशक है कि पहचान के अर्थ क्या है।
01:10किस पहचान को हम छोड़ना नहीं चाहते, क्या यह मेरी शरीर की पहचान है, मन, गुध्धी और आत्मा की पहचान
01:18है, समप्रदाय या खांदान की पहचान है, समाज में मेरी भूमिका की पहचान है, मेरी विधा या कला की पहचान
01:25है, तब दश्न उत्ता है, मैं कौन हूँ
01:28How could your family come from this house?
01:33I didn't know, my family is my house.
01:39That's why my family came from me,
01:40what is my family?
01:41How did my family come from here?
01:49My family became 33% of my family.
01:53कौन-कौन से देवता ने इस निर्माण में भूमी का निभाई ?
01:58तब क्या मेरी पहचान मेरा देवता है ?
02:01विश्णु हो इसा मसीर हो महावीर हो अत्वा मुहम्मद हो
02:05क्या इनकी शक्तियां मेरे जीवन में प्रवेश करके मुझे पहचान देती है ?
02:09तब प्रश्ण उठता है कि मेरी पहचान मेरा आत्मा है अथवा मेरा देवता इश्वर
02:15क्या मेरी आत्मा के अलावा भी कोई पहचान हो सकती है ?
02:19नहीं हो सकती है
02:20पहचान तो आत्मा से ही बनेगी
02:22वही तो मेरा सुख्ष्ण स्वरूप है जो शरीर में रह रहा है
02:27इसको समझे बिना व्यक्ति अपनी कोई पहचान नहीं बना सकता
02:30बिना आत्मा के क्या शरीर, मन और बुद्धी को जीवन की पहचान कहा जा सकता है
02:36मेरा परियाय तो आत्मा ही है
02:39मनुष्य के जीवन का एक बड़ा संगहर्ष पहचान के लिए ही होता है
02:43घर में, समाज व्यापार में और अन्य करियर में
02:47आज तो पहचान का यह संगहर्ष पति-पत्नी के बीच में बड़ा हुता जा रहा है
02:51माता पिता को छोड़कर जो पती के साथ जीने को आई वह पति से भी संगहर्ष कर रही है
02:58उसे पति की पहचान मनजूर नहीं है
03:01पती के घर में पती की मर्जी के खिलाफ रहना चाहती है
03:04नई जीवन शैली में यह बड़ा संगर बनता जा रहा है
03:08विकास की अत्वा पहचान बनाने की एक ही शर्ट है
03:12जीवन का लक्षयत दय करना
03:14इस संकल्प से सारे कर्मधी लक्षित हो जाएंगे
03:18सारे भाव सकारात्मक हो जाएंगे
03:20इससे हमारी पात्रिता बढ़ती जाएगी
03:23अनावश्यक विशय जीवन से बाहर निकल जाएंगे
03:25विकास की गती स्वतह ही तेज होगी
03:28व्यक्ति नियमित रूप से विकास का आकलन भी करने लगेगा
03:32समझने की बात यही है कि
03:34यह विकास शरीर या मन का नहीं होता
03:37आत्मा का ही होता है
03:39व्यक्ति अपनी क्षमताओं को समझते हुए
03:42इनका विकास भी करने लगता है
03:43इस विकास में धन, पद या परिवाद ही
03:46तभी सहयोगी रहते हैं
03:49जब इनका उप्योग भी सकारात्मक होने लगता है
03:52हमारे सामने एक विकल्प है
03:54कि हम आत्मा के माध्यम से
03:56पुरुशार्थ द्वारा
03:57अपनी पहचान बनाये
03:59अत्वा किसी देवता के आगे समर्पन करके
04:02आत्मा को सो जाने दे
04:04हमारा लख्षियर तो आत्मा का विकास करना है
04:07नर से नारायन हो जाना है
04:09नर और नारायन आत्मा के ही दो भाग हैं, साथ रहते भी हैं, चुकि हमारे अध्यात्म में कतिविधियां लगातार बदलती
04:18रहती हैं, अधिकांश्त हम बहिर मुखी बनते रहते हैं, अतह हम इंद्रियों के ही विश्यों में उल्जे रहते हैं, भीतर
04:26की अनुफूतियां हो ह
04:28जीवन एक पक्षिय हो जाने से सकारात्मक्ता तथा स्वयम की प्रतिजागरुपता तो रहती ही नहीं है, मैंने किसी को अपने
04:37बारे में अपने आप से बात करते नहीं देखा, जो विकास के पत्फर बने रहते हैं, वे ही अपनी पहचान
04:43बना पाते हैं, बाकी नाम इतिहा
04:45में दर्ज नहीं होते हैं, स्वयम से स्वयम का परिचय होना पहली श़र्त है, इसके बिना किसी अन्य व्यक्ति या
04:53विशय की जानकारी सही कैसे हो सकती है, आप कब किस धरातल से बात करते हैं और क्यों, यह तो
05:00समझ आना ही चाहिए, किसके साथ दिमाग से बात करते हैं, किस
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05:21some of the guys
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