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  • 5 hours ago
सिमट रहा स्त्रैण भाव

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:10विद्या वाचस्पति गुला कुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेग जिसका शीर्शक है, सिवत रहा इस्त्रे
00:29अपरा प्रक्रती इस्थूल है, शरीर मन बुद्धी है, द्रिश्यमान है, परा सुक्ष्म अद्रिश्य प्रक्रती है, प्रक्रती स्वभाव को कहते हैं,
00:38माया रित है, सुसुक्ष्म है, अतह सदाही ब्रह्म की तरह अद्रिश्य है, स्रिश्टी सत्यकी करती है, किन्तु स्
00:46foreign
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01:22in the pattern of the Sovu.
01:55Transcription by ESO. Translation by ESO. Translation by —
01:56रशक यंघक कि अग्रेजी साइत्य ना भारतिय दर्शन ना आत्मा की को अधिदेव, बारतिये दर्शन का मूल
02:05ुच्छ्य शिक्षा प्राप्त भारतिय जीवन को खंडित करने का प्रयास किया।
02:18ुच्छ्य शिक्षा प्राप्त भारतिय पलायन करने को उच्छुक रहते हैं।
02:23इतना ही नहीं। अंग्रेजी शिक्षा ने एक और भारतिय दर्शन से विमुक किया।
02:53पुद्धी का एक मात्र आधार और लक्ष्मी की आराधना रह गई।
03:23अंग्रेजी शिक्षा ने की आवशक्ता लगती है।
03:25नहीं मात्रित्वी की लालसा रह गई है।
03:27एक शब्द पैदा हो गया इस देश में लिव इन।
03:31इसका आधार है अमेरिकी अवधारना, use and throw, काम में लो और फैंक दो अरधार इस्तरी एक संसाधन बन कर
03:39रह गई।
03:39सभी घरों से बेघर हो गई।
03:42नहीं शिक्षा ने पुरानी परंपराओं की और आकरामकता दिखाई, मानों माया इस सभ्दा को उजार देना चाहती हो।
03:50नई शिक्षा ही माया रूप है, यही कल्यूप का अंद करेगी, किसका घर उजड़ेगा उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
03:56माया का आसूरी स्वरूप चारों और दिखाई पड़ता है, हर डूबने वाले को उपलप्ज हो रही है, युद्धुभूमी की सबसे
04:04बड़ी फसल, मुक्त इस्त्रियां ही होती है।
04:07एहंग्विती पर आकरती भी भारी पड़ जाती है, माया मौत का ऐसा कुआ है, जो मानव को अन्य योनियों में
04:14पहुचाता है, ये थोने से पकड़ भी नहीं सकते।
04:17वास्तव में माया इस्त्रि पुरुष दोनों शरीरों में कार्य करती है, दोनों का आधा भाग पुरुष, आधा भाग इस्त्री होता
04:24है, बीतर में पुरुष सौम्य हैं किन्तु अधपका है, तुरंत इस्त्री की और लपक पड़ता है, नई इस्त्री भी उतनी
04:31सौम्य न
05:04ुच्छा नहीं होना ही पुरुष की मृत्यू है।
05:15ज्यान का अभाव, स्वा की अज्यानता ही पुरुष को बंधक बना देती है।
05:19शक्ती भीतर के स्वरूप को कहते हैं।
05:21पुरुष शून्य और इस्त्री शक्तिमान हो चली, अब वह आसुरी संस्था पर प्रहार करने लगी।
05:27भिन्य भिन्य स्वरू, भिन्य भिन्य देश ही उसके आयूद होते हैं।
05:31पुरुष के विवर्थ को रोक कर यूग का अंत करने को आतुर लिखाई पड़ती है।
05:37माया फिर भी निराकार है, अस्तित्म हीन है उधर, पुरुष की निर्भरता कर्म पर है, धर्म पर है।
05:44कर्म फल ही भाग्य है, पुरुष आर्थ का लक्षे ही मोक्ष है।
05:48पुरुष ब्रह्म का आश्रह है, विवर्थ के लिए शरीर धारन करता है।
05:52माया उसे मोह के आवरण में चिपाती है, पुरुष कर्म की सहायता से इस बंधन से मुक्त होता है, विद्या
05:59को साधन बनाता है, श्रेय और प्रेय दोनों से मुक्त होना सीख लेता है, गीता का लक्षय मोह के आवरण
06:06को हटाना, पैराग्य बुद्धी योग इस्थापित करत
06:12देना है, तब माया को मौन एवम शांत होना पड़ता है, माया पुरुष का भाग्य तय करती है, कर्म फलों
06:19के अनुरूप, पुरुष उससे भी आगे बढ़कर नया भाग्य बनाने का प्रयास भी करता है, स्वयम प्रक्रति उसकी भाग्य के
06:27अनुरूप, उसकी व्यत्तित
06:57.
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07:03. . . .
07:28पाराशर के संग होकर उसके पुत्र को जन्म देकर भी उसके साथ इसलिए नहीं नहीं क्योंकि उसकी पिता ने उसे
07:35समझा रखाता कि सन्यासी से विवाह नहीं करना है।
07:58अतहर केरियर भोगने में ही अपना स्रैन्ड सुख मात्रित्र वात्सल्य माधुर्य आहुत कर देती है। उसका आत्मा कहीं और होता
08:07है।
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