00:01नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान सब्बादक,
00:10विद्या वाजस्पती गुलाव कोठारी जी का शरीर ही व्रम्हान श्रिंखना में पत्रिकायन में प्रकाशित आले, �
00:17जिसका शीशक है रम्ह के अवतरन में देव योग, मानव की देह का निर्मान एक असाधारन प्राप्रोतिक प्रक्रिया है, जिसमें
00:25सिष्टी के सभी तत्र शामिल रहते हैं, चूंकि यग्य से ही अधिदेव और अध्यात्म का योग होता है, अतह जो
00:32भी प्रक्रिया आत्म
00:33के निर्मान में काम आती है, ठीक वैसी ही प्रक्रिया शरीर निर्मान में भी काम आती है, मूल में तो
00:40यह ग्रम प्राण का ही विवर्थ है, ब्रम का प्रथम आवरित स्वरूप अव्य पुरुष कहलाता है, यही मूल प्राण है
00:48जो समस्तर विश्व में व्याप्त रहता है
00:50चेतन प्राणियों में यह अध्यात्म कहलाता है, जड़ पदार्थों में वह अधिभूत कहा जाता है
00:57और देवताओं अर्थात किंद्रिय आधी में रहने वाला अव्या पुरुष का अंश अधिलेव कहलाता है
01:04वेदों में गर्भधारन को मात्र एक जैविक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता
01:09यह एक पवित्र कर्म माना गया है, ब्रह्म महद योनी में चेतन गर्भ की स्थापना करता है
01:15मम योनिर महद ब्रह्म तस्मिन गर्भम दधाम में हम
01:19जड़ चेतन के संयोग से ही सभी भूतों की उत्पत्ति होती है
01:23गर्भाधान यग्य हेतु ब्रह्म स्वयम बीज प्रदाता बनता है
01:27और सभी प्राणियों की रिद प्रदेश में प्रतिष्ठित होता जाता है
01:32इश्वरह सर्व भूतानाम रिद देशे अर्जुन दिष्ठति भामयन सर्व भूतानी यंत्रा रूरानी मायया
01:40गर्भधारन रंग के अवतरन का मार्थ है
01:43अतह गर्भाधान से पूर्व विविद देवताओं का आभान किया जाता है
01:47रिगवेद और अतर्ववेद में गर्भ प्रक्रिया का बर्णन है
01:51जहां विश्णू, त्वश्टा, प्रजापती, धाता, सरस्वती, सिनीवाली, अश्विनी कुमार, मित्रावरू, प्रहस्पती, इंद्र, अगनी, आदी देव, गर्भ स्थापन से गर्भ चुती
02:03तक विभिन्द कर्भों के सहयोगी बनते है
02:06इनमें विश्णू, गर्धाशे को गर्भ धारन के योग्य बनाते हैं, त्वश्टा, शिच्चू की आखरती करते हैं, प्रजापती गर्भ में प्रजनन
02:15की शक्ती स्थापित करते हैं, धाता, भून को स्थैर्य प्रदान करते हैं, सरस्वती गर्भ की रक्षा करती हैं, सि
02:51ुश्राम, आत्मनिरिक्षन और अगले स्रिजन के लिए उर्जा संचय का काल है
02:56चंद्रमा मन का स्वामी है
02:58इस्तियों का रितुकाल 28 दिन की अवधिका होता है
03:01चंद्रमा का माहभी 28 दिन का होता है
03:05चंद्रमास में 28 रात्रियों में 28 बार चंद्ररस का आगमन होता है
03:12पुरुष शुक्र में उन 28 चंद्ररसों का सहपिंड बनता है
03:16इसी से एक रज्रन चक्र संचालित कूरता है
03:18जिस प्रकार चंद्रमा समुझ में जवार उच्पन करता है
03:22उसी प्रकार चांद्र उंजा, मानव बन और शरीर पर भी प्रभाव डालती है
03:27शुभ चंद्र इस्थिती में किया गया गर्भाधान उच्च कोटी के जीव को आकरशिक करने में सहायक बनता है
03:34यदी चंद्रमा वलवान है और वह शुभ नक्षत्रों के द्वारा देखा जा रहा है तो यह एक स्वस्थ और तेजस्वी
03:42संतान का संकेत है
03:44इसके विपरीत पीडित चांद्र अवस्था शिशु के खराब स्वास्थे का कारण बन जाता है
03:50नारत पुराण में इस पश्ट उल्लेख है कि क्रिश्ण पक्ष में चंद्रमा अनिष्ट कारी हो सकता है अतह इस काल
03:57में गर्भाधान वर्चित माना गया है
03:59गर्भाधान केवल जैविक संतान टापती का यग्या नहीं है बलकि स्वाया म्रम्म के विवर्थ से जुड़ा है
04:08यहां आत्मा को गर्भु में आमंत्रित किया जाता है
04:11गर्भाधान संसकार के माध्यम से किया जाने वाला यह पवित्रतम कर्मशारिरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से
04:19सकारात्मक व दैविय भावों के साथ संपन्न किया जाता है
04:23सुशुत सहिता में रितू, छेत्र, अंबू और पीज इन चार कारकों को महत्मकून माना है
04:30इन में से किसी में भी दूशन होने से गर्भधारन में बाधा संथव है
04:35साथी इनके स्वस्थ होने पर भी अनेक बार गर्भधारन नहीं होता
04:40शास्त्रों के नुसार इसमें विश्वर्य इच्छा और प्रारब्ध का भी योग होता है
04:45श्रीमत भागवत में कहा गया है कि जैसे खेत में वीज बोने पर भी अंकुरन नहीं होता
04:51वैसे ही गर्भधारन परमात्मा की माया शक्ति के अधीन है
05:05माता पिता ही नहीं जीव के संदर्भ में भी कारद कारे करता है
05:09प्रिश्ण भी कह रहे हैं कि है अर्जुन मनुष्य जिस भाव को स्वरण करता हुआ अंतिम समय में देखत्यागता है
05:17वह उसी भाव को प्राक्त कर लेता है
05:20जीव के पूर्व कृत कर्म गी तै करते हैं कि वह कौन सी योनी में जन मिलेगा
05:25किस परिवार का हिस्सा बनेगा
05:27कितनी आयू का भोग करेगा
05:29किन परिस्थितियों वह विध्यों से उसका जन्म होगा
05:33चुकि गर्वधारन करना एक इस्त्री के जीवन का मूल उदेश्य होता है अतहव उने मात्रित्व लाग हेतू पुरुष्ट से जुड़ती
05:42है विवाह संसकार के द्वारा
05:44जदी वह प्राक्रतिक रूप में संपन्न प्रक्रिया से गर्वधारन नहीं कर पाती तो भी उसके मात्रित्व के पोशन हेतू विविद
05:52विधियों का विधान मिलता है
05:54काचीन समाज व्यवस्था में मंत्र शक्ति और नियोग प्रतात से संतती प्राक्ति के अनेक उधारन शास्त्रों में मिलते हैं
06:02महाभारत में राजापांडू, उद्रित, राष्ट और विधुल ये तीनों महशी वेदव्यास से उत्पन हुए
06:08इनमें मीज एक किन्तु माताएं भिन्न थी, सत्यवती ने वल्ष विध्य हेतु वेदव्यास को नियोग हेतु न्यूट किया था
06:16पुनह मंत्र शक्ति से कुन्तिव मात्री को पुत्रों की प्राक्ति हुई थी
06:21क्या सौ पॉर्वों की उत्पति को आज की IVF तखनीक का पुरू रूप नहीं माना जा सकता
06:28जहां गर्भ पिंड को सौ टुकडों में विभाजित कर कल्शों में रखा गया और शत्पुत्रों की प्राक्ति हुई
06:40साथ ही समाज व्यवस्था में नियोग के स्थान्ति पर सरोगेसी को अपनाया गया है
06:46सामान्य गर्भ धारन में अंडानू वशुकरानू का यूग इस्त्री शरीर में होता है
06:51जबकि IVF में यह प्रयोग शाला में परफनली में होता है
06:55ढूण बनने के बार यह घरवाशय में पत्यारूपित किया जाता है
07:00सरोगेसी में जैविक मातापिता मिन होते हैं
07:03तथा ढूण को अन्य स्त्री के गर्भ में रखा जाता है
07:07क्या कृष्न के भाई बलराम के जनौ को सरोगेसी पत्दत्ति से हुआ बाना जा सकता है
07:13भागवत में उल्लेक मिलता है कि भगवान ने योग माया से कहा था कि देवकी के गर्व में मेरा अश्वरू
07:20पुशेश है उसे बिना किसी कटनाई के रोहिनी के गर्व में स्थापित कर दो
07:27गर्वाधान किसी भी प्रक्रिया से हुआ हो आत्मा का प्रवेश समान नियम के अधीन है जीव की दृष्टी से पिता
07:34की गिरासत और मा के संसकार ही अधिक महत्रपून होते हैं
07:39पिता का बीच तो सभी परिस्सितिओं में समान रहता हैं किंतू गर्वुक्षेत्र के परिवर्टन से विधी के अनुरूप संथान के
07:47संसकारों में अंतर आता है
07:49Ayurved and Gita are the teachers of the women and during theCTP.
07:59The teachers are the teachers of the degree of weight.
08:01The teachers are the teachers of the units.
08:04These teachers are the teachers of the Messiah.
08:25ुच्वल भविष्य है
08:35अपनी पारिवारिक प्रिष्ट भूमी पर कारों से जोडती है
08:40जैविक मा भगवती भाव से संकल्पित होकर
08:44शिशु में दैविय गुणों का विकास करती है
08:46ताकि उसकी भगवत्ता सुद्रिण हो सके
08:50नमस्कार