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00:01यूस्फ सलाहुदीन अमीर जन्जार की साधिशों से बेखबर अपनी फौजी मश्कों में मसरूफ था फिर जब वो सूरच की तमाज़स
00:09से जुलसे हुए चेहरे शम्शीर जनी की मुशकत से तूटे हुए बदन के साथ अपने घर आया तो एक अजियतनाक
00:15हंगामा उसका मु
00:19असतुदीन शेर कोह और जबैदा जमा थे यूस्फ सलाहुदीन इस कदर ठका हुआ था कि वो इशा की नमास पढ़कर
00:26फौरी तोर पर सो जाना चाहता था
00:28मगर मुलाजमा ने बताया कि मरदाना नशिस्त गाह में उसका इंतिजार किया जा रहा है
00:32यूस्फ ने बिला ताखिर अपने जंगी हत्यार उतारे और तेजी से उस कमरे में दाखिल हो गया
00:38यूस्फ सलाहुद्दीन का ख्याल था कि वहां सलतनते शाम के मौजजजीन या उम्रा जमा होंगे
00:43मगर खिलाफ तवक्व कमरे में उसकी वालिदा वालिद और चचचा मौजूद थे
00:48यूस्फ ने हैरस से उन लोगों की तरफ देखा और एक तरफ खामोशी के साथ बैड़ गया
00:54जबैदा और असतद्दीन के चेहरों पर गहरी संजीदगी और किसी गदर अदासी चाही हुई थी
00:59मगर नजम الدین अयूब के चेहरे से शदीद नागवारी का इजहार हो रहा था
01:03अभी यूस्फ सूरत हाल को समझने भी नहीं पाया था कि नजम الدین अयूब की तेज अवास कमरे में गुंजी
01:09यूस्फ मुझे तुम से ये उमीद नहीं थी कि तुम बद एहदी करोगे
01:14और बाप की नाफरमानी के मुर्तकिब होगे
01:16ये कहकर नजम الدین अयूब ने अमीर जंजार की पूरी गुफटगू बेटे के सामने दोहरा दी
01:21नजम الدین अयूब असद अद्दीन और जबैदा का ख्याल था कि इस इनकिशाफ पर यूस्फ घबरा जाएगा
01:27लेकिन हैरतंगे सौप यूस्फ की इस्तकामत में कोई फर्क नहीं आया
01:32उसने इंतहाई मौदब और ठहरे हुए लहजे में नजम الدین अयूब को मुखातिब करते हुए कहा
01:37बाबा मुहतरम अमीर जंजार की फराहम करदा इतलाद हर्फ बहर्फ दुर्स है
01:43शारिया तरके दुनिया करके उस्तादे गरामी के मदर्से के एक गोशे में जा पड़ी है
01:48मैं कभी कभी उससे मिलने चला जाता हूँ
01:50बस इससे जदा किसी बात में कोई सदाकत नहीं
01:54मेरा सवाल ये है कि तुम उससे मिलते ही क्यों हो
01:56नजम الدین की आवास से गुस्सा जलक रहा था
01:59मैंने उस बदनाम कनीज के अपने घर आने पर पाबंदी लगाई दी
02:03मगर तुमने उससे मिलने का दूसरा रास्ता तलाश कर लिया
02:06उससे बदनाम कनीज ना कहें बाबा महतरम
02:09युस्फ का लहजा अदास हो गया था
02:11वो एक मजलूम लड़की है जो अमीराना मजालिम का शिकार होकर रुस्वाई का हदफ बन गई है
02:17और अब तुम उसी कनीज के हवाले से मेरी रुस्वाई का सबब बन रहे हो
02:20नजम الدین अयूब की नाराजी और लहजी की सक्ति में मजजीद इदाफा हो गया
02:26असत अद्दीन अपने बड़े भाई और भतीजे की गुफ्तकू बहुत गौर से सुन रहा था
02:30मैं उस लड़की से मिलने पर मजबूर हूँ बाबा
02:33यूस्व सलाउदीन का लहजा बदस्तूर अदास था
02:36तुम्हारी यही मजबूरी तो गुमराही के रास्ते की निशानदे ही कर रही है
02:40नजम الدین अयूब बेटे के इस जवाब पर हखजबनाक हो गया
02:44आखिर वो कौन सी मजबूरी है कि जिसके बाइस तुम अपने कदमों को इस तरफ जाने से नहीं रोक सकते
02:50नजम الدین अयूब ने बड़ा मुश्किल सवाल कर दिया था
02:53यूसफ सलाहुदीन के चेहरे पे शदीज जहनी कश्मकश के आसार नुमाया हो गया
02:57और वो फौरी तोर पे अपने बाप के सवाल का जवाब ना दे सका
03:01असदुदीन और जुबैदा भी पलके छपकाए बेगर यूसफ की तरफ देखने लगे
03:05जो अचानक बहुत ज़्यादा परिशान नदर आने लगा था
03:08तुम्हारी यही खामोशी तो मुझरिम होने की दलील पेश कर रही है
03:11नजम الدین अयूब ने इंताई सक्त लहजे में कहा
03:14आखिर यूसफ के होटों को जुम्बिश हुई
03:16उसकी आँखें जुकी हुई थी और आवाद में हलकी सी लड़क़डाहट थी
03:20मैं चाहता था कि आप मेरी खामोशी का मफ़हूम समझ ले
03:24और अपने बेटे की बेगुनाही पर एतबार कर ले
03:26मगर अफसोस ऐसा नहीं हुआ
03:28बिल आखिर मैं लबकुशाई के लिए मजबूर हो गया
03:31मुझे यकीन है कि आप मेरी इस बेबाकाना गुफटगू को माफ फरमा देंगे
03:36ये कहकर यूसफ चन्द लमों के लिए खामोश हो गया
03:39असद दिन और जबैदा घबरा गए
03:41कि यूसफ के लहजे से सरकशी का रंग जहलक रहा था
03:44ये तो बात की बात है
03:46कि तम्हारी गुस्ताकी को माफ किया जाए या उस पर सजा दी जाए
03:49बाप के लहजे में वही तुंदो तेजी और नाराजी थी
03:53पहले तुम अपनी मजबूरी की वजाहत करो
03:56यूसफ ने सर जुकाए हुए कहा
03:59शारिया हासादी तोर पे मेरी महबत में गरफतार हो गई है
04:02इसी महबत ने उसे काजी अबने अरसूं की दर्सगाह तक पहुँचाया
04:06ताके वो खुद को किताबों के मुताले में गुम कर दे
04:09और सुकून दिल हासिल कर सके
04:11यूसफ की गरदन बदस्तूर जोकी हुई थी
04:14और उसकी जुबान से अलफास तूट कर अदा हो रहे थे
04:18शारिया की बस एक ही खुआश है कि मैं कभी कभी उसे अपना चेहरा दिखा दिया करूँ
04:21बस यही वज़ा है कि मैं जब भी उस्ताद गरामी की खिद्मत में हाजिर होता हूँ
04:26तो कुछ देर के लिए इस गम जदा खातून के हुजरे में भी चला जाता हूँ
04:29तुम अपनी इस हिमाकत का अंजाम जानते हो नजम الدین अयूब ने घजब नाक लहजे में कहा
04:35तुम ही क्या मालूम कि हमने किस कदर जान विशाने के बाद अपनी जान को खतरात में डाल कर सुल्तान
04:40अदिल का कुर्ब हासिल किया है
04:42अमीर जंजाज शुबा जासुसी का अफसर आला है
04:45अगर उसने ये बात सुल्तान अदिल के कानों तक पहुँचा दी
04:49तो हमारी इजज़त का ये महल एक लम्हे में जमीन बोस हो जाएगा
04:52मैं सुल्तान अदिल के एसानात को आकरी सांस तक फरामोश नहीं करूंगा
04:57यूसफ ने सर उठाया
04:58मगर इज़त और जिल्लत तो अल्लह ताला के इक्तियार में है
05:02मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया
05:19रहूंगा
05:19यूसफ ने किसी हिचकेचाहट के बगएर पूर एतमात लहजे में कहा
05:23अगर किसी इनसान को मेरा चेहरा देखने से सकून की चंद सांसे मयसर आती है
05:28तो ये मेरे लिए इंतहाई खुशी का मकाम है
05:30मैं इसे खिद्मत खल्क समझता हूँ
05:33यूसफ सलाहुदीन का जवाब सुनकर जबैदा और असातुदीन के हुटो पर मसकरहाट उभर आई
05:38और उनके चेहरे खुशी से दमखने लगे
05:41अगर में तुमें हुकम दूँ कि इस कनी से मिलना छोड़ दो
05:44नजम الدین ऐयूब के लहजे में वही सक्दी थी
05:47अगर मैं शारिया से वादा ना कर चुका होता तो बिला ताखिर आपके हुकम पर अमल करता और जिन्दगी भर
05:53इस पर काइम भी रहता यूसफ ने बावकार लहजे में कहा
05:57मैं आकी फिद्रत को जानता हूँ यूसफ इसका काम जलाना है बेटे का जवाब सुनकर रंजमुदीन अयूब कुछ और घजबनाक
06:06हो गया था
06:06मजबूरन मुझे इस चिंगारी को बुझाना ही पड़ेगा
06:09नजमुदीन अयूब के बिगड़े हुए तेवर देखकर जबैदा और यूसफ भी परेशान हो गए
06:14मगर असतुदीन ने मदाखलत करते हुए पूछा
06:17ब्रादरे मौजब चिंगारी को बुझाने से आपका मफ़ूम क्या है
06:23मैं इस फरेब कार कनीज को शाम की हदूद में नहीं रहने दूँगा
06:27नजमुदीन अयूब का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था
06:30मैं सुल्तान अदल से दर्खास करूँगा कि मेरे खानदान को इस फितने से निजात दिलाई जाए
06:36नजमुदीन के इस फैसले पर यूसुप बेकरार हो गया
06:38बाबा महतरम इस से पहले कि आप सुल्तान अदल से शारिया की शेहर बदरी के लिए दर्खास करें
06:44मैं आप से इलतिजा करता हूँ कि इस मजलूम लड़की पर अल्ला की जमीन तंग ना करें
06:48काजी सहब की दर्खा में इसे गोशाए आफियत हासिल है
06:52अगर शारिया वहां से निकाल दी गई तो फिर उसे कहां पना मिलेगी
06:56वो बहुत मासुम और गयरतमन लड़की है
06:58अमीर इबन मरकूम ने उस पर मजालिम ढढ़ाय थे
07:01फिर आप में नतीजा देखा
07:03वो कोर्जदा अमीर बस्ती से बाहर पड़ा हुआ है
07:05और लोग उस पर तर्स खाकर भीक की रोटी के चंड टुकड़े डाल जाते है
07:09ये सब एक बे सहारा लड़की के दिल अजारी का नतीजा है
07:13बराह करम उसे इस हाल पर छोड़ दिया जाए
07:16यूसफ के लहजे में दर्द शामिल था
07:19असद्द्दीन ने तारीफी नजरों से भतीजे की तरफ देखा
07:22और पिर अपने बड़े भाई नजम الدین अयूब से मुखाब हुआ
07:24बरादर मौजब मेरी भी यही गुजारिश है के आप अपने लाइख तरीन बेटे की गिरदार पर एतबार करें
07:30और इस मज़़ूम लड़की को इस के अंदाज से जीने दें
07:34अगर आपने शारिया के सिलसले में सुल्तान अदिल पर किसी قسم का दबाओ डाला
07:38तो मैं इसकी भरपूर मज़ामेहत करूंगा
07:40ये कहते कहते ऐसाद अद्दीन के लहजे में किसी قدر सक्ती आ गई थी
07:44जैसे वो अपने बड़े भाई को तंबी कर रहा हो
07:47छोटे भाई की बात सुनकर नजम الدین अयूब कुछ घबरा सक गया
07:51वो अच्छी तरह जानता था कि असाद अद्दीन को सुल्तान नौर अद्दीन महमूर जंगी के हुजूर में सबसे ज़ादा कुर्बत
07:58हासल है
08:00मजबूरन नजम الدین को नरम होना पड़ा
08:02ताहम उसने असाद अद्दीन से एक नया सवाल कर डाला
08:05पिर तुम्हारी नजर में इस मसले का क्या हल है
08:08मेरे नजदीक ये कोई मसला ही नहीं कि जिसका कोई हल तलाश किया जाए
08:12असाद अद्दीन ने बेनयाजाना मस्कुराते हुए कहा
08:16बिल फर्स ये कोई मसला है तो इसका वही हल है जो यूस्फ ने पेश किया है
08:21Aasatuddin کی مداخلت نے صورتحال کو یکسر بدل کر رکھ دیا تھا
08:24پھر یہ طویل گفتگو اس نتیجے پر ختم ہوئی
08:27کہ نجم الدین ایوب میں یوسف کو یہ قسم کھانے پر مجبور کر دیا
08:31کہ وہ کسی بھی حال میں ترکی کنیس شارعہ سے شادی نہیں کرے گا
08:36امیر زنجار کی شکایت پر سلطان نور الدین زنگی نے
08:39قاضی ابن عرصوں کو تنہائی میں طلب کر کے تمام صورتحال بیان کر دی
08:44قاضی صاحب نے نہایت سکون اور اتمنان سے سلطان عادل کی گفتگو سنی
08:48پھر ان طالب علموں اور اہل محلہ کو خلوت میں طلب کرنے کی درخواست کی
08:53جن کے بقول قاضی صاحب کے اس عمل سے مدرسے کا تقدس پامال ہو رہا تھا
08:58اور عدالت آلیہ کا وقار بھی
09:01پھر جب وہ گوہ سلطان نور الدین زنگی کی حضور میں پیش ہوئے
09:05تو جلال سلطانی سے ان کے جسم کافنے لگے اور زبانیں لڑکھڑانے لگیں
09:09پھر ان سب نے سلطان عادل کے سامنے زمین پر اپنے سر رکھ دئیے اور رو رکھ کر کہنے لگے
09:14کہ انہیں امیر زنجار نے دینار و درہم کا لالش دے کر جھوٹی گواہی پر اکسایا تھا
09:19اس کے بعد قاضی ابن عرسو نے سلطان عادل پر یہ راز بھی فاش کر دیا
09:23کہ پہلے امیر زنجار شارعہ کو کنیز بنانا چاہتا تھا
09:27پھر وہ شادی کرنے پر آمادہ ہو گیا
09:29اور جب شارعہ نے شادی سے انکار کر دیا
09:32تو وہ اس مضموم حرکت پر اتر آیا
09:34کہ میں خوفزدہ ہو کر اس بے سہارا لڑکی کو اپنے مدرسے سے نکال دوں گا
09:38اس طرح امیر زنجار کی بلحوسی کا منصوبہ تکمیل تک پہنچ جائے گا
09:43اس انکشاف پر سلطان نور الدین زنگی کا غصہ ناقابل بیان تھا
09:47ان جیسے قوت برداش رکھنے والے تاریخیں انسانی میں بہت کم پیدا ہوئے ہیں
09:52مگر اپنے ایک متمت امیر کی اس ناشائستہ حرکت کی تفصیلات سن کر ان کے جذبات بے قابو ہو گئے
09:58اور چہرے سے ایسا قہر جھلکنے لگا جیسے وہ ابھی امیر زنجار کے قتل کا فرمان جاری کر دیں گے
10:04پھر دوسرے دن سلطان عادل نے اپنے دربار آراستہ کیا
10:08جس میں تمام عمرہ اور سالاروں کو سختی کے ساتھ جمع ہونے کا حکم دیا گیا
10:13کسی کو کچھ خبر نہیں تھی کہ ایسا کیوں کیا گیا ہے
10:16عام طور پر حاضرین دربار کا خیال تھا کہ سلطان عادل کو کوئی خاص جنگی مہم درپیش ہے
10:22اسی لیے ہنگامی اجلاس طلب کیا گیا ہے
10:25پھر جب تمام عمرہ اور فوجی سالار جمع ہو گئے
10:28تو سلطان نور الدین زنگی نے انتہائی پر جلال لہجے میں امیر زنجار کو مخاطب کیا
10:33جو عمرہ کی اگلی قطار میں بڑی شان اور غرور کے ساتھ بیٹھا ہوا تھا
10:38زنجار میرے قریب آ اور تخت کے نیچے کھڑا ہو جا
10:41سلطان نور الدین زنگی کا لہجہ نہائی تحقیر آمیز تھا
10:46سلطان عادل کی پر حیبت آواز سن کر دربار پر سناٹا چھا گیا
10:50اور امیر زنجار کے چہرے سے وحشت ٹپکنے لگی
10:53پھر وہ لڑکڑاتے ہوئے قدموں سے اٹھا اور تخت کے قریب جا کر کھڑا ہو گیا
10:58حاضرین دربار کے سامنے اپنا شجر نصب بیان کر
11:01سلطان نور الدین زنگی دوبارہ غضبناک لہجے میں امیر زنجار سے مخاطب ہوئے
11:06بلند آواز میں اہل دربار کو بتا کہ تیرے باپ دادا کون تھے
11:12سلطان عادل کا حکم سن کر کچھ دیر کے لیے امیر زنجار کو سکتہ سا ہو گیا
11:16وہ سلطان نور الدین زنگی کے اشارے کو سمجھ گیا تھا
11:19فوراں ہی ہاتھ جوڑ کر گڑ گڑانے لگا
11:21سلطان عادل میں آپ کے کرم کا طلبگار ہوں
11:25مجھے اس طرح سرے دربار زلیل اور رسوہ نہ کیا جائے
11:28تجھے جز بات کا حکم دیا جا رہا ہے اس پر بلا تاخیر عمل کر
11:32سلطان نور الدین زنگی کا لہجہ مزید غضبناک ہو گیا تھا
11:36اہل دربار کے سامنے بیان کر
11:37کہ تیرے بذرگوں کا تعلق کس محترم خاندان اور کس معزز قبیلے سے تھا
11:43رحم کی درخواست مسترد کر دی گئی تھی
11:46مجبوراں امیر زنجار حاضرین دربار کے سامنے مڑا
11:49اور تمام عمرہ اور فوجی سالاروں اور شعبہ جاسوسی کے
11:53اعلیٰ افسروں کو مخاطب کر کے کہنے لگا
11:56حاضرین دربار جان لیں کہ میرا تعلق ایک کم ترین خاندان سے ہے
12:00جس کے تمام افراد سود کات کر اپنے گزر و اوقات کیا کرتے تھے
12:04اور ان کی معاشرتی حیثیت یہ تھی کہ بڑے قبائل کے لوگ
12:07انتہائی حقارت کے ساتھ میرے باپ دادا کو جلاہا کہہ کر پکارتے تھے
12:12امیر زنجار کا اعتراف سن کر تمام حاضرین اپنی اپنی جگہ سہم سے گئے
12:16کسی کی سمجھ میں نہیں آ رہا تھا کہ سلطان عادل نے امیر زنجار کو
12:20اپنا ماضی بیان کرنے پر کیوں مجبور کیا بس چار افراد یعنی قاضی ابن ارسون
12:26نجم الدین ایوب اسد الدین اور یوسف ہی اس راست سے باخا بڑھ تھے
12:30کہ امیر زنجار کے ساتھ یہ سلوک کیوں کیا جا رہا ہے
12:34جب امیر زنجار اپنا شجرہ نصب بیان کر چکا تو سلطان نور الدین زنگی
12:39اس سے مخاطب ہوا اسلام نے تجھے عزت اور سر بلندی بخشی پھر تُو نے
12:44بدترین ناشکری کی اور اسلامی قوانین کا ہی مداق اڑانے لگا
12:48جوش و غضب میں سلطان عادل کا چہرہ سرخ ہو گیا تھا
12:52اور ان کی پر حیبت آواز سے پورا دربار گونج رہا تھا
12:55میں نے تجھے شعبہ جاسوسی کا آلہ افسر نامزاد کر کے
12:59اسلامی سلطنت کے رازوں کا امین بنایا
13:01اور تُو نے کیسی بدترین خیانت کی
13:04کہ ایک مجبور لڑکی کو اپنی حوث کا نشانہ بنانے کے لیے
13:07سادش کا اتنا گہرہ جال بنا
13:09کہ قاضی ابن عرسون جیسی شخصیت بھی اس لپیٹ میں آگئی
13:12اللہ میری اس کوتاہی کو معاف فرمائے
13:15کہ میں نے تجھ جیسے بے اعتبار شخص کو اہم ترین منصب پر فائز کیا
13:19اس کے بعد سلطان نور الدین زنگی نے امیر زنجار کے لیے
13:23بڑی عبرتناک سزا مقرر کی
13:25اور اس کا موں کالا کر کے شہر کے اطراف میں گھومیا
13:28اب نجم الدین ایوب کو بھی یقین ہو گیا تھا
13:31کہ وہ ترکی کنیز کوئی معمولی لڑکی نہیں
13:33اس کی دلازاری کرنے والا کوئی سردار سزا سے محفوظ نہیں رہا
13:37پھر امیر زنجار کو اس کے عہدے سے معزول کر کے قید خانے میں ڈال دیا گیا
13:43انتاکیا کا عیسائی حاکم ریمن اپنی بھتیجی ملکہ ایلینر سے بہت سا سونا لے کر واپس آ چکا تھا
13:49اور بڑی رازداری کے ساتھ ایک مضبوط فوج تیار کر رہا تھا
13:53پھر وہ پانچ ہزار منتقب سوار لے کر حلب کی طرف بڑھا
13:57پھر جیسے ہی سلطان نور الدین زنگی کے جاسوسوں نے خبر دی
14:00سلطان تین ہزار سواروں کے ساتھ حلب سے نکلے اور انیب کے مقام پر خیمہ زن ہو گئے
14:05ریمنٹ کا لشکر یہاں پہلے ہی پہنچ چکا تھا
14:09اکیس سفر پانچ سو چوالیس ہجری کو دونوں لشکروں کے درمیان جنگ چھڑ گئی
14:13ریمنٹ کو اپنے اسلحے اور سپاہیوں کی کسرت پر ناس تھا
14:16سلطان نور الدین زنگی نے اپنی پرانی جنگی حکمت عملی کے تحت
14:20لشکر کو دو حصوں میں تقسیم کر دیا
14:23ایک کی نگرانی وہ خود کر رہے تھے
14:25اور دوسرے کی قیادت اسد الدین شہر کوہ کر رہا تھا
14:28شہر کوہ کا طریقہ یہ تھا کہ وہ ہر جنگ میں یوسف کو اپنے ساتھ رکھتا تھا
14:33گزشتہ مارکوں کی طرح اس بار بھی عیسائی سپاہی سلیب کے خاطر جان دینے کے قسمے کھا کر
14:38مسلمانوں پہ حملہ آور ہوئے تھے
14:40اسد الدین نے یوسف کو مخاطب کرتے ہوئے کہا
14:43اس جنگ میں تمہارا ایک ہی حدف ہے
14:45شہر کوہ نے اپنی تلوار سے عیسائی فوج کے علم بردار کی طرف اشارہ کیا
14:50اس سلیبی جھنڈے کو زمین بوز کر دو
14:53ابھی اسد الدین شہر کوہ کے الفاظ کی گونج باقی تھی
14:57کہ یوسف اپنے دس سپاہیوں کے ساتھ عیسائی فوج کے علم بردار کی طرف جھپٹا
15:01ایک طرف سے سلطان عادل سلیبیوں کے جنگ پر دباؤ ڈال رہے تھے
15:06اور دوسری طرف اسد الدین بڑھ چڑھ کر حملے کر رہا تھا
15:09مگر عیسائی لشکر کسی پہاڑی چٹان کی طرح اپنی جگہ جمع ہوا تھا
15:13یکا جگ سلیبیوں کے صفوں میں ایک شور سا اٹھا
15:16پھر اہل ایمان نے عیسائیوں کے جھنڈے کو گرتے ہوئے دیکھا
15:20یوسف نے سلیبی علم بردار کا بایاں ہاتھ کٹ دیا تھا
15:23اس سے پہلے کہ وہ سملنے کی کوشش کرتا
15:25یوسف کی شمشیر کا دوسرا وار اس کی گردن سے کمر تک اتر گیا تھا
15:29حاکم انتاکیا ریمنڈ جو قریب ہی مسلمانوں سے نبر عظمہ تھا
15:34اس نے بڑی حسرت اور دکھ کے ساتھ سلیبی جھنڈے کو گرتے ہوئے دیکھا
15:37اچانک اسد الدین کی نظر ریمنڈ پر پڑی
15:40وہ اقاب کی طرح عیسائی حاکم پر جھپٹا
15:43اور ریمنڈ کی گڑ جمع ہو کر لڑنے والے محافظ سپائیوں کو کاٹتا ہوا
15:47حاکم انتاکیا تک پہنچ گیا
15:55اس تک پہنچ سکتا ہے
15:57ریمنڈ کچھ دیر تک اسد الدین کی شمشیر خارہ شکاف سے بچتا رہا
16:01مگر ایک وار اتنا پرفریب تھا کہ ریمنڈ اسے سمجھ ہی نہیں سکا
16:06حاکم انتاکیا نے اپنی ڈھال بائیں طرف کی
16:09لیکن شہرکوں نے برق کسی تیزی سے پینترہ بدل کر دائیں طرف سے وار کیا
16:14اور دوسرے ہی لمحے ریمنڈ کی گردن کٹ کر زمین پر گر پڑی
16:17اپنے سردار کا یہ حشر دیکھ کے سلیبی سپاہیوں نے اسد الدین کو اپنے نرغے میں لے لیا
16:23شہرکوں نے تیغزنی کی بے مثال جوہر دکھائے
16:26اور پندرہ بیس عیسائی سپاہیوں کے سر قلم کر دیے
16:29مگر وہ اکیلہ تھا
16:30سلیبیوں کا حسار توڑنے میں ناکام رہا
16:33شہرکوں کئی زخم کھا چکا تھا
16:35اب اسے زندہ بچنے کی کوئی امید نہیں رہی تھی
16:38آخر اس توقع پر
16:39ایک قریب لڑنے والے مسلمان سپاہی اس کی آواز سن لے
16:42اسد الدین شہرکوں نے پوری طاقت کے ساتھ نعرہ تکبیر بلند کیا
16:47یوسف زیادہ دور نہیں تھا
16:49اس نے چچا کی آواز سنی اور اپنے دس سپاہیوں کے ساتھ آواز کی طرف پلٹا
16:53پھر پشت کی طرف سے ان سلیبیوں پر ایک بھرپور حملہ کیا
16:56جو اسد الدین شہرکوں کے چاروں طرف حسار کی ہوئے تھے
17:00تھوڑی ہی دین میں یہ حسار ٹوڑ گیا
17:02اسد الدین شہرکوں شدید زخمی ہو چکا تھا
17:05لیکن تازہ کمک نے اس کے حوصلے بلند کر دئیے
17:07یوسف اور اس کے ساتھیوں نے بیشتر سلیبیوں کو موت کی نیند سلا دیا
17:11باقی جان بچا کر فرار ہو گئے
17:14پھر جب یوسف صلاح الدین چچا کے قریب پہنچا
17:16تو اسد الدین لڑکھڑا رہا تھا
17:19زندہ بعد میرے بیٹے
17:20اسد الدین نے یوسف کو گلے لگا لیا
17:23چچا کے بہتے ہوئے خون سے بھتیجہ کا لباس بھی سرخ ہو گیا
17:26پھر یوسف اسد الدین کو سہارہ دے کر خیمے تک لیا
17:30اس جنگ میں سلطان اول الدین زنگی نے بھی کئی عیسائی سرداروں کو تہہ تیخ کیا تھا
17:35پھر جب ریمنٹ کے قتل کے خبر انگلستان پہنچی
17:38تو شہنشاہ ہنڈی دوم نے سکون کا سانس لیا
17:41اور مسکراتے ہوئے بولا
17:42اس مذہبی جنونی کا یہی حشر ہونا چاہیے تھا
17:45مگر ملکہ کو اس کی موت کا شدید صدمہ تھا
17:48اس نے ایک ہفتے تک سیاہ لباس پہن کر سوگ منایا
17:51رقص و موسرقی سے بھی دور رہی
17:53اور شراب کو بھی ہاتھ نہیں لگایا
17:55بس وہ اپنے چار سالہ بیٹے ریچرڈ سے باتیں کرتی رہی
17:58تجھ پر بے شمار سلیبیوں کے خون کا انتقام قرض ہے
18:02معصوم ریچرڈ کے دل میں مسلمانوں کے خلاف نفرت کی جڑیں
18:06روز بروز گہری ہوتی جا رہی تھی
18:10سلطان نور الدین زنگی کا فاتحانہ لشکر انتاکیہ چھوڑ کر
18:13حلب کی طرف واپس آ رہا تھا
18:15ابھی کچھ لوگوں کے خیال میں سلطان عادل نے انتاکیہ پہ قبضہ نہ کر کے ایک سیاسی غلطی کی تھی
18:20مگر وہ یہ نہیں جانتے تھے
18:22کہ دمشق کے حاکم امیر مجیر الدین نے صلح نامہ چاک کر دیا تھا
18:27اور اب وہ یروشلم کے بادشاہ بارڈوین سے ساز باز کر رہا تھا
18:30یہ خبر سنتے ہی سلطان نور الدین زنگی نے انتاکیہ چھوڑ دیا
18:34اور اپنے دارل سلطنت کی طرف روانہ ہو گئے
18:37سلطان نور الدین محمود زنگی ایک آلہ ذرف حکمران تھے
18:41ان کی زندگی کا مقصد توصیع سلطنت کے بجائے اقتحاد بین المسلمین تھا
18:47یہی وجہ تھی کہ سلطان عادل نے ایک بار دمشق پر قبضہ کر کے
18:51چند شرائط کے ساتھ دمشق کی حکومت وزیر آزم امیر مہین الدین کو واپس کر دی تھی
18:57کیونکہ وہ ایک اسلام دوست اور لائق منتظم تھا
19:00لیکن امیر مہین الدین کے مرتے ہی امیر مجیر الدین نے دوبارہ دمشق کا انتظام سمحل لیا
19:05یروشلم کے شہنشاہ بارڈوین سالس نے امیر مہین الدین کی موت سے بھرپور فائدہ اٹھایا
19:11اور ایک نہایت حسین و جمیل دوشیزہ ہیلینا امیر مجیر الدین کی خدمت کے لیے دمشق بھیج دی
19:17امیر مجیر الدین فطرتاً عوباش حکمران تھا
19:20عیسائی دوشیزہ ہیلینا کو دیکھتے ہی اپنے ہوش و حواس کھو بیٹھا
19:24اس نے اپنی پوری زندگی میں اتنی خوبصورت رڑکی نہیں دیکھی تھی
19:28نتیجتاً امیر مجیر الدین ہیلینا کے دلکش خد و خال میں ایسا کھویا
19:32کہ اسے اپنے گرد و پیش کی کوئی خبر نہیں رہی
19:35ہیلینا اپنے ساتھ بہترین یورپی شرابوں کا بہت زقیرہ لے کر دمشق پہنچی تھی
19:40یہی عیسائی حکمرانوں کا پرانا حربہ تھا
19:43کہ وہ اپنے قوم کی حسین ترین لڑکیاں بھیج کر
19:46مسلمان فرما رواؤں کو دام و حویس میں اسیر کیا کرتے تھے
19:50پھر جب ان کے چٹان جیسے مضبوط آساب پگھل کر موم ہو جاتے
19:53تو عیسائی حکمران ان کی ریاستوں پر قبضہ کر لیا کرتے تھے
19:57یا پھر انہیں اپنا آلائے کار بنا کر ایک کٹ پتھلی کی طرح چھوڑ دیا کرتے تھے
20:01ہیلینا کے بے پناہ حسین اور شاترانہ چالوں نے
20:04چند ہی روز میں امیر مجیر الدین کے دل و دماغ پر قبضہ کر لیا
20:08پھر اسی کی کہنے پہ شہنشاہ یروشلم نے
20:11چند اور خوبصورت حسین عیسائی لڑکیاں دمشق بھیج دیں
20:14ہیلینا کے منصوبے کے مطابق
20:16یہ لڑکیاں دمشق کے فوجی سپس الاروں کے خلوتوں میں بھیج دی گئیں
20:20اب میدان جنگ میں فوجی مشقوں اور رقص شمشیر کے بجائے
20:24بند کمروں میں رقص سراہیوں جام شروع ہو گیا
20:27اور عیسائی لڑکیاں ساقی گری کے فرائز انجام دینے لگیں
20:31دمشق کے وہ فوجی سرار جن کے آہنی ہاتھ کمانے توڑ دیا کرتے تھے
20:36شراب و شباب کے اثر سے اتنے کمزور ہو گئے
20:40کہ وہ بمشکل عیسائی ناظرینوں کے رشمی آنچل کا بوجھ اٹھا سکتے تھے
20:44پھر ایک دن شاہی یروشلم بارون سالس اور والی دمشق
20:48امیر مجیر الدین کے درمیان ایک خفیہ مہاہدہ تیہ پا گیا
20:51اس مہاہدے کے صرف دو بنیاد شقے تھیں
20:55پہلی یہ کہ دمشق اور یروشلم کی حکومتیں ایک دوسرے کے حلیفہ وفادار رہیں گی
20:59ایک پر حملہ دوسرے پر تصور کیا جائے گا
21:03اور دوسری یہ کہ حکومت دمشق یروشلم کو خراشت ادا کرے گی
21:07بعض مورخین نے مہاہدے کی دوسری شرط کا انکار کیا ہے
21:11مگر اس بات پر سب کا اتفاق ہے
21:13کہ امیر مجیر الدین اور شاہ یروشلم بارون سالس
21:16خفیہ طور پر سلطان نور الدین زنگی کے خلاف متحد ہو گئے تھے
21:21سلطان عادل نے ان اطلاعات کے تصدیق کے لیے ایک عجیب حکمت عملی اختیار کی
21:26اسد الدین کی قیادت میں ایک ہزار سواروں پر مشتمل
21:29سفارتی وفد دمشق روانہ کیا گیا
21:32یوسف بھی بطور نائب اس کے ہمراہ تھا
21:36پھر جب سلطان نور الدین زنگی کا فوجی وفد دمشق کے نواہ میں پہنچا
21:40تو اسد الدین کا خیال تھا کہ امیر مجیر الدین کے سرحدی سپائی
21:44اس کے شایانے شان استقبال کریں گے
21:46مگر دمشق کے حفاظتی فوجی دستے نے اسد الدین کا استقبال کرنے کے بجائے
21:52انتہائی بے رخی کا مظاہرہ کرتے ہوئے
21:54سلطان نور الدین زنگی کے سپیہ سالار کو آگے بڑھنے سے روک دیا
21:58اسد الدین کو یہ طرز عمل ناغوار گزرا
22:01مگر اس نے صبر و تحمل کا مظاہرہ کرتے ہوئے
22:04والی دمشق امیر مجیر الدین کو یہ پیغام بھیجا
22:07میں سلطان عادل کے حکم پر ایک سفارتی وفد کے ہمراہ یہاں پہنچا ہوں
22:11اور حاکم دمشق سے ملاقات کا خواہش مند ہوں
22:15پھر جب دمشق کا ایک فوجی افسر اس درخواست کا جواب لے کر واپس آیا
22:20تو جوش غزب سے اسد الدین کا چہرہ سرخ ہو گیا
22:23والی دمشق امیر مجیر الدین نے سفارتی وفد کے قائد کو مخاطب کرتے ہوئے کہا تھا
22:29میرے علاقے کی حدود سے فورا نکل جاؤ
22:31اور اگر مجھ سے ملاقات ہی کرنا چاہتے ہو
22:34تو پھر شمشیریں اور نیزے ہی تم سے ملاقات کریں گے
22:37امیر مجیر الدین کا تحقیر آمیز جواب سن کر
22:41اسد الدین چند لمحوں کے لیے جذبات سے مغلوب ہو گیا
22:44اور اس نے سوچا کہ یہ ملاقات اسی وقت ہو جائے
22:47مگر شہر کوہ کو جنگ کی اجازت نہیں تھی
22:50اس نے بڑی مشکل سے اپنے حالت غزب پر قابو پایا
22:53اس کشمکش میں اسد الدین کا جسم کانپنے لگا
22:56مگر وہ اپنی زبان پر قابو نہ رکھ سکا
22:59اور اس نے جواب لانے والے فوجی افسر کو مخاطب کرتے ہوئے کہا
23:02جس شخص کو سلطان عادل نے پناہ دی اسے یہ لہجہ زیب نہیں دیتا
23:06اپنے امیر کو بتا دینا کہ اس کے الفاظ کی گونج دربارے سلطانی تک پہنچ گئی ہے
23:12اور اس سے یہ ملاقات مش پر قرض ہے
23:14اور ایک غیرتمند مومن اپنے جسم و جام پر کسی کا قرض باقی نہیں رکھتا
23:19یہ کہہ کر اسد الدین واپس چلا گیا
23:21اور دمشق سے چالیس مل کے فاصلے پر خیمہ زن ہو گیا
23:24پھر اس نے امیر مجیر الدین کی انتہائی غستاخانہ اور زلط آمیز حرکت کی ساری تفصیلات لکھر
23:30اپنے بھتیجے یوسف کے سپرد کی اور انتہائی رازدانہ لہجے میں کہا
23:34میرا یہ خط سلطان عادل کی خدمت میں پیش کرو
23:37مگر کسی کو پتا نہ چلے کہ تم یہاں کیوں آئے تھے
23:40یوسف اپنے چچا کا خط لے کے برق رفتاری کے ساتھ حلب کی طرف بڑھا
23:44اور پھر سلطان نوردن زنگی کی خدمت میں اسد الدین کا خط لے کر حاضر ہوا
23:50سلطان عادل اپنی نجی زندگی میں بہت نرم طبیعت کے مالک تھے
23:53خدمتگاروں اور امیروں کی بڑی بڑی خطاؤں سے چشم پوشی کر لیا کرتے تھے
23:57مگر حقوق اللہ اور حقوق العباد کے معاملے میں انتہائی جذباتی اور سقدگیر تھے
24:02اسد الدین کا خط پڑھ کر اس قدر غزبناک ہوئے کہ اپنی نشست سے کھڑے ہو گئے
24:07اور شمشیر کھینچ لی
24:09پھر دمشق کی طرف مو کر کے کہنے لگے
24:11بے شک اب ہماری شمشیریں ہی اسے ملاقات کریں گی
24:14حق تعالیٰ میری اس غلطی کو معاف فرمائے
24:17کہ میں نے ایک بد نہاد و بد اہد انسان پر اعتبار کیا
24:21پھر دوسرے دن ہی نماز فجر کے بعد
24:23سلطان نوردن زنگی ایک لشکر جرار لے کر حلب سے دمشق کی طرف بڑھے
24:28یوسف بھی سلطان عادل کے ہمراہ تھا
24:31سلطان نوردن زنگی حلب یہ فیصلہ کر کے چلے تھے
24:35کہ اب مجیر الدین سے کوئی سفارتی گفت و شنید نہیں ہوگی
24:39اور کسی تاخیر کے بغیر دمشق کی اینڈ سے اینڈ بجا دی جائے گی
24:43مگر اسد الدین سے ملاقات کرنے کے بعد
24:45سلطان عادل نے والی دمشق امیر مجیر الدین کے نام
24:49ایک تفصیلی خط تحریر کیا
24:51آغاز کار اللہ کے نام سے جو نہایت مہربان اور رحیم ہے
24:56اور اسی کی فضل و کرم سے مسلمان ہوں
24:58اور اسی نے مجھے لاکھوں مسلمانوں کی جانوں کا امین منایا
25:01اگرچہ تم اہد شکنی جیسے گناہ کے مرتقب ہو چکے ہو
25:05لیکن میں اعتمام حجت کے طور پر واضح کرتا ہوں
25:08کہ مجھے کسی مسلمان ریاست سے دشمنی نہیں
25:11میری زندگی کا مقصد صرف دشمنانے اسلام سے جہاد کرنا ہے
25:15اور امت مسلمہ کو ان کے وحشیانہ مظالم سے نجات دلانا ہے
25:19اگر میں زمین کا بھوکا ہوتا تو اپنا ماضی یاد کرو
25:23جب میرے لشکر نے دمشق کے ایک ایک گوشے پر قبضہ کر لیا تھا
25:27پھر بھی میں نے صلح کو ترجیح دی اور تمہارا تاج و تقت اسی حالت میں چھوڑ کر شام چلا
25:32گیا
25:32اگر میرے دل میں ہرس و حوث کا کوئی جذبہ بھی موجزن ہوتا
25:36تو تمہاری دستار و کلہ کی دھجیاں اڑ چکی ہوتی
25:40تمہارے شانے گردن کے بوجھ سے ہلکے ہو چکے ہوتے
25:43اور تمہاری ہڈیاں قبر کی گہرائیں میں گل سڑ کر ہم رنگ خاک ہو چکی ہوتی
25:47کوئی فاتحے کسی مفتو کو زندہ آوازات نہیں چھوڑتا
25:51لیکن میں نے اسلامی رواداری سے کام لیتے ہوئے تمہاری سارے غزتاقیاں ماف کی
25:56اور تمہیں تمہاری زمین واپس کر کے خالی ہاتھ لوڑ گیا
25:59یہ سب کچھ اس لیے تھا کہ تم اپنے گناہوں سے طائب ہو کر اسلام کی خدمت کر سکو
26:05مگر اب میں نے سنا ہے کہ تم اسلامی دیاستوں کے خلاف شاہی یروشلم
26:09بارون سالس اور دوسرے عیسائی حکمرانوں سے ساز باز کر رہے ہو
26:14اگر یہ الزام ہے تو بنفس نفیس میرے خیمے میں آ کر اسے غلط ثابت کرو
26:19ورنہ میں تمہارے ساتھ وہی سلوک کروں گا جو دشمنان اسلام کے ساتھ روا رکھا جاتا ہے
26:24میری تلوار دشمنان اسلام کے قتال کے لیے وقف ہو چکی ہے
26:28میں نہیں چاہتا کہ اس سے کسی کلمہ گو کے خون کا ایک قطرہ بھی ٹپکے
26:34پھر جب قاسد حمید الدین سلطان نور الدین زنگی کا خط لے کر والی دمشق کی طرف روانہ ہوا
26:40تو اسا تو دین نے بسد احترام عرض کیا
26:43سلطان عادل میرے لیے وہ لمحہ بڑا عذیتناک ہوگا
26:47جب امیر مجرد الدین آپ کی رواداری کا مزاق اڑائے گا
26:50میرے خیال میں وہ ناقابل اصلاح ہے
26:54ہمیں اللہ کے راستے میں ہر عذیت برداشت کرنی ہوگی
26:57سلطان نور الدین زنگی نے اپنے سپہ سلار کو انتہائی نرم لہجے میں سمجھاتے ہوئے کہا
27:03دعا کرو کہ اس کی نیت بدل جائے
27:05میرے لیے سب سے زیادہ تکلیف دے وہ لمحہ ہوگا
27:08جب مسلمانوں کی تلوارے مسلمانوں کے خلاف اٹھیں گی
27:12پھر وہ سنگین اور عذیتناک لمحہ آ پہنچا
27:15جب سلطان نور الدین زنگی کا خط سن کر
27:18امیر مجرد الدین اس قدر برام ہوا
27:20کہ جوش جذبات میں آ کر تخت سے نیچے اتر آیا
27:23اور سلطان کے قاسد سے خط چھین کر اسے ٹکڑے ٹکڑے کر دیا
27:26قاسد اپنے امیر کے مکتوب کی یہ تحقیر برداشت نہ کر سکا
27:31اور اس نے جھک کر فرش پہ پڑے ہوئے خط کے ٹکڑوں کو اٹھانا چاہا
27:34لیکن والی دمشت نے اس کے موہ پر ایک زوردار ٹھوکر ماری
27:38قاسد اس کے لئے تیار نہیں تھا
27:40مجرد الدین کی ٹھوکر پڑتے ہی وہ اپنا توازن برقرار نہ رکھ سکا
27:44اور دربار کے فرش پر گر پڑا
27:46اس کے ماتھیں اور ہوتوں سے خون جاری ہو گیا
27:49اپنے سلطان کو بتا دینا کہ یہی اس کے خط کا جواب ہے
27:52والی دمشت نے چیخ کر کہا
27:55قاسد حمید الدین اٹھا
27:56تمام دربار پر گہرہ سکوت تاری تھا
27:59بعض ہوشمن عمرہ کو سفیر شام کے ساتھ
28:02والی دمشت کا یہ ناشائستہ سلوک پسند نہیں آئے تھا
28:05مگر وہ مجبور تھے
28:07اور ان کے ہونٹوں پر مہرے لگی ہوئیں تھیں
28:10قاسد حمید الدین نے اپنے چہرے پر ہاتھ پھیرا
28:12نتیجتن اس کا پورا ہاتھ خون سے رنگین ہو گیا تھا
28:16حمید الدین چند لمحوں تک اپنے ہاتھ کو دیکھتا رہا
28:19پھر نہایت بے باکانہ لہجے میں
28:21امیر مجیر الدین سے مخاطب ہوا
28:23والی دمشت کا یہ طرز عمل مردوں کے شایان شاہ نہیں تھا
28:28میں جلالت ماب سلطان نور الدین زنگی کا سفیر ہوں
28:32اور یہ ٹھوکر میرے موپر نہیں
28:34سلطان عادل کے چہرے مبارک پر ماری گئی ہے
28:36یہ کہہ کر
28:37قاسد حمید الدین تیزی سے مڑا
28:40اور پھر اس نے دروازے سے نکلتے وقت
28:42اپنا خون آلود ہاتھ دیوار پر رکھ دیا
28:45امیر مجیر الدین اور دوسرے حاضرین دربار
28:48سفیر شام کی اس عمل کو حیرت سے دیکھ رہے تھے
28:53جیرے تک اسی حالت میں کھڑا رہا
28:55پھر اس نے اپنا خون آلود ہاتھ اٹھا لیا
28:57دیوار پر اس کے ہاتھ کا پورا نقش اُبھر آیا تھا
29:00میں اپنے خون کا نشان چھوڑے جا رہا ہوں
29:03باقی اللہ جانتا ہے
29:05وہ اس خون کا حساب کس طرح لے گا
29:07یہ کہہ کر سفیر شام دربار دمشق سے نکل گیا
29:12حجت تمام ہو چکی تھی
29:13سلطان نور الدین محمود زنگی نے
29:16اپنے قاسد کا زخمی چہرہ دیکھا
29:18چمشیر بے نیام کی اور اپنے لشکر کو دو حصوں میں تقسیم کر دیا
29:21مشرق کی طرف سے اسد الدین نے زبردست حملہ کیا
29:25یہاں تک کہ وہ یلغار کرتا ہوا شہر پناہ تک پہنچ گیا
29:28امیر مجیر الدین کا لشکر مسلسل پسپاہ ہو رہا تھا
29:32یہاں تک کہ وہ شہر کے دروازے بند کرنے پر مجبور ہو گئے
29:35دوسری طرف شمال سے سلطان نور الدین زنگی نے بھرپور حملہ کیا
29:39یوسف کسی محافظ سپاہی کی طرح سلطان عادل کے دوش پدوش جنگ کر رہا تھا
29:44والی دمشق کے لشکر نے یہاں بھی وہی حکمت عملی اختیار کی
29:48میدان سے فرار ہو کر شہر کے دروازے بند کر لئے گئے
29:51اور فصیلوں پر سے آگ برسانی شروع کر دی
29:54تین دن تک یہی عمل جاری رہا
29:57سلطان نور الدین محمود زنگی
29:59زہانہ تو فراست کے ساتھ دشمن کی آگ سے اپنے سپاہیوں کو بچاتا رہا
30:03پھر جب امیر مجیر الدین کے سپاہی کے بازو شل ہو گئے
30:06اور آگ کا طفان رکا
30:08تو سلطان نور الدین زنگی نے ایک فیصلہ کن حملہ کیا
30:12اور شمال کی جانب فصیل میں گہرا شگاو ڈال دیا
30:15پھر اس شگاو سے سلطانی فوج شہر کے اندر داخل ہو گئی
30:18اس وقت سلطان عادل کا پرچم یوسف کے ہاتھ میں تھا
30:22مجیر الدین کی فوج پہلے ہی اپنے امیر سے بیزار تھی
30:25اس نے سلطانی لشکر کو دیکھتے ہی ہتھیار رکھ دئیے
30:28اور نور الدین زنگی سے امان کے طالب ہوئے
30:31پھر کچھ دیر بعد ہی سلطان نور الدین زنگی کے نقیب
30:35دمشق کی شہراؤں پر کھڑے ہوکے با آوازیں بلند اعلان کر رہے تھے
30:39سلطان عادل کا حکم ہے
30:41کہ کسی کے جان و مال کو نقصان نہ پہنچایا جائے
30:44کوئی شامی سپاہی کسی کے گھر میں داخل نہ ہو
30:47زخمیوں کی تیمہ داری کی جائے
30:49اور کسی بھاگنے والے شخص کا تعقب نہ کیا جائے
30:52اس اعلان نے اہل دمشق کے بدحال چہروں پر خوشی کی تیز لہر دوڑا دی
30:57سلامتی ہے ہر اس شخص کے لیے جو اس پرچم کے سائے میں کھڑا ہو
31:01یہ آواز یوسف صلاح الدین کی تھی
31:03جو اہل دمشق کو پکار رہا تھا
31:05پھر دیکھتے ہی دیکھتے
31:07ہزاروں مقامی باشندے سلطان عادل کے جھنڈے کے نیچے جمع ہو گئے
31:11اور ان کی دعاوں کی شور سے پورا دمشق گونج اٹھا
31:14حق تعالی سلطان کو دونوں جہان میں جزائے عظیم دے
31:18کہ ان کی مجاہدانہ کوششوں نے
31:20ہمیں ظالم و بدکار حکمران سے نجات دلائی
31:23والی دمشق نے قلعے کی فصیل سے اپنی شکست کا یہ منظر دیکھا
31:27امیر مجیر الدین کے ساتھ چند عمرہ بھی تھے
31:30اس نے ان پر قہر آلود نظریں ڈالی
31:32پھر شاہی یروشلم بارلون سالس کو مقلزات بکتے ہوئے کہا
31:36وہ میری مدد کے لیے اپنی فوج کب بھیجے گا
31:39کیا عیسائی لشکر اس وقت آئے گا
31:41جب میرے قلعے کی اینڈ سے اینڈ بچ جائے گی
31:44امیر ہم تو قلعہ بند ہو چکے ہیں
31:46کیا خبر کہ شاہی یروشلم اپنی فوج کے ہمراہ
31:49ہماری مدد کو آ پہنچا ہو
31:50اور اس نے دمشق کا محاصرہ کر لیا ہو
31:53دوسرے امیر نے لڑکھڑاتی ہوئی زبان میں
31:55مجیر الدین کو تسلی دیتے ہوئے کہا
31:57اس وقت وہ شراب پیے ہوئے تھا
32:00اور والی دمشق کے برابر کھڑا جھوم رہا تھا
32:03ڈوبتے کو تنکے کا سہارا بہت ہوتا ہے
32:06اس محاورے کے مطابق اپنے امیر کی بات سن کر
32:08والی دمشق کے ہنٹوں پر اداس مسکرہات ابرائی
32:12خدا کرے ایسا ہی ہو
32:13پھر امیر مجیر الدین اپنے وزیروں اور مساہبوں کے ساتھ
32:17قلعے کے محفوظ ترین تہقانے میں چلا گیا
32:19دمشق پر سلطان نور الدین محمود زنگی کے حملے کی خبر سن کر
32:24شاہ یروشلم
32:25بالونس سالس نے اپنے امیر مجیر الدین کی مدد کے لیے
32:28ایک فوجی دستہ دمشق کی طرف فرمانہ کیا
32:31مگر اسد الدین کا دماغ جاگ رہا تھا
32:34اس نے دمشق کے تمام مضافاتی علاقوں کی سخت ناکہ بندی کر دی تھی
32:38بالونس سالس کا لچکر ادھر آیا
32:40تو اسد الدین کے ایک فوجی دستے نے
32:42عیسائی سپاہیوں کا تاقب کیا
32:44سلیبیوں نے فرار ہو جانے میں ہی آفیس سمجھی
32:47وہ معمولی سے مضامحت کے بغیر
32:49اپنی جانیں بچا کر بھاگ گئے
32:51سلطان نور الدین زنگی نے شہر پر قابض ہونے کے بعد
32:54پہلے دن ہی امیر مجیر الدین کو پیغام بھیج دیا
32:57کہ اگر وہ خود کو سلطانی لشکر کے حوالے کر دے
32:59تو اس کی جان بخشی کی جا سکتی ہے
33:01ورنہ قلعے کی بنیادیں کھوٹ ڈالی جائیں گی
33:04اور اسے خفیہ سرنگوں سے کھینش کا باہر نکال لیا جائے گا
33:07امیر مجیر الدین نے
33:09تین دن تک باروین سالس کی فوجی کمک کا انتظار کیا
33:12پھر چوتے دن
33:14قلعے کا دوازہ کھول کر
33:15اپنے چاند عمرہ کے ساتھ باہر نکلا
33:17قلعے کی نگران سلطانی سپاہیوں نے
33:19فوراں امیر مجیر الدین کو
33:21اپنی نرگے میں لے لیا
33:22اور سلطان نور الدین زنگی کے خیمے میں پہنچا دیا
33:25مجیر الدین کا سر جھکا ہوا تھا
33:27اس کی ظاہری حالت مجرموں جیسی تھی
33:29اس نے لرستے ہوئے ہاتھوں سے
33:31اپنی تلوار کھول کر سلطان عادل کے قدموں میں رکھ دی
33:33اور گدہ گھروں کیسے لہجے میں بولا
33:35میں سلطان زیشان کی کرم کا طالب ہوں
33:39مسلمان اپنے اہد پر قائم رہتا ہے
33:42اور تم سے جان بخشی کا وعدہ کیا جا چکا ہے
33:44سلطان نور الدین محمود زنگی نے
33:46نہائید نرم لہجے میں کہا
33:47اس نیک سیرت حکمران کی آواز میں
33:50غرور و تقبر کا شائع بطک نہ تھا
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