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पूरा वीडियो : बाहर गति रहे, भीतर ठहराव || आचार्य प्रशांत (2023)
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Transcript
00:00जो बुद्ध की और उस महिला की कहानी है, जिसका बेटा था, वो मर गया था, बुद्ध ने उसको क्या
00:06दर्शाया था?
00:06उसको लगा चमतकार औगरा कुछ कर देंगे बाबा जी है बेटा लोटा देंगे
00:11वो बुद्ध के पास आ गई कि मेरा बेटा चला गया है वो लेके आई थी अपने
00:14यह है बच्चा है छोटा यह चाहिए वापस चाहिए आप दिलाईए
00:18गुद्ध ने उसको बोला था जाओ और किसी ऐसे घर से थोड़ा सा कुछ लेयाओ
00:22दाल चावल कुछ बोला होगा बोले है किसी ऐसे घर से कुछ लेयाओ
00:25जहां आज तक कोई मोत न हुई हो वो दोड़ी-दोड़ी हर्बढा की दिली कहीं से ले आते हैं
00:31पूछ रही है वहीं पर पता चल रहा है कि हां मौत हुई थी आज नहीं हुई तो दस साल
00:35पहले दस साल पर रहें तो पचास साल पहले हुई थी पर हुई तो थी और वो जमाना जब जो
00:40मृत्युदर थी वैसे ही तब बहुत जादा थी तब तो इतना इंदजार भी नहीं करना
00:58यह होता है, यह होना ही था, तो अकेली नहीं है जिसके साथ यह हो रहा है, ना यह पहली
01:05बार हुआ है ना आखरी बार हुआ है, यहां कोई अपवाद नहीं होते हैं, कोई विशिष्ट नहीं है, हंकार अपने
01:10आपको अपवाद मानता है, हंकार को लगता है मेरे ही साथ हो रहा
01:26अधारा से छिटक करके अपनी कोई अलग यात्रा या अपना अलग वजूद तो नहीं बना सकता, अपने आपको विशिष्ट मानना
01:33ही अहंकार है, अहम माने मैं हूँ, मैं माने मैं अलग हूँ, मैं विशेश हूँ, ना आप अलग हो, ना
01:39आप विशेश हो, जैसे सब हैं वैस
01:41से यह आप हो आपकी कोई अपनी अलग हस्ती है यह नहीं बस बात खत्म और जब आपकी अलग हस्ती
01:47नहीं है तो जानते एक रहत क्या होती है हस्ती मिट भी तो नहीं सकती फिर अलग हस्ती होती तो
01:52मिट गई होती जब अलग हस्ती नहीं है तो मिटेगा क्या हम मरेंगे ही नही
01:57हमना मरे है मरे है संसारा
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