00:00मैं तो गीता देखता हूँ, लोग कहते हैं इसमें 18 अध्याय, 18 योग हैं, मुझे तो एक कृष्ण दिखाई देते
00:05हैं, कहां से तुम 18 तरह के योग ले आओगे, और आप श्री कृष्ण से पूछते हैं, तो वो भी
00:10यही बोलते हैं, कि तुम कहां से ले आओगे कर्म योग �
00:15कौन सा ग्यान है जो बिना भकति के पूरा हो पाएगा, कौन सी भकति है जो ग्यान के बिना अपने
00:23लक्शे तक पहुँच जाएगी, तो यह सब एक ही होते हैं, मन उस्यिक मन अलग-अलग तरीके का होता है,
00:30तो वो क्या करता है। जब उसे प्रेम उठता है, तो अपनी द�
00:36वो जितना समझ पाता है, उसके अनुसार, वो एक कदम बढ़ाता है, उसको बहुत महत तो नहीं देना चाहिए कि
00:45कदम उसने कैसे रखा, क्या बोल कर रखा, महत तो बस इस बात को देना चाहिए कि कदम उसने खरे
00:53प्रेम में रखा कि नहीं रखा, जिनने आप नारायन कह रही
00:58और जिनका चिंतन आप सगुड तोर पर कर रही है। उन्ही को अगर आप आत्मा बोल देंगी तो आप कोई
01:06क्या देगा रही है तो ग्यान मारगी है। तो हम क्यों खेलवार करें शब्दों के साथ।
01:27उसको तुम मुक्ति बोल दो, उसको सत्य बोल दो, उसको ब्रह्म बोल दो, उसको ईश्वर बोलो, नारायन बोलो, हरी बोलो,
01:35विष्णु बोलो, शिव बोलो, तुम्हारी मरजी है जो बोलना है, बोलो गाड बोल दो.
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