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Transcript
00:00इससे बड़ा दुश्मन किसी इस्तरी का नहीं हो सकता ये जो भाव है I need a man in my life
00:06इस्तरी कोई अनुमत ही नहीं दी गई क्यों इस सोच भी पाए कि पुरुष के बिना जीवन हो सकता है
00:11कि अगर पुरुष नहीं है तो मैं क्यों हूँ?
00:12हाई जिन्दगी कितनी सूनी है, बेरोनक है, वीरान है, शम्शान है, कैसे?
00:17जीवन में इतना कुछ है करने को देखने को चार जिन की जिन्दगी है
00:20समय वैसे इतना कम है, उसको किसी सार्था को देशे में डाली है न?
00:24क्या करेंगी किसी इंसान के पीछे भाग भाग के लिपट के क्या करना है क्या करो गया बताओ तो प्रेम
00:30दूसरे से चिपकने में नहीं है जो दूसरे से चिपक राए वो कभी प्रेम नहीं कर सकता वो हिंसा है
00:34दूसरे से चिपकना दूसरे से आ सकते दूसरे पर निर्भर हो �
00:38जाना या दूसरे को अपने उपर निर्भर बना लेना ये सब हिंसा के रूप हैं, अपने आप में संपूर्ण रहिए,
00:44अपने आप में पर्याप्त रहिए, उसके बाद जो रिष्टा बनता है, उस रिष्टे में प्रेम की खुश्बूरी होती है, उस
00:51रिष्टे में हिंसा न
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