00:00काहानी कहती है कि एक बार वशिष्ट राम सीता के महल पधारे
00:04सीता जी को पता चला था कि आ रहे हैं पूझनी हैं
00:08उन्होंने बड़े मनोयोग से मेजाने कितने वेंजन तैयार की
00:11रिशी आये और रिशी के सामने 56 तरीके के अलग-अलग मेंजन रखे गए
00:16पती के गुरू थे सीता ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी
00:19और रिशी ये सब देख रहे हैं जब सब कुछ रख दिया गया तो उन्होंने सब कुछ एक में उलीच
00:23लिया
00:23मिला दिया और खा गये सीता जी को थोड़ा सा कानी कहती है कि बुरा सा लगा
00:29पचास तरीके के वेंजन थे सब मिला दिया है जब भोजन ने त्यादे हो गया तो सीता जी ने कहा
00:34कि
00:35थोड़ा सा स्वाद तो ले लेते हैं उन्होंने नहीं बढ़िया बनाया था बस उड़द वाली दाल में नमक थोड़ा कम
00:40था
00:40संतों का भोजन के साथ बड़ा मधुर रिष्टा रहा है अपने ध्यान को परखने के लिए उन्होंने बहुदा भोजन का
00:49इस्तिमाल किया है
00:50क्योंकि एक बार बात स्वाद की आती है कि आम आदमी का ध्यान बिलकुल हिरा जाता है
00:55संत वो जो भोजन के समय भी उतना ही सतर्क उतना ही ध्यानस्त रहे
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