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Transcript
00:00लोग कहते हैं सबसे ज्यादा सुना पन और अकेला पन लगता है लोगों के बीच में
00:05घरी महफिल में हैं और लग रहा है नितान तकेले हैं
00:0840-40-50-50 साल के रिष्टे हो जाते हैं
00:11उनमें आपस में आज तक क्या बात हुई होती है इसने किस से बात करी
00:15रह रहे होंगे 50 साल से एक साथ आज तक उनमें बात नहीं हुई है
00:20दिन भर एक दूसरे कुछ बोलते रहते हैं पर आज तक उनमें एक भी बार बात नहीं हुई है
00:27लोग मरम ना जाने मुरा क्योंकि कोई तुम्हारा मरम जानी नहीं सकता ना
00:31और तुम वो सब कुछ हो नहीं जो तुम्हें शरीर और समाज से मिला है तुम कुछ और हो
00:35तुम्हारे मरम से माने तुम से माने आत्म से माने आत्मा से तो कोई बात करी नहीं रहा क्योंकि आत्मा
00:42से अहंकार नहीं बात कर पाता
00:43जब वो आज तक खुद से ही नहीं बात कर पाई तुमसे क्या बात करेंगे लोग मरम न जाने मुरा
00:49वो बार-बार आकर के संबोधित किसको कर रहे हैं तुमारे शरीर को
00:54वो तुमसे बात किस भाशा में कर रहे हैं समाज की भाशा में
00:57वो समाज की भाषा में शरीर को संबोधित कर रहे हैं, भयानक अकेलापन है, जिसको ढखने के लिए आसपास कभी
01:05लोग, कभी सामगरी, कभी बादार इकठा किया जाता है, लेकिन फिर भी अकेलापन जाता नहीं है, लोग मरम न जाने
01:12मुरा, चार सो लोग इकठा हैं, उनके �
01:14बीच आप खड़े हो, और कैसे हो, अकेले, साएं साएं जैसे सन्नाटा शम्शान की हवा बह रही हो, कोई नहीं
01:22है असपास, लोग मरम न जाने मुरा, ये हमारे रिष्टों की कहानी होती है, इस कहानी को जो मान लेता
01:33है, कि हाँ है यही कहानी, नहीं लड़ सकता मैं तथ्�
01:37वो फिर क्या देता है, कि लोग मरम न जाने मुरा, जो मैं बौरा, तो राम तोरा, जिनके साथ कोई
01:46रिष्टा बनी नहीं सकता, उनके साथ रहना क्या, रिष्टा है ही नहीं, पंशिरोमणी की ये बातें उनके लिए हैं, जिनका
01:54दिल धणकता है, जो लाश होकर रिष्टे
01:58निभाने के अभ्यस्त हो गए हैं, उनको ये बातें समझ में नहीं आएंगे, ये बातें उनके लिए हैं, जो जिन्दगी
02:05से जिन्दगी मांगते हैं, जिन्होंने जिन्दगी को मौत के रूप में स्विकार कर लिया है, उनको ये बातें महज काव्वे
02:11लगेंगी, किसी कव
02:26अज़ अज़ अज़ अज़
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