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🌄 महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में मढी कान्होबा यात्रा हर साल होली से गुढीपाडवा तक मनाई जाती है।
🎨 रंगपंचमी का दिन सबसे बड़ा दिन होता है, जब लाखों भक्त पहाड़ी मंदिर की ओर बढ़ते हैं।
⚖️ यहाँ सिर्फ भक्ति नहीं, बल्कि मधीची पंचायत में साल भर के झगड़े और विवादों का न्याय भी होता है।
🐴 गधों का बड़ा बाजार और पहाड़ी किले का अद्भुत दृश्य इसे और भी खास बनाते हैं।
🙏 यह यात्रा हिंदू और मुस्लिम दोनों भक्तों के लिए आस्था और सामंजस्य का प्रतीक है।
🌟 आइए जानें इस अद्भुत यात्रा की पूरी कहानी और देखें कैसे लाखों लोगों की श्रद्धा और विश्वास बदलते हैं इस पर्व पर।
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Transcript
00:00होली के रंगों के बीच लगती है दुनिया की सबसे अनोखी पंचायत और फैंसला मानते है सब
00:06महारास्टर की धर्ती पर एक ऐसी जात्रा होती है जहां सिर्फ पूजा नहीं
00:11जहां रंगों के साथ नयाय मिलता है जहां जगड़े खतम होते है
00:14और जहां इनसान अपनी किस्मत बदलने की उमीद लेके आता है
00:18यह कहानी है मड़ी कानवा मंदिर की और नवनाथों से पूजित संत सिरी कानिफ नाथ महराज की पविटर जात्रा की
00:28हर साल होली से गुर्पाडवा तक लाखों लोग जहां आते हैं आस्ता विस्वास और उमीद लेकर लेकिन जह सिर्फ जात्रा
00:36नहीं जह एक जीवित पर्मपरा है
00:38बहुत समय पहले ना संपरदाय के महान जोगी सिरी कानिफ नाथ ने इस पहाड़ी स्थान के अपनी तपस्या के लिए
00:47चुना था
00:47कहा जाता है कि जहां उन्होंने बर्सों तक साधना की उनकी तपस्या इतनी सक्तिसाली थी कि आसपास के लोग उन्हें
00:55जीपित सिद मानने लगे
00:57दीरे दीरे जे सथान सादोगों का केंदर बन गया जहां जाती धरम जा पहचान को कोई बेद नहीं रहा
01:03हिंदू बियाए मुस्लिम बियाए और सबने एक ही नाम लिया कानिफनात महराज जहां से सुरू हुई मड़ी की पनपरा जो
01:12आज भी जीवी था फागुन पुर्निमा का दिन पूरे गाहों में ढोल बसते हैं रंग उड़ते हैं जातरा की शुरुआत
01:18होती हैं बक्त पहाड
01:31चरते हैं जै कानिफराथ की कुझ पहाडों में फैल जाती है फिर आता है सबसे बड़ा दिन रंग पंचमी और
01:38इस दिन मड़ी एक गाम नहीं रहता बे बन जाता है आस्टा का महासागर महरास्टर के हर कोने से लाको
01:45सरधालू आते हैं रंग गुलाल डोल और भक्ती सब एक
02:00जातरा की सबसे नोकी पहचान पूजा नहीं जे है मरिच्ची पंचायत साल बड़के जगड़े परवारिक भीवात समाज के मतवेद सब
02:11जहां लाए जाते हैं अवारा मुक्त और गुपाल समाज के बजूर्ग बैसते हैं कोई कोट नहीं कोई बकील नहीं सिर्फ
02:18पर्मपर
02:29कर लेते हैं जे पर्मपरा आज भी जीवित है बीना कागत बीना कानों सिर्फ बिश्वास से रंग पंचमी के दुरान
02:36जहां लगता है एक अनोखा बिचार गदो का बिशाल मेला हजारों गदो की खरीद विक्री होती है बपारी दूर दूर
02:44से आते है कभी जे पशुक राम
02:46मिन जीवन की रीड हुआ करता था खेती समान ढोना रोजगार इसलिए मड़ी जातरा सिर्फ धानविक नहीं बलकि आर्थिक रूप
02:54से भी वहेद महतबुन भनगी मंदिर पहार के उपस दिथै लंबी सीडिया ठंडी हवा और उपर पहुंसते ही अदबुत सांती
03:02किले से द
03:16मानता है और जहां बिश्वास है बहां नयाए भी संभव है इसलिए मड़ी सिर्फ एक जातरा नहीं जे इंसानियत का
03:23उस्सव है जो हर साल लाखों कदम फिर उसी पहारी के और भड़ते है एक उमीद के साथ कानि नात
03:31महराज हमारी भी सुन लेना
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