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  • 1 day ago

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Transcript
00:03किशन और मोहन दो जिगरी दोस्त थें। दोनों ही साथ पले, बड़े और साथ ही पढ़ाई लिखाई भी की। लेकिन
00:11स्कूल के बाद दोनों अलग हो जाते हैं।
00:30मोहन अपने पिता के साथ उनकी दुकान में हाथ बटाने लगता है। पिता जी मैं अभी किशन की तरह दूसरे
00:36शहर में पढ़ने जाना जाता हूँ। उसकी पिता एक शरावी इंसान थे।
01:00पढ़ने पकड़ा देगा। तु तर राज्जा है राज्जा। अपनी दकार में बैठ बच्चा। पर पिता जी ये गल्ला तोलना मुझे
01:10अच्छा नहीं लगता।
01:12अरे इसी गल्ले को तोल तोल कर तो मैंने तुझे पढ़ाया लिखाया, इस लायक बनाया और आज तुझे ये गल्ला
01:21तोलना अच्छा नहीं लगता।
01:24ये बोलकर वो मोहन को एक जोर का थपड लगा देते हैं। मोहन को थपड से गुसा जाता है और
01:30वो घर छोड़ कर चला जाता है।
01:32एक दो दिन भुखा रहने के बाद मोहन को पिता की बात याद आती है।
01:37ऐसा कौन सा काम है जिसमें खुद के लिए मैनत करना और ज्यादा से ज्यादा पैसा हो।
01:44वो सोच में पड़ जाता है कि तभी उसे घोडों की आवाज आती है। वो एक पेड के पीछे चुप
01:49जाता है और जहां देखता है कि डाकू कैसे एक चादर फैलाते हैं और उसमें धीर सारे सोने के गहने
01:56डाल देते हैं।
01:58डाकू का सरदार बूलता है चलो एक दिन मैनत की अब बाकी के महीने राजा बन कर गुजारेंगे।
02:11सारे जोर-जोर से हसकर वहाँ से निकल जाते हैं।
02:14अरे वहाँ, ये तो सच में बड़ाई अच्छा बिस्दस है।
02:18फिर क्या था, मोहन ने छोटी-मोटी चोरी का काम शुरू कर दिया।
02:23कभी किसी की चैन खीच लेता, तो कभी किसी की पॉकेट मार लेता, उसे इस काम में मजा आने लगा।
02:31वह, ये तो अच्छा काम है, पिता जी ठीक कहते थे, कुछ नहीं रखा पड़ाई लिखाई में, सारा वक्त पड़ो,
02:38फिर किसी और के लिए काम करो, और मैने के अंत में वो पकड़ा देगा चार अठननी, ना बबबा ना।
02:45दीरे दीरे समय बीटता जाता है, और मोहन जाना माना चोर बन जाता है, लोग उसके नाम से काम दे,
02:52और कोई भी पुलिस वाला उसे पकड़ी नहीं पाता, सभी उसका चहरा पैचानते, लेकिन वो कहां रहता है, ये किसी
03:00को पता न था, फिर एक दिन वो भी आ जाता है, ज�
03:15उस शहर में जाता है, और चोराहे में खड़ा हो जाता है, काफी समय तक वो अपने दोस्त का इंतिजार
03:22करता रहता है, लेकिन वो नहीं आता, मैं भी पागल हूँ, किसे 20 साल पहली की बात याद होगी, कुछ
03:32देर इंतिजार करने की बात, वो वहां से जाने लगता है, कि त
03:46अब सुनो, तुम लोगों ने अब मुझे पकड़ ही लिया है, तो क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम लोगों
03:52को ये कैसे पता चला कि मैं यहां आने वाला हूँ, उसमें से एक पुलिस वाला मोहन को एक लेटर
03:58दिता है, मोहन लेटर खूलता है, जिसमें लिखा होता है,
04:02मेरे जिगरी दोस्त मोहन, मैं जानता था, आज दुनिया यहां के वहां क्यों न हो जाए, तुम यहां मुझ से
04:10मिलने जरूर आओगे
04:11आज मन था कि मैं तुम्हें गले लगा लूँ, लेकिन फर्ज की दिवार सामने आ गई
04:16बीस साल बाद तुम एक मुझरिम के रूप में मेरे सामने खड़े थे, माफ करना दोस्त, तेश के प्रती मेरा
04:24फर्ज मेरी दोस्ती के आगे छोटा पड़ गया
04:29मोहन की आखों में अब आशू थे, वो चुपचाफ वहां हातों में हदकड़ी बांधी चला जाता है
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