00:00बो रात जब स्वेम काल महादेव के सामने काम उठा, कहते हैं वो अममस्या की रात थी, केलाश परवड पर
00:07ऐसा सनाटा था कि हवा की अवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी, अचानक पूरे अकाश में काली दडार पड़
00:13गी, जैसे बर्मंट फटने वाला हो, नंदी गभरा
00:16आगे बूत प्रेत चीकने लगे, गंगा की धारा उल्टी बहने लगी, माता पारवती ने देखा महादेव की जटाए सवेम हिल
00:24रही थी, उनकी तीसरी आंग से काला परकाश निकल रहा था, उन्होंने कामती आवाज से पूशा, प्रभु जै कौन सी
00:30सकती जाग उठी है, म
00:44अपने आप जल उठी, और जमदूत आकाश से उतरने लगे, माता पारवती बेवी तो उठी, क्या शरिष्टी समाप तो उने
00:51वाली है, तबी महादेव ने अपना तरशूल उठाया, उनकी तीसरी आंग पूर्ण रूप से खुल गी, एक भयांकर गर्जना हुई,
00:58जिस से क
01:02के दूर गाओं में एक बुड़ी इस्त्री आंसु बहात्ते हुए ओम निमाश्रीवाई जप रही थी, महादेव की डिरिष्टी उस पर
01:09पड़ी और काल की सारी सक्ती राख बन गी, जाद रखना जब अंदेरा सबसे गहरा हो, जब मरिट्यू सामने खड़ी
01:17हो तब एक ना
01:18महाकाल, जै महादेव, हर हर महादेव
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