00:00प्रणाम आचारी जी आचारी जी मैं ठीक से मतलब अपनी बात कॉश्चन को शायद नहीं बोल पाऊंगी
00:12है को मतला कभी कुछ सामने आई नहीं क alliances कि मैं काम करती हूं इसे खर में डब दब कर रहने की तो इसमें नहीं नहीं हुति
00:35गुह बोलने के हो वहां भी ऐसा कुछ गर्स के साथ रहना रहता है तो मैं बहुत मैं बोल नहीं पाती हुआ
00:50थोडा सा हम पैदा होते हैं और बाकी भूध सरा हम बनाए जाते हैं एक आप फोड़े ही चुप रहाना है
01:01आप की माता जी उनकी माता जी उनकी
01:04दादी जी उनकी दादी जी उनकी पर दादी जी उनकी भी टर पर पर सब छुप रहे हैं ऊसर आप में मौजूद
01:13आप इतनी सी हैं और बाकी सारा इतना क्या है अतीत जो हमारे भीतर
01:26सर्जिकली इंप्लांटिट इसको हम संसकार बोलते हैं आप अमेरिका में रहती होती तो आप ऐसी थोड़ी होती
01:40और अगर आप अफगानिस्तान में होती तो इस सवाल पूछने के लिए भी आनी बैठी होती
01:52इस्त्री के स्थिति के मामले में भारत अमेरिका और अफगानिस्तान दोनों के बीच में कहीं पर है
01:57पुरानी चीज़ें एक रास्ते से आपके भीतर आई हैं उन्हीं रास्तों से दूसरी चीज़ों को भीतर प्रवेश कराई है
02:08ठीक है कडाही पर चीज़ें चिपक गई होती है तो उनको हटाने के लिए भी कडाही में कुछ और डालना ही पड़ता है
02:21पहले कुछ डाला था वो चिपक गया अब कुछ डालेंगे जिससे चिपकी हुई चीज हट जाएगी यही करते हो न
02:30जी सर बहुत हिम्मत आई है आपको सुन रही हूं एक साल से लगधा तो बहुत और चार चार शिवरों में भी जा चुकी हूं रिशी के इस एक बार गोवा और यह डैली में तीसरा है तो बहुत आत्मबल बढ़ रहा है
02:49आप में बढ़े और जितना हो सके दूसरों की मदद करिये जी सर आप अकेली नहीं है और न जाने कितने है न उन तक सब तक हाथ पहुँचाईए जितने भी तरीके से हो सके सीमित तरीके से हो सके तो सीमित तरीके से ही सही ठीक है प्रयास करिए कि सब तक
03:17बात पहुँचे, समझ आए, बाकी यह होगा सो, हमें क्या पता क्या होगा
03:36पौरान काल से पहले भारत में इस्तिति बहुत अलग होती थी
03:47जिसको आप आज की सांस्कृतिक स्तिरी कहते हो नहीं यह वैदिक स्तिरी नहीं है
03:56यह सब कुछ शुरू हुआ है भारत में चौथी पाच्वी शताबदी के बाद से जब से पौरान काल शुरू हुआ है
04:04पहले पराणिक काल शुरू हुआ फिर पश्च्चम की दिशा से सब आकरांता आने लग गए
04:13इन सब ने मिलकर वो खड़ी कर दिये जिसको आप आज की भारतिय संस्कृति बोलते हो
04:20जो अगर आप धर्म की ही बात करोगे तो जो भारत की वैदिक महिला है
04:30वो बहुत अलग है आज की महिला से
04:33रुख रविये में, चाल ढाल में, वेश भूशा में, ग्यान में
04:44बहुत खुला हुआ देश था भारत
04:51बहुत बहुत खुला हुआ देश था भारत
04:54ये सब चीजें कि इस्तिरी बोल नहीं सकती, जान नहीं सकती, काम नहीं कर सकती
05:01ताकत नहीं रख सकती, अधिकार नहीं मांग सकती
05:07ये सब तो तीन जगहों से आया है
05:10भीतर से देखो तो पुरानों से
05:14जिसको आप स्मृति सास्त्र बोलते हो
05:18हमने एक बार इस पर विस्तार में बात करी थी
05:22कि शुरुति और स्मृति याद है
05:24तो यह आया है स्मृति सास्त्र से
05:27जो कि वेदों के बहुत बहुत बाद का है
05:32ये भी नहीं कि 100-200 साल बाद
05:34बहुत हजार साल बाद का है
05:37ये आया है स्मृति शास्त्र से
05:40जिसमें ये सब आपकी स्मृतियां आती हैं
05:42और पुराण आती हैं
05:43वहाँ से आया है भीतरी तौर पर
05:45और बाहरी तौर पर आया है आकरांताओं से
05:48जो अफगानिस्तान की दिशा से
05:53तुर्की की दिशा से अरब की दिशा से
05:55वह अपनी संस्कृति लेके आये
05:57और चूंकि युद्ध में वो जीते
05:58तो उन्होंने अपनी संस्कृति
06:01भारत के ऊपर भी लाद दी
06:03और उसके बाद अंग्रेज आये
06:05उनकी भी अपनी उस समय पे Victorian sensibilities होती थी
06:10उनके यहां भी महिलाओं को कोई बहुत उंचा स्थान थोड़ी था
06:15बहुत सारे विक्सित मुल्क हैं अमेरिका जैसे
06:21जिन में महिलाओं को बरावरी का हक अभी हाल में मिला है
06:24भारत में प्रधानमंतरी और राश्ट्रपती
06:34दोनों हो चुकी हैं अब महिलाएं हो चुकी हैं न अमेरिका में आज तक कौन
06:40तो जो पश्चिम से संस्कृते आई और जो अरब से संस्कृते आई
06:50ये दोनों ही प्राचीन भारतिय संस्कृती की अपेक्षा बहुत संकीरिन थी
06:57और इस कारण महिलाओं का वो हाल हो गया है भारत में जो आज आप देख रहे हैं
07:05और इसके लावा हमने कहा है कि भारत के ही भीतर से ये एक पौरानिक धारा निकल पड़ी
07:11उसमें भी महिलाओं का खुब दमन है
07:14नहीं तो आप अगर वेदों के पास जाएंगे या एतिहासिक द्रिश्टे से बिलकुल शुद्ध तथ्यात्मक एतिहासिक द्रिश्टे से
07:26अगर आप इसापूर्व भारत में महिलाओं की इस्थिति का ध्यान करेंगे तो पाएंगे बहुत खुला मामला था
07:36आप जितनी कल्पना नहीं कर सकती हैं उससे ज्यादा खुला मामला था
07:41विचार की सोतंतरता आचरण की सोतंतरता जीवन की सोतंतरता सब थी महिलाओं के पास और पूरा उसका उपयोग करती थी
07:50हम नहीं कल्पना कर सकते उस समय पर कि महिला ऐसी है कि
08:00ये सब तो भारतिय महिला को बना दिया गया थी नहीं ऐसी
08:08तो इसलिए विदान्त है
08:13विदान्त महिला को उसकी आवाज वापस लोटाता है
08:23विदान्त महिला को महिला से ज़्यादा मनुष्य बनाता है
08:41आरी बात समझें
08:42और तुर्रा ये है कि आज हम जिसको अपनी संस्कृति बोलते हैं
08:51और बाब बार बोलते हैं कि हमें भारतिय संस्कृति की रक्षागर नहीं है
08:54वो वास्ताव में भारतिय संस्कृति है ही नहीं
08:57वो तो आकरानताओं की संस्कृति है
09:01जो कि आपके उपर थोब दी गई
09:04आपने उसे स्विकार कर लिया
09:06और अब आप भ्रह्मवश उसको ही अपनी संस्कृति समझते हो
09:11और नारे लगाते हो कि मुझे तो महान भारतिय संस्कृति की रक्षागर नी है
09:16आप जिसको अपनी संस्कृति बोल रहे हो वो आपकी है ही नहीं
09:24आपको वास्तव में अपनी मौलिक संस्कृति जाननी है
09:36पुरान सब इसा काल के बाद के हैं
09:39और कुछ पुरान तो बिलकुल अभी के हैं
09:42सिर्फ कुछ सौ साल पहले के
09:43आपको मौलिक रूप से अगर भारतिय महिला की स्थिति जाननी है
09:49तो इसा पूर्व जाईए
09:51बहुत बहतर स्थिति पाएंगे आप
09:57हो सकता है एकदम समानता न पाएं
10:01लेकिन फिर भी आज की दुर्दशा से बहुत बहुत बहतर स्थिति पाएंगे
10:05और रही सही कसर मनुस्वरिति आदिन पूरी कर दी
10:20यह पुरान और स्मृति
10:25यह दोनों मिल करके स्मृति साहित्य कहलाते है
10:30इन्हें शास्त्र नहीं कहा जाता यह साहित्य है
10:33पुरान और स्मृति मिल करके कहलाते हैं स्मृति साहित्य
10:40शास्त्र मानें सिर्फ शुरुति होता है
10:43शुरुति मानें वेद वेदांत
10:46एक यह बड़ी भारी भूल हो गई भारत में, कि इस मृति को ईशास्तर बोलना शुरू कर दिया, तो पुराणों को उचास्तर बोल रहे हैं, इस मृति को ईशास्तर बोल रहे हैं, यह नहीं शास्तर हो जाते भाई
11:01शास्त्र माने सिर्फ वो जहां बात बस आत्मग्यान की हो रही है
11:13अहम और आत्मा जिसके ये प्रतिपाद्य विशे हो उसको शास्त्र बोलते है
11:18जहां बात मिथ की है और समाज की है और समाजिक नियमों की है
11:25वो शास्त्र थोड़ी कहलाएगा
11:28कि राजा को प्रजा का संचालन कैसे करना है
11:36इसको शास्त्र थोड़ी बोल सकते हो
11:38कि फलाना अपराद करने पर कैसी कैसी सजा मिलनी चाहिए
11:47ये शास्त्र थोड़ी हो गया
11:49कई प्रकार की कहानियां जिनका अर्थ मात्र सांकेतिक हो सकता है
11:59कथाएं उनका संकलन शास्त्र थोड़ी हो गया
12:03शुरुत शास्त्र है
12:12और विदान्त महिलाओं का बहुत अच्छा मित्र है
12:22क्योंकि वो कहता है कि देह से कोई फर्क पड़ता ही नहीं
12:28आप चेतना हो जो मुक्त की अभिलाशी है
12:31चेतना मात्र हो आप और मुक्त चाहिए आपको
12:37तो आपकी आयू क्या है कोई फर्क नहीं पड़ता
12:41आपका लिंग क्या है कोई फर्क नहीं पड़ता
12:43आपकी जाती क्या है कोई फर्क नहीं पड़ता
12:45ये सब बाते देह की हैं
12:47देह से हमें कोई लेना देना नहीं
12:51विदान्त आपको चितना मात्र के तौर पर देखता है
12:54और कहता है आपके जीवन का एक ही उद्देश्य है
12:57मुक्ति सब चितनाएं है
12:58सब को मुक्ति चाहिए बस
13:12सोच में आ रही है बात
13:13गार दीजे खूटाट तौ
13:23हुट
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