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नरकासुर के वध और १६,१०० रानियों के आगमन के बाद, द्वारका में शांति और समृद्धि का वास है। किंतु, एक असाधारण प्रेम कहानी बुलाई जाती है जब बाणासुर की पुत्री उषा को भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से स्वप्न में प्रेम हो जाता है। उनकी सखी चित्रलेखा की अद्भुत शक्तियों से अनिरुद्ध का अपहरण होता है, जिससे बाणासुर क्रोधित हो उठता है और अनिरुद्ध को बंदी बना लेता है। इस रहस्योद्घाटन से द्वारका में चिंता फैल जाती है और भगवान श्रीकृष्ण अपनी सेना लेकर सोनितपुर पर आक्रमण करते हैं। भगवान शिव, बाणासुर के भक्त होने के नाते, उसकी रक्षा के लिए युद्ध में उतरते हैं, जिससे शिव और कृष्ण के बीच एक अभूतपूर्व महायुद्ध छिड़ जाता है। इस दिव्य संग्राम के चरम पर, श्रीकृष्ण बाणासुर को पराजित करते हैं, अनिरुद्ध को मुक्त करते हैं, और उषा तथा अनिरुद्ध का विवाह होता है, जो प्रेम और धर्म की विजय को दर्शाता है। #VishnuPurana #KrishnaLila #ShivKrishnaYudh #UshaAniruddha #MahabharatStories #HinduMythology #PauranikKatha #Dwarka #Banasura #LoveStory #AncientIndia #DivineBattle #YouTubeSeries #MythologicalStories
Transcript
00:00नरकासुर के सहार के पश्चात 16100 रानियों के आगमन से द्वारका नगरी अपूर्व सुख, शांती और सम्रिध्धी से जग्मगा उठी.
00:10द्वारका के भव्य राजदर्बार में सिनहासन पर विराजमान भगवान श्री कृष्ण के मुख की दिव्य आभा संपूर्ण सभा को आलोकित
00:19कर रही थी.
00:21नरकासुर के चंगुल से मुक्थ हुई 16100 रानिया भगवान कृष्ण के प्रती अपनी असीम कृतग्यता व्यक्त कर रही थी.
00:30द्वारका के नागरिक गलियों में सुवर्ण पुष्पों की वर्षा करते हुए महाप्रभु कृष्ण की विजय और शांती का उत्सव मना
00:38रहे थे.
00:39इसी पावन बेला में देवर्षी नारद अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ द्वारका नगरी में अवत्रित हुए.
00:48समुद्र की उत्तुम तरंगे भी द्वारका के स्वर्ण कोट से टकरा कर मानो जगत के तारणहार प्रभु कृष्ण के चर्णों
00:55की वंदना कर रही थी.
00:57द्वारका के इस परम वैभवशाली युग में भगवान श्री कृष्ण के पराक्रमी और कामदेव समान सुन्दर पुत्र प्रद्युम्न का तेज
01:06चारों और फैर रहा था.
01:08प्रद्युम्न की धर्मपत्नी, अत्यंत रूपवती और शील्वान राजकुमारी रुकमावती अपने महल में दीप प्रजवलित कर रही थी.
01:17इसी पुन्यमै दामपत्य से उत्पन हुए उनके तेजस्वी और महाप्रतापी पुत्र अनिरुद्ध जो अपनी धनुर्विद्या से सभी को अचम्भित कर
01:27देते थे.
01:28अत्यंत अलपायू में ही अनिरुद्ध नेभीमकाई स्वर्ण गदा को सहच्ता से उठाकर अपने अदमेबल और शौर्य का परिचय दिया.
01:38उनका नीलकमल के समान नेत्र और मनोहर मुखमंडल द्वारका के हर नागरिक के हरिदय में अपूर्वसने और सम्मोहन उत्पन्न करता
01:46था.
01:48अपने पौत्र अनिरुद्ध के अध्भुत पराकरम और सौंदर्य को देखकर भगवान श्री कृष्ण के अध्रों पर एक मंद रहस्य में
01:56मुस्कान तैर उठी.
01:58महारानी रुकमिनी भी अपने पौत्र के अनुपम गुनों को निहार कर वात्सल्य और गर्व के सागर में सराबोर हो गई.
02:07बल्शाली तात बल्राम ने अपनी विशाल भुजाओं से अनिरुद्ध को गले लगा कर उन्हें अजय होने का दिव्य आशिर्वात प्रदान
02:15किया.
02:15जब अनिरुद्ध अपने श्वेत घोडो वाले दिव्यरत पर सवार होकर नगर भ्रमन पर निकलते तो प्रजा जय जयकार कर उठती
02:24थी.
02:34संध्या की ढलती वेला में सोने की द्वार का सहत्रों दीपों की स्वर्णिम रोश्नी से किसी स्वर्ग की भांती दैदी
02:41क्यमान हो उठी.
02:43अपने शयनकक्ष में विश्राम करते हुए युवा अनिरुद्ध किसी अंजाने और रोमांचक सासिक यात्रा के स्वपन देखने लगे
02:52परंतु भाग्य के गर्भ में छिपी एक अलोकिक प्रेम कहानी और एक महायुद्ध की अद्रिश्य छाया धीरे-धीरे अनिरुद्ध की
03:00ओर बढ़ रही थी
03:02इस प्रकार द्वारका की यह पावन भूमी अब प्रेम, त्याग और देवताओं तथा महादेव के बीच होने वाले एक भीशन
03:10संग्राम की साक्षी बनने को तैयार थी
03:14द्वारका के उस शांत प्रांगन से सुदूर, लाल मेघों और धधक्ती ज्वालाओं से घिरे शोनितपुर सामराज्य में एक अत्यंत शक्तिशाली
03:23दैत्य शक्ती का अभ्यूदय हो रहा था
03:26दानवीर राजा बली के कुल में जन्मा बानासुर अत्यंत महा प्रतापी, प्रचंड और असीम बल से संपन्य एक महा दैत्य
03:34था, जिसका राज्य तीनों लोकों में भय का प्रतीक माना जाता था
03:40भगवान शिव का अनन्य भक्त बनने की प्रबल इच्छा से बानासुर ने कैलाश के बर्फीले शिखरों पर सहसरों वर्षों तक
03:47कठिन तपस्या और रुद्र तांडव का अभ्यास किया
03:51बानासुर की निष्ठा और उसके द्वारा बजाये गए तांडव मृदं की मधुर ध्वनी से प्रसन्न होकर स्वयन देवाधिदेव महादेव उसके
04:00समक्ष प्रकट हुए
04:02जब महादेव ने वर्दान मांगने को कहा तो बानासुर ने उनसे अपनी रक्षा के लिए अपार शक्ती और 1000 सहसर
04:10भुजाओं का दिव्यवर्दान मांग लिया
04:14महादेव के आशिरवाद देते ही बानासुर के विशाल शरीर से 1000 अतिबलशाली भुजाय निकल आई जो दिव्य अस्त्रशस्त्रों से सुसजित
04:23होकर चमकने लगी
04:25सहस्र भुजाओं का स्वामी बनकर बानासुर अपने सामराज्य शोनितपुर वापस लोटा जहां उसके आगमन पर दैठ्य प्रजाने जयकारों से आकाश
04:35गुंजा दिया
04:37अपनी दिव्य शक्तियों से बानासुर ने शोनितपुर के चारों और अगनी वायू और जल की अभेद्य दीवारे खड़ी कर दी
04:45जिससे उसका नगर पूरी तरह सुरक्षित हो गया
04:49ततपश्चात बानासुर ने दिग्विजय यात्रा प्रारंभ की और प्रित्वी तथा पाताल लोग के सभी शक्तिशाली नरेशों को परास्त कर अपने
04:58अधीन कर लिया
05:00संपूर्ण ब्रह्मांड में कोई भी ऐसा योध्धा नहीं बचा जो बानासुर का सामना कर सके जिससे उसका अहंकार धीरे-धीरे
05:08चरम सीमा पर पहुँच गया
05:11युद्ध के बिना बानासुर की सहसर भुजाओं में निरंतर खुजली होने लगी और वह अपनी असीम शक्ती के निश्प्रयोजन होने
05:19पर क्रोड से जलने लगा
05:22अपने दर्बार में बैठे बानासुर ने चीखते हुए अपने मंत्रियों से कहा कि इतनी भुजाओं और शस्त्रों का क्या लाब
05:29यदि मुझे युद्ध करने के लिए कोई योग्य प्रतिद्वंद्वी न मिले
05:35अपनी इस अनसुलजी व्याकुलता और शान्तिहींता से क्शुब्ध होकर बानासुर पुन भगवान शिव की शरण में कैलाश परवत की ओर
05:43निकल पड़ा
05:45कैलाश पहुँचकर बानासुर ने महादेव से पीडा व्यक्त की और कहा कि है प्रभु आपकी दी हुई ये एक हजार
05:52भुजाएं मेरे लिए बोज बन चुकी हैं क्योंकि कोई मुझ से लड़ने का साहस नहीं करता
05:59बानासुर का यह भयानक अभिमान देखकर महादेव के चहरे पर एक गंभीर और रहस्य में मुस्कान तैर गई जो उसके
06:07आने वाले विनाश का संकेत थी
06:10भगवान शिव ने बानासुर से कहा कि जब तुम्हारे महल के बाहर लगा हुआ महाध्वज बिना किसी आन्धी के स्वयन
06:18तूटकर गिर जाएगा तब समझना कि तुम्हारा महायुध निकट आ गया है
06:23शिव की यह भविश्यवानी सुनते ही बानासुर प्रसन्नता से नाच उठा क्यों की अब उसकी भुजाओं की खुजली मिटाने वाला
06:31एक भयानक युद्ध होने वाला था
06:35शोनितपुर लोटकर बानासुर ने तुरंट अपने राजप्रासाद के शिखर पर एक विशाल और सुसजित ध्वजदंड स्थापित करवा दिया और उसकी
06:44पहरेदारी लगा दी
06:46बानासुर रात दिन उस ध्वज को देखता रहता इस बात से बेखबर की काल का चक्र बड़ी तेजी से उसकी
06:53ओर घूम रहा था
06:55बानासुर का यही विनाशकारी अहंकार अब एक ऐसे महायुद्ध का बीज बो रहा था जो द्वार का और शोनितपुर की
07:03किस्मत को आपस में जोडने वाला था
07:07शोनितपुर के विशाल राजप्रासाद के भीतर बानासुर की अत्यंत रूपवती पुत्री उशा अपने सुसज्जित शयनकक्ष में गहरे और शांत विश्राम
07:16में लीन थी
07:18निदरा के गहरे आगोश में सोरी उशा के मानस पटल पर अचानक एक अलोकिक और जादूई स्वपन की रचना होने
07:25लगी जो नीले रंग के दिव्य कोहरे से दीप्ट था
07:30उस नीले कोहरे को चीरते हुए स्वपन में एक अत्यंत आकरशक और तेजस्वी युवा राजकुमार प्रकट हुआ
07:37जो द्वारका के एक दिव्य और अलोकिक उपवन में तहर रहा था
07:42उस शामवर्ण और घुंगराले बालों वाले राजकुमार ने अत्यंत मंद मुस्कान के साथ उशा की ओर देखा
07:49जिससे उशा का हृदय पहली ही दृष्टी में पूरी तरह उसका हो गया
07:54स्वपन के भीतर ही दोनों प्रेमी एक सुवर्ण कमलों से सरोबार तालाब के किनारे साथ चलने लगे और मौन रहकर
08:02ही एक दूसरे को जन्म जन्मांतर का वचन दे बैठे
08:07लेकिन जैसे ही उशा उस राजकुमार का हाथ थामने आगे बढ़ी वह अलोकिक स्वपन अचानक तूटने लगा और वह सुन्दर
08:15राजकुमार धीरे धीरे सुनहरे कोहरे में विलीन हो गया
08:19घबरा कर उशा की नेंद तूट गई और वह हामफती हुई उठ बैठी उसका हृदय तेजी से धड़क रहा था
08:27जब उसे एहसास हुआ कि वह मनमोहक राजकुमार केवल एक स्वपन था
08:33शोनितपुर के उपर सवेरे का सूर्य तो उदे हो गया परंतु उशा के लिए संसार का सारा रंगफी का पड़
08:39चुका था क्योंकि वह उस राजकुमार के चहरे को अपनी यादों में समेटने का प्रयास कर रही थी
08:46वह अपने प्रासाद के जहरोखे पर बैठकर चुपचाप अश्रु बहाने लगी एक ऐसे अज्ञात पुरुष के विरह में व्याकुल जिसका
08:55उसे नाम तक ज्यात नहीं था
08:57की दासियों ने मधुर संगीत बजाकर और स्वादिष्ट फल लाकर उसका मन बहलाने का प्रयास किया परंतु उशा ने उदासींता
09:06से अपना मुख मोड लिया
09:08तभी महामंत्री कुम्भांड की अत्यंत चतुर और प्रतिभावान पुत्री चित्रलेखा ने कक्ष में प्रवेश किया और अपनी सखी की इस
09:17पीली तथा उदास दशा को भांप लिया
09:21चित्रलेखा ने अत्यंत स्नेह से उशा के पास बैठ कर उसका कूमल हाथ अपने हाथों में लिया और उसके हृदय
09:28को कचोटने वाले उस गुप्ट दुहक के विशय में पूछा
09:33उशा पहले तो हिचकी चाई परंतु फिर उसने सिसकते हुए अपने हृदय का सारा हाल कह सुनाया और उस स्वप्न
09:40राजकुमार के बारे में बताया जिसने उसका मन चुरा लिया था
09:45उसने उस राजकुमार के अलौकिक तेज उसकी सम्मोहक मुस्कान और उसके राजसी वैभव का ऐसा वर्णन किया जैसे वह उसके
09:54समक्ष साक्षात खड़ा हो
09:56अपनी योगशक्ती और अध्भुत कलात्मक कौशल के लिए प्रसिद्ध चित्रलेखा ने मुस्कुराते हुए उशा को आश्वासन दिया कि वह उस
10:05अज्यात प्रेमी को अवश्य ढूंध निकालेगी
10:09चित्रलेखा ने तुरंट एक खाली पट लिया और अपनी दिव्यकूची से तीनों लोकों के सभी महान राजाओं, राजकुमारों और देवताओं
10:17के चित्र बनाने प्रारंभ कर दिये
10:20उसने पराक्रमी असुरों, गंधरवों और देवराज इंद्र सहित अनेक देवताओं के सुन्दर चित्र बनाए, परंतु उशा ने हर बार हताशा
10:30में अपना सिरहिला दिया
10:32इसके बाद चित्र लेखा ने द्वारका के वीर यदुवंशियों के चित्र बनाने शुरू किये और उसने सबसे पहले भगवान श्री
10:40कृष्ण तथा उनके प्रतापी पुत्र प्रद्यूम्न का चित्र उकेरा
10:45अंतह चित्रले खाने जैसे ही अपनी कूची के अंतिम स्पर्ष से भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के दिव्य मुख
10:53मंडल को चित्रपट पर अनकित किया
10:56उस चित्र को देखते ही उशा के मुख से प्रसन्नता की चीख निकल पड़ी और उसने उंगली उठा कर कहा
11:03कि यही वह स्वपन राजकुमार है जिसने उसका सर्वस्व लूट लिया था
11:08अनिरुद्ध के चित्र को अपने हृदय से लगाते हुए राजकुमारी उशा के नैनों से हर्शाश्रु बह निकले
11:16अपने स्वपन के राजकुमार की पहचान होते ही उशा ने व्याकुल होकर चित्रलेखा से अपनी विरहव्यथा व्यक्त की
11:24उशा ने रुंधे हुए कंड से चित्रलेखा से प्रार्थनाकी की वह किसी भी प्रकार उस द्वारकाधीश के पौतर को उसके
11:32समक्ष ले आए
11:34उशा की अगाध प्रीती को देखकर चित्रलेखा ने अपनी अलौकिक योग विद्या के बल पर अनिरुद्ध को द्वारका से लाने
11:42का द्रिढ वचन दिया
11:44इसके पश्चात चित्रलेखा एकांत स्थान पर बैठकर ध्यान मुद्रा में लीन हो गई और अपनी खेचरी विद्या को जागरित करने
11:52लगी
11:54अपनी योग शक्ती के प्रभाव से चित्रलेखा का शरीर पवन की भांती हलका हो गया और वह तीवर गती से
12:01आकाश मार्ग में उर्चली
12:03कुछ ही क्षणों में चित्रलेखा विशाल समुद्र के तट पर बसी स्वर्नेम और दिव्यद्वार का नगरी के उपर पहुँच गई
12:11अद्रिश रूप धारन करके चित्रलेखा द्वार का के पहरेदारों को लांगती हुई सीधे अनिरुद्ध के भव्य राजप्रासाद में प्रविश्थ हुई
12:21राजप्रासाद के सुसजित कक्ष में चित्रलेखा ने देखा कि राजकुमार अनिरुद्ध एक सुंदर रत्नजडित शया पर निश्चिंत होकर सो रहे
12:30हैं
12:32अनिरुद्ध के कंदर्प समान अलौकिक सौंदर्य को देख कर चित्रलेखा भी मन ही मन उशा के चयन की सराहना करने
12:39लगी
12:41तदोपरांद चित्रलेखा ने अपनी योग माया से अनिरुद्ध और पूरे महल के सैनिकों पर गहरी योगनिद्रा का प्रभाव डाल दिया
12:50ततपश्चात चित्रलेखा ने उस सोय हुए तेजस्वी राजकुमार को अपनी मायावी वायविय पालकी में स्थापित कर लिया
12:58द्वारका से अनिरुद्ध को लेकर चित्रलेखा क्षन भर में पुना पवनवेक से आकाश की उचायों में उझल हो गई
13:07बादलों के बीच यात्रा करते हुए चित्रलेखा ने ध्यान रखा कि राजकुमार की योगनिद्रा में कोई विग्ण न उत्पन हो
13:15उधर शोनितपुर के महल की अट्टालिका पर बैठी उशा व्याकुलता से चित्रलेखा की प्रतीक्षा में मार्ग निहार रही थी
13:24अचानक आकाश से उतर कर चित्रलेखा बिना किसी शब्द के सीधे उशा के अंतहपुर्मिया पहुँची
13:32चित्रलेखा ने मंद मुस्कान के साथ सोय हुए राजकुमार अनिरुध को उशा की पुश्पों से सजी शया पर धीरे से
13:39लिटा दिया
13:41अपने स्वपन के पुरुष को वास्तव में अपने सामने पाकर उशा का हृदय अत्यधिक हर्ष और भक्ती से भर गया
13:49कुछ ही देर में जब योग निद्रा का प्रभाव समाप्थ हुआ तो अनिरुध ने आखें खोली और स्वयं को एक
13:56अंजान कक्ष में पाया
13:59जैसे ही अनिरुध की द्रिष्टी उशा के अतिसुंदर रूप पर पड़ी वे दोनों एक दूसरे की नीरव भाशा में खो
14:06गए और उनका प्रेमाख्यान आरंभ हुआ
14:10अनिरुध ने विस्मय से भरकर उशा की ओर देखा और अत्यंत मधूर स्वर में पूछा की वह कौन सी मायावी
14:17शक्ती है जिसने उन्हें द्वारका से इस अप्रिचित भवन में पहुँचाया है
14:23राजकुमारी उशा ने लज्जा से अपनी पलके जुका ली और अत्यंत धीमे स्वर में अपनी सखी चित्रलेखा की अध्भुत योगशक्ती
14:32तथा अपने स्वपन प्रेम का रहस्य उजागर किया
14:36चित्रलेखा ने आगे बढ़कर अनिरुद्ध को प्रणाम किया और बताया कि किस प्रकार उनके चित्र को देखकर उशा ने उन्हें
14:44अपने पती के रूप में स्विकार कर लिया था
14:48अनिरुद्ध के मुख पर एक दिव्य मुस्कान तैर गई और उन्होंने इस अलौकिक प्रेम को सहर्ष स्विकार करते हुए उशा
14:55को सांत्वनादी की अब उनके भय का अन्थो चुका है
15:01चित्रलेखा ने दोनों को चेतावनी दी की दैत्यराज बानासुर की कुरूरता और उसकी सहसर भुजाओं के बल से यह गुप्त
15:08प्रेम बहुत बड़े संकट में पड़ सकता है
15:12परम प्रतापी यदुवन्शी वीर अनिरुद्ध ने गर्जना करते हुए कहा कि वे किसी भी असुर समराट से भय भीट नहीं
15:20हैं और अपनी प्रेसी की रक्षा के लिए वेकाल से भी लड़ सकते हैं
15:26परस्पर सहमती और अटूट प्रेम के धागे में बंध कर अनिरुद्ध और उशाने गंधर्व विवाह की प्राचीन रीती से एक
15:34दूसरे को वर्माला पहनाई
15:36इस पवित्र मिलन की गवाह बनी चित्रलेखा ने अपनी मायावी शक्तियों से उस गुप्त कक्ष के चारों और एक सुरक्षा
15:44कवच बना दिया ताकि कोई भी सैनिक अंदर न आ सके
15:47महल की एक सुन्दर और सुसजित बालकनी में बैठकर दोनों प्रेमियों ने सोनितपुर के रातरी कालीन आकाश के नीचे मधुर
15:57समवाद आरंभ किया
15:59अनिरुद्ध ने उशा को द्वार का नगरी की भव्यता, समुद्र के मध्य उसकी स्थिती और भगवान श्री कृष्ण के दिव्य
16:06वैधव के बारे में अत्यंत रोमाचकारी वर्णन सुनाया
16:11उशा ने अपने कोमल हाथों में वीना थाम ली और अनिरुद्ध के सम्मान में एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण राग
16:19का गायन शुरू किया
16:21राग की मधुर्ता और उशा के सुरों के जादू ने संपूर्ण गुप्त कक्ष को एक स्वर्गिक आनन्द के धाम में
16:28परिवर्तित कर दिया जहां समय ठहर सा गया था
16:32दोनों प्रेमियों ने एक दूसरे को स्वादिष्ट फल और सोम रस के समान मधुर पे अरपित किये जिससे उनका प्रेम
16:40और भी प्रगाड हो गया
16:42चित्रलेखा दूर खड़े होकर मुस्कुरा रही थी परन्तु उसके मन में आगामी संकट की आशंका और असुर समराट बानासुर के
16:51क्रोध का भय निरंतर बना हुआ था
16:54उधर महल के विशाल प्रांगण में बानासुर के भयानक और क्रूर सैनिक हाथ में जलती हुई मशाले लेकर पहरा दे
17:01रहे थे जो किसी भी संदिग्ध गतिविधी की खोज में थे
17:06कई दिन बीट गए और उशा का महल उन दोनों के गुप्ट प्रेम विलास का एक अत्यंत सुन्दर और रहस्य
17:13में केंद्र बन गया
17:15अनिरुध ने उशा को युध कलाओं के कुछ गुप्ट रहस्य और दिव्य अस्त्रों के संचालन के बारे में भी सिखाया
17:22जिससे उशा अत्यंत चकित और प्रसन्न हुई
17:26अचानक भूमी में एक तीवर कमपन महसूस हुआ जिससे उशा भयभीत हो गई क्योंकि यह कमपन बानासुर की क्रोधपूर्ण हुंकार
17:35और उसकी भारी पज्चाप का संकेत था
17:39एक मुख्य पहरेदार ने राजकुमारी के कक्ष से आने वाली अलौकिक सुगंध और मधुर संगीत की धुनों को सुन लिया
17:46जिससे उसे गंभीर संदे हुआ
17:50पहरेदार तुरंट वहां से भागा ताकि वह दैत्यराज बानासुर को इस गुप्त रहस्य और राजकुमारी के कक्ष में किसी अज्यात
17:58पुरुष की उपस्थिती की सूचना दे सके
18:02पहरेदार ने हामफते हुए महाराज बानासुर के भव्य और अंधकार्मय दर्बार में प्रवेश किया और राजकुमारी उशा के गुप्त कक्ष
18:10में एक अज्यात पुरुष के होने की सूचना दी
18:14अपनी पुत्री के कक्ष में किसी पराय पुरुष के प्रवेश की बात सुनकर बानासुर की आखें क्रोध से लाल हो
18:21गई और उसका विशाल शरीर गुस्से से कापने लगा
18:25क्रोध के अतिरेक में बानासुर ने अपने भारी सिहचेहनित सिनहासन पर इतनी जोर से प्रहार किया कि पूरा शोनितपुर सामराज्य
18:34थर्थरा उठा
18:36तभी राजकुमारी की एक दासी ने भैभीत होकर राजा के समक्ष आकर पुष्टी की किवह पुरुष कोई साधारन मानव नहीं
18:44बलकी एक अलोकिक राजकुमार है
18:48क्रोध और प्रतिशोध की आग में जलते हुए बानासुर ने तुरंत अपने मुख्य सेनाप्ती को सेना तयार करने और उशा
18:56के महल को चारों तरफ से घेरने का आदेश दिया
19:00बानासुर के भयानक दानव सेनिकों की एक विशाल टुकडी, भारी शस्त्रों और मशालों के साथ राजकुमारी उशा के महल की
19:09ओर तेजी से बढ़ने लगी
19:11इधर राजकुमारी उशा के सुगंधित और शांत कक्ष में अनिरुध ने महल के बाहर सैनिकों की भारी पच्चाप सुनकर आने
19:20वाले संकट को भाम्प लिया
19:22भय से कापती हुई राजकुमारी उशा ने अनिरुध का हाथ थाम लिया और उनसे तुरंट गुप मार्क से भाग जाने
19:30की प्रार्थना करने लगी
19:32परंतु यदुवंश के वीर अनिरुध ने भागने से इनकार कर दिया और अपनी चमक्ती हुई तलवार निकाल कर युद्ध के
19:40लिए तैयार हो गए
19:42अचानक एक भयानक धमाके के साथ उशा के कक्ष का विशाल चंदन का द्वार बानासुर की असीम शक्ती से तूटकर
19:50बिखर गया
19:51धूल के गुबार को चीरते हुए महाबली बानासुर अपने सहसर हाथों में प्रल्यंकारी अस्त्रशस्त्र लिए कक्ष के भीतर दाखिल हुआ
20:01अपनी पुत्री के समीप यदुवन्शी युवक को खड़े देखकर बानासुर के क्रोध का ठिकाना न रहा और उसकी दहार से
20:09महल की दीवारें हिल उठी
20:12अनिरुद्ध ने बिना किसी भय के अपनी तलवार उठाई और स्वयंको द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण का प्रपोत्र घोशित करते हुए
20:20बानासुर को चुनोती दी
20:23क्रोधित होकर बानासुर ने चिलाते हुए अपने भयानक सैनिकों को उस ध्रिष्ट युवक को जीवित या मृत बंदी बनाने का
20:31आदेश दिया
20:33आदेश पाते ही दानव सैनिक अनिरुद्ध पर तूट पड़े परंतु यदुवंशी राजकुमार ने असाधारन युद्ध कौशल दिखाते हुए उनका डटकर
20:42मुकाबला किया
20:44अनिरुद्ध की तलवार के प्रहारों से कई सैनिक घायल होकर भूमी पर गिर पड़े जिससे कक्ष में हाहाकार मच गया
20:53अपनी सेना को पराजित होते देख बानासुर स्वया आगे बढ़ा और उसने अनिरुद्ध को वश्मे करने के लिए एक मायावी
21:01अस्त्र का संधान किया
21:03बानासुर ने अपनी जादूई शक्तियों से विशैले और भयानक नादपाश को मुक्त किया जो हवा में फुफकारते हुए अनिरुद्ध की
21:12और बढ़ा
21:13उन भयानक और विशैले नागों ने अनिरुद्ध के शक्तिशाली शरीर को चारों तरफ से जकड लिया जिससे उनकी दिव्य शक्तियां
21:22क्षीन होने लगी
21:24अनिरुद्ध को नादपाश में बंधा देखकर उशा विलाप करने लगी जबकी बानासुर ने अट्टा हास करते हुए सैनिकों को उसे
21:32काराग्रह में डालने का आदेश दिया
21:36सोनितपुर की इस गुप्ट घटना से अनजान द्वारका नगरी में राजकुमार अनिरुद्ध के अचानक गायब होने से राजमहल में गहरी
21:44चिंता और हल्चल व्याप्थ हो गई
21:47अपने पराक्रमी पुत्र अनिरुद्ध के कक्ष को खाली पाकर प्रद्युम्न व्याकुल होकर द्वारका की गलियों और महल के हर कोने
21:55में उसकी खोज करने लगे
21:57माता रुकमिनी और देवी सत्यभामा चिंता से व्याकुल होकर राजमहल में अनिरुद्ध की कुशलता की प्रार्थना करने लगी
22:07द्वारका के मुख्य राजसभा भवन में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्यद्रिष्टी से पूर्व दिशा में पनप्रहे एक महासंकट को भांप्रहे
22:16थे
22:17तभी अचानक आकाशवानी की गूँच के साथ ब्रह्म पुत्र देवर्शी नारद मुनी अपनी वीना बजाते हुए नारायन नारायन का जाप
22:26करते हुए राजसभा में अवत्रित हुए
22:29देवर्शी नारद ने भगवान श्री कृष्ण और बलभदर को प्रणाम करके पूरी सभा को अनिरुध के रहस्य में लोब का
22:37सत्य बताने का संकेत दिया
22:40नारद मुनी ने प्रकट किया कि राजकुमारी उशा की सखी चित्रलेखा ने अपनी जादूई कला से अनिरुध का अफ़रण कर
22:47उन्हें बानासुर के राज्य सोनित पूर पहुचा दिया है
22:52नारद जी ने आगे बताया कि जैसे ही बानासुर को अनिरुध की उपस्थिती का पता चला
22:58उसने चल से उन्हें विशैले नागपाश में बांध कर काराग्रह में डाल दिया है
23:04अपने निर्दोष और वीर पुत्र के साथ हुए इस अन्याय और बंदी बनाये जाने की बात सुनते ही प्रद्युम्न का
23:12हृदय क्रोध से धधक उठा
23:15बानासुर की इस दुष्टता पर परमक्रोधी भगवान बलराम ने अपना विशाल हल उठाकर गरचते हुए सोनितपुर को पलक जपकते ही
23:23भस्म करने की घोशना कर दी
23:26भगवान श्रीकृष्ण अपने सिनहासन से उठे और उनके शांत किन्तु गंभीर स्वर ने पूरी सभा में सोनितपुर पर पूल्न आक्रमन
23:34का आदेश घोशित कर दिया
23:37देवर्शी नारद ने सभा को स्मरण कराया कि बानासुर को भगवान शिव का अमर वर्दान प्राप्थ है इसलिए यह युद्ध
23:45हरी और हर का भयानक संग्राम बनेगा
23:49श्रीक्रिष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा कि महादेव की भक्ती निश्कलंक है परंतु बानासुर के अहंकार और अत्याचार का अंत करना
23:58ही अब धर्म की मांग है
24:01श्रीक्रिष्ण का आदेश मिलते ही पूरे द्वारका में युद्ध के नगाडे और शंकध्वनी गुँच उठी जिससे दसों दिशाएं कम्पित हो
24:09गई
24:11अंगिनत यादव वीर योध्धा, चम्चमाते स्वर्ण कवच, धाल, भाले और धनुषबान धारण कर अपार उत्साह के साथ युद्धक्षेत्र में एकत्रत
24:21होने लगे
24:22चार-चार दिव्य सफेद घोडो द्वारा खीचे जाने वाले विशाल का इस्वर्णिम रत एक पंक्ती में खड़े होकर महासंग्राम की
24:30प्रतीक्षा करने लगे
24:32तभी वैकुंट से भगवान विश्णू के दिव्यवाहन पक्षी राज गरुड अपने विशाल का इस्वर्णिम पंकों को फैला कर गगन से
24:40प्रित्वी पर अवत्रित हुए
24:43भगवान श्रीकृष्ण गरुड की पीठ पर विराज मान हुए जबकी बलराम और प्रद्युम्न अपने अजे युद्धर्थों पर सवार हो गए
24:52श्रीकृष्ण और बल्भदर के नेत्रित्व में विशाल यादव सेना ने पूरी प्रित्वी को हिलाते हुए सोनितपुर की दिशा में अपना
25:00महाप्रयान आरंभ किया
25:03आकाश में चमक्ती बिजलियों और गूंजती शंकध्वनी के साथ द्वारका की सेना सोनितपुर की सीमाओं के समीक पहुँची जहां हरी
25:11और हर के बीच होने वाले महायुद्ध की प्रिष्ठ भूमी तैयार हो चुकी थी
25:17द्वारका की विशाल और अजे सेना ने शंकनाद की गूंज के साथ सोनितपुर की बाहरी सुरक्षा चौकियों पर धावा बोल
25:25दिया जिससे असुर सामराज्य की नीम हिल गई
25:29सोनितपुर के प्राचीर पर तैनात पहरेदार भै से कामप उठे जब उन्होंने आकाश को हिला देने वाले सिंहनाद और रथों
25:37के पहियों की गड़गडाहट सुनी
25:40अपने राज महल के भीतर पराक्रमी बानासुर ने यादव सेना के आक्रमन की सूचना सुनी और उसका मस्तक क्रोध से
25:48लाल हो गया
25:50बानासुर की आग्या मिलते ही उसके भयानक असुर सेनाप्तियों ने लाखों की संख्या में दानवी सेना को युद्ध के मैदान
25:58की ओर कूच करने का आदेश दिया
26:01सोनितपुर के मैदान में दोनों विशाल सेनाएं आपस में टकराईं, जिससे शस्त्रों के टकराने की गूंज और वीरों के गर्जन
26:09से दसों दिशाएं देहल उठी
26:12गरुर पर सवार भगवान श्री कृष्ण ने अपने दिव्यध हनुष की प्रत्यन चाखीची और शत्रों पर सोने के समान चमकते
26:20बानों की बौच्छार कर दी
26:23महान बलशाली बलराम अपने विशाल हल और मूसल को हवा में घुमाते हुए असुरों की अगरिम पंक्ती को तिनके की
26:30तरह कुचलने लगे
26:33कामदेव के अवतार प्रद्युम्न ने अपने तीखे बानों से असुर रथों के पहियों को काट डाला और देखते ही देखते
26:40शत्रों में हाहाकार मचा दिया
26:43बानासुर का सेनापती, कुम्भांड एक विशाल रथ पर सवार होकर यादव सेना की ओर बढ़ा और उसने अपनी गदा से
26:52भयंकर विनाश मचाना शुरू किया
26:55यादव वीरों ने कुम्भांड को चारों ओर से घेर लिया और उनके बीच एक अत्यंत रोमाचक और खूनी द्वंदव युद्ध
27:03छिड़ गया
27:04बलराम जी ने आगे बढ़कर कुम्भांड के रथ के पहियों को अपने हल से जकड लिया और उसे पीछे हटने
27:11पर मजबूर कर दिया
27:14बलराम जी के मूसल के एक ही प्रहार से धर्ती फट गई जिससे सैकडों असुर सैनिक उस गहरी खाई में
27:21समा गए
27:22युद्ध का यह विनाशकारी रूप देखकर बानासुर का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया और उसने अपने रथ को
27:30आगे बढ़ाने का आदेश दिया
27:33असुर जादूग्रों ने आकाश में काले बादलों को बुला कर यादव सेना पर विशाल जलते हुए पत्थरों की वर्षा करना
27:41शुरू कर दिया
27:43श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने हाथ को उठाया और एक विशाल सोने के समान धाल बनाई जिसने गिरते हुए
27:51उलकापिंडों को हवा में ही नश्ट कर दिया
27:55सोनितपुर का युद्धक्षेत्र अब कटे हुए रथों, तूटे हुए शस्त्रों और गिरे हुए योध्धाओं के शवों से पटकर एक भयानक्ष
28:03मशान में बदल गया था
28:05प्रध्युम्न ने बानासुर के विशिष्ट धनुर्धारियों की सेना पर धावा बोल दिया और अपने अचूप बानों से उनके धनुशों को
28:13नश्ट कर दिया
28:15द्वारका के सैनेकों ने सोनितपुर के विशाल मुख्य द्वार को तोड़ने के लिए अपने भारी गोफन और मंत्रपूत अस्त्रों का
28:23उप्योग किया
28:25अंतह बानासुर अपने हजार हाथों में विभिन्न संहारक अस्त्र लेकर रणभूमी के बीचों बीच अपने शत्रु का सामना करने के
28:33लिए उतर आया
28:35श्रीक्रिष्न बलराम और प्रद्युम्न एक साथ खड़े होकर उस महाबलशाली असुर राज का अंत करने के लिए पूरी तरह तयार
28:43हो गए
28:45जैसे ही श्रीक्रिष्न बानासुर पर आक्रमन करने आगे बढ़े बानासुर ने भयभीट होकर अपने आराध्य भगवान शिव का कातर स्वर
28:54में आहवान किया
28:56अपने परम भक्त की पुकार सुनते ही गगन फारते हुए भगवान शिव अपने वाहन नंदी पर सवार होकर रणभूमी में
29:03प्रकट हो गए
29:05महादेव के साथ उनके सेनाप्ती भगवान कारती के अपने मयूर पर और रुद्रगन भयंकर हुंकार भरते हुए शोनिकपुर के युद्धक्षेत्र
29:14में उतराए
29:16अपने भक्त बानासुर के रक्षन का वचन निभाने के लिए भगवान शिव हाथों में त्रिशूल धारण कर श्री कृष्ण के
29:23सामने ढाल बनकर खड़े हो गए
29:26श्री कृष्ण ने सर्वेश्वर महादेव को आदर पूर्वक प्रणाम किया परंतु धर्म की रक्षा हेतु इस महासंद्राम को आगे बढ़ाने
29:35का संकल्प भी दोहराया
29:37तभी भगवान कार्तिकेय ने अपने मयूर पर सवार होकर प्रद्युम्न और बलराम पर दिव्य अस्त्रों की वर्षा करते हुए तीवर
29:46आक्रमन कर दिया
29:48वीर प्रद्युम्न ने अपने धनुष से बानों का संधान कर कार्तिके के दिव्य अस्त्रों को हवा में ही निश्फल कर
29:55दिया
29:56उधर भगवान बलराम ने अपने विशाल हल और मदांध गदा से आक्रमनकारी रुद्रग्नों को छिन भिन करना प्रारंब कर दिया
30:06ततपश्चात भगवान शिव ने अपने पिनाक धनुष पर प्रल्यंकारी बान चढ़ा कर श्री कृष्ण की ओर संधान किया जिससे संपून
30:14प्रिथवी काम उठी
30:16श्री कृष्ण ने तुरंत अपने शान धनुष से प्रत्युप्तर दिया जिससे दोनों देवों के अस्त्र हवा में टकरा कर प्रचंड
30:24ज्वालाएं उत्पन्न करने लगे
30:27महादेव ने संपून ब्रह्मांड को भस्न करने में सक्षम भयानक महेश्वर अस्त्र का प्रयोग किया जिससे आकाश में दसों दिशाओं
30:35में अगनी ठैल गई
30:37उस विनाशकारी अगनी को शांत करने के लिए श्री कृष्ण ने परम वैश्नवास्त्र प्रकट किया जिसने वातावर्ण को दिव्यशी तलता
30:46से भर दिया
30:47इसके पश्चात भगवान शिव ने अती भयंकर शिवजवर प्रकट किया, जिसने पूरी रणभूमी को असहयताप और व्याधी से घेर लिया
30:57इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने विश्णुजवर उत्पन किया, जिसने शिवजवर के प्रभाव को अवशोशित करके समूचे क्षेत्र को मुक्त
31:05कर दिया
31:07वैश्णव और शैव शक्तियों के इस अभूत पूर्व टकराव को देखकर ब्रहमाजी और देवगन दसों दिशाओं से भयभीत होकर थर्थर
31:15कामपने लगे
31:18महाप्रलय को रोकने और शिवजी का पूर्ण आदर रखते हुए, श्रीकृष्ण ने उन पर स्तंभनकारी जिन्भनास्त्र का प्रयोग किया
31:27जिन्भनास्त्र के प्रभाव से भगवान शिव पर जमहाई और आलस्य चा गया और वे ध्यानस्त होकर युद्ध भूमी से पीछे
31:35हट गये
31:36महादेव के रणभूमी से हटते ही घमंडी बानासुर श्रीकृष्ण के सामने पूरी तरह असाय और निहत्था खड़ा रह गया
31:45श्रीकृष्ण ने अपनी उंगली पर घूमते हुए प्रदीप्त सुदर्शन चक्र को आहवान किया जो बानासुर की सहसर भुजाओं का छेदन
31:54करने को आतुर था
31:56शोनितपुर के लाल गगन में सुदर्शन चक्र की प्रचंड लालस्वर्ण किरने कौंध उठीन जो बानासुर के अंत की घोशना कर
32:04रही थी
32:06सुदर्शन चक्र बिजली की गती से घूमा और क्षन भर में बानासुर की विशाल भुजाओं को एक एक करके काटने
32:13लगा
32:14कटकर गिरती हुई बानासुर की सहसरों भुजाएं शोनितपुर की भूमी पर विशाल व्रिक्षों की भानती बिच गई और वह पीडा
32:22से चीतकार कर उठा
32:25जब बानासुर की केवल दो भुजाएं शेश रह गई तब श्रीक्रिष्ण ने अपने चक्र को रोक लिया और दानवराज का
32:32सारा अहमकार चूर हो गया
32:35उसी समय महादेव स्वयम प्रकट हुए और अपने परम भक्त बानासुर के जीवन की रक्षा के लिए श्रीक्रिष्ण से करुणा
32:42पूर्वक प्रार्थना करने लगे
32:45भगवान शिवने श्रीक्रिष्ण को याद दिलाया कि भक्त प्रहलाद के वंश का वध न करने की अपनी प्रतिग्या के अनुसार
32:53वे बानासुर के प्रान बक्ष दें
32:56श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए महादेव के अनुरोध को स्वीकार किया और बानासुर को दो भुजाओं के साथ जीवित छोड़कर उसके
33:04दंभ का अंत कर दिया
33:07बानासुर ने अपनी पराजय और भूल स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण और शिव के चर्णों में मस्तक जुका कर क्षमा मांगी
33:16इसके पश्चात श्रीकृष्ण कबलराम और महादेव शोनितपुर के कारागार की ओर बढ़े जहां अनिरुध नागपाश के कठोर बंधनों में जक्डे
33:25हुए थे
33:26श्रीकृष्ण के दिव्य प्रभाव से अनिरुध के शरीर से लपते हुए भयानक नागपाश तुरंत भस्म होकर अद्रिश हो गए
33:35बंधन मुक्थ होते ही अनिरुध ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने पितामः श्रीकृष्ण के चर्णों का स्पर्श कर उनका आभार व्यप्त
33:43किया
33:45राजकुमारी उशा अत्यंत प्रसन्नता के साथ अनिरुध के समीप आई और दोनों प्रेमियों का मिलन देखकर समस्त देवगण हर्शित हो
33:53उठे
33:55पराजित और पश्चाताप से भरे बानासुर ने पूरे आदर के साथ अपनी पुत्री उशा का हाथ अनिरुध के हाथों में
34:02सौंक दिया
34:04शोनिकपूर का महल भव्य वेदों के मंत्रों, स्वन आभूशनों और अलौकिक पुष्पों की सुगंध से दिव्य विवाह मंडप में परिवर्थित
34:13हो गया
34:14देवर्शी नारत के साथ गंधर्वों और देवों ने आकाश से नवदमपती पर अलौकिक पुष्पों की वर्षा शुरू कर दी
34:23अनिरुद्ध और उशा ने पवित्र अगनिदेव को साक्षी मान कर वैदिक रीतियों के अनुसार साथ फेरे लिए और विवाह सूत्र
34:31में बंध गए
34:33भगवान श्री कृष्ण ने नवविवाहित युगल को अखंड सौभाग्य और विजय का आशिर्वाद दिया
34:40भगवान शिव और माता पार्वती ने भी उशा और अनिरुद्ध पर अपने अलोकिक वर्दानों की वर्षा की
34:48अभिमान से मुक्ठ हुआ बानासुर अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी प्रिय पुत्री उशा को विदा करते हुए अत्यंत नमर हो गया
34:56द्वार्का की विजय सेना उशा और अनिरुद्ध को एक सुसजित अलोकिक रत पर बैठा कर द्वार्का की ओर प्रस्थान करने
35:04लगी
35:05इस प्रकार बानासुर के अहंकार का अंथुआ और प्रेम धर्म तथा श्री कृष्ण की लीला की संपून ब्रहमांड में जैजैकार
35:14होने लगी
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