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विष्णु पुराण के १७वें अध्याय में देखिए समुद्र मंथन की अंतिम और सबसे रोमांचक गाथा! जब क्षीरसागर से धनवंतरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो दैत्यों ने उसे छीन लिया। तब भगवान विष्णु ने धारण किया 'मोहिनी अवतार'। कैसे मोहिनी ने अपनी माया से असूरों को मंत्रमुग्ध किया? कैसे राहु ने छल से अमृत पिया और भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग हुआ? देखिए देव-दानव युद्ध और स्वर्ग के पुनरुद्धार की दिव्य गाथा! #VishnuPurana #MohiniAvatar #SamudraManthan #AmritKalash #RahuKetu #HinduMythology
Transcript
00:00शीर सागर के मन्थन की प्रचंड गर्जना से संपून ब्रहमांड कांप रहा था, जहां देव और असुर अपनी अंतिम शक्ती
00:07लगा कर मंदराचल परवत को मत रहे थे.
00:11जैसे जैसे मन्थन अपनी पराकाश्था पर पहुँचा, दुग्धसागर के गर्भ में अलौकिक तरंगे उठने लगी और दिव्य उर्जा का विस्फोट
00:20होने लगा.
00:22सहसरों वर्षों के इस अथक परिश्रम के पश्चात, देवराज इंद्र और दैत्यराज बली के चहरों पर अंतिम आशा और गहरी
00:30उच्छुकता जहलक रही थी.
00:33पाताल लोग की अतल गहरायों में भगवान विश्णु के विशाल कचुआ रूप कुर्मावतार ने मंदराचल परवत को अपनी कठोर पीठ
00:41पर ग्रिड़ता से संभाल रखा था.
00:44सहसा आकाश मंदल में सहस्त्रों सूर्य के समान एक अलौकिक प्रकाश फैल गया और ब्रहमांदिय संगीत की सुमधुर ध्वनिया गूंजने
00:53लगी.
00:55शीरसागर की विशाल लहरेन दो भागों में विभक्त हो गई और जल के भीतर से एक अत्यंत भव्य और शांत
01:02जोतिपुंज उपर उठने लगा.
01:05उस स्वर्णिन जोतिपुंज के केंद्र में एक आकाशिय आवर्त उत्पन हुआ, जिसने ठके हुए देवताओं और असुरों दोनों की द्रिष्टी
01:14को अपनी ओर बांध लिया.
01:16तभी दुग्धसागर के शुभर जल से आयुर्वेद के पितामह और देवताओं के वैध्य भगवान धनवंतरी का परम सुन्दर रूप प्रकट
01:25हुआ.
01:26चतुर्भुज रूप धारण की ये भगवान धनवंतरी के नीलवर्ण शरीर से दिव्य किर्णे निकल रही थी, जो समस्त्रोगों और कश्टों
01:34का नाश करने में सक्षम थी.
01:37उनके कमल रूपी हाथों में चम्चमाता हुआ स्वर्णिम अमरित कलश सुशोभित था, जिसमें से अमर्ता प्रदान करने वाले दिव्यरस की
01:46सुगंध बिखर रही थी.
01:48भगवान धनवंतरी के अन्यतीन हाथों में पवित्रशंख, जलोका और जड़ी बूटिया सुशोभित थी, जो समस्त्रिष्टी के स्वास्थ्य का प्रतीक थी.
01:59अमर्त कलश से निकलने वाले दिव्यप्रकाश ने संपूर्ण समुद्र मन्थन स्थल को एक चमतकारी और स्वर्णें आभा से नहला दिया.
02:09आकाश से गंधर्व और अपसराएं भगवान धन्वंतरी के स्वागत में अलौकिक पारिजात पुष्पों की वर्षा करने लगे.
02:17देवराज इंद्र और समस्त देवता हाथ जोड़कर भगवान धन्वंतरी और उस अमर्त कलश को भक्तिभाव से नमन करने लगे.
02:26दूसरी ओर दैत्यराज बली और राहुकेतु सहित समस्त असुरों की आखों में लालच और अमर्त को छीनने की तीवर अभिलाशा
02:35धधक उठी.
02:37असुरों ने आपस में फुस्फुसाते हुए योजना बनाई की देवताओं के पाने से पहले ही इस कलश पर अपना अधिकार
02:44जमाना होगा.
02:46शांत और सौमे मुस्कान के साथ भगवान धनवंतरी समुद्र तल पर खड़े होकर दोनों पक्षों को अपनी करुणामई द्रिष्टी से
02:55देख रहे थे.
02:57दैत्यराज बली ने अपनी विशाल गदा उठाकर अपने असुर सैनिकों को संकेट दिया और वातावर्ण में एक भयानक तनाव चा
03:05गया.
03:07शांती का क्षण समाप्थ होते ही, अमरित की एक एक बूंद को पाने के लिए देवों और असुरों के बीच
03:13भयंकर युद्ध का शंकनाध होने लगा.
03:17इससे पहले की असुर उस दिव्य अमरित कलश पर जपटते, संपूर्ण वातावर्ण में एक नई अलोकिक माया का प्रभाव चाने
03:25लगा.
03:26जैसे ही भगवान धनवंतरी दिव्य अमरित कलश लेकर प्रकट हुए, समस्त ब्रह्मान उनकी अलोकिक कान्ती से जग्मगा उठा.
03:35अमरित की जग्मगाती आभा को देखते ही असुरों की आखों में तीवर लालच और अहंकार की ज्वाला भड़क उठी.
03:44बिना किसी संकोच के दैत्यराज बली और उसके क्रूर सेनाप्ती आगे बढ़े और देवताओं की योजना को विफल करने की
03:52ठान ली.
03:54तभी अचानक भयंकर राक्षस राहु प्रचंड गर्जना करते हुए भगवान धनवंतरी की ओर तेजी से जपता.
04:02भगवान धनवंतरी ने पवित्र अमरित की रक्षा करने का प्रयास किया, परन्तु असुरों के बलके आगे बे असहाय हो गए.
04:11एक ही जटके में राहु ने भगवान धनवंतरी के हाथों से चलावा करके अमरित कलश छीन लिया.
04:18अम्रित कलश हाथ में आते ही असुरों ने आकाश को चीर्ती हुई अट्थास की विजय गर्जना की
04:25इस छल से निराश होकर भगवान धन्वन तरीक शब्द खड़े रह गए और पूराक्शीरसागर अशान्थो उठा
04:34देवराज इंद्र और सभी देवता यह भयानक द्रिश्य देखकर भय और चिंता से काम उठे
04:41किन्तु अम्रित पाते ही असुरों में भी आपस में छीनाच पटी और भयंकर विवाद उत्पन हो गया
04:48स्वार्थ और घमंड में अंधे होकर दैत्य अपनी ही तलवारे निकाल कर एक दूसरे पर हमला करने लगे
04:56देवराज इंद्र ने साहस जुटा कर देवताओं का आहवान किया पर उनके मन में पराजय का डर बना रहा
05:04सुर्यदेव और पवन्देव आगे बढ़े परंतु असुरों के भयावह मायावी अगनिकुंड ने उनका रास्ता रोक लिया
05:12देवताओं को आभास हुआ कि सागर मन्थन की ठकान के कारण वे असुरों की अपार शक्ती का मुकाबला नहीं कर
05:20सकते
05:21असुरों की सेना ने अम्रित कलश को चारों ओर से घेर कर एक अभेद्य और भयंकर सुरक्षा चक्र बना लिया
05:29ब्रहम लोक में बैठे स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा और महर्शी नारत चिन्ता में डूग गए
05:36कोई और उपाय न देखकर इंद्र ने हाथ जोड़कर जगत के पालनहार भगवान विश्णु का ध्यान शुरू किया
05:44समस्त देवता एक स्वर में भगवान विश्णु की स्तुती करने लगे ताकि इस महाविपत्ती से रक्षा हो सके
05:52शीर सागर के उपर वैकुन्ठप्ती भगवान विश्णु ने देवताओं की करुण पुकार सुनी और मंदमंद मुस्तुराएं
06:00और फिर शोब और अंधकार के बीच एक अत्यंत अलोकिक मोहिनी प्रकाश का अवतरण होने लगा
06:08शीर सागर के टल से जैसे ही भगवान धनवंतरी अमरित से भरा स्वन कलश लेकर प्रकट हुए देवों और असुरों
06:16के बीच उसे पाने की तीवर त्रिश्ना भड़क उठी
06:20असुर राज बली ने बिना समय गवाय गर्जना की और अपनी विशाल दानवी सेना के साथ अमरित कलश की और
06:27प्रचंड गती से प्रस्थान किया
06:30देवराज इंद्र ने वजर धारण कर असुरों के आक्रमन को देखा और संपूर्ण देवगणों को धर्म और अमरित्व की रक्षा
06:38के लिए युद्ध का हुँकार दिया
06:41शीरसागर का तटपल भर में एक भयंकर कुरुक शेत्र में बदल गया जहां अस्त्रशस्त्रों की टंकार से संपूर्ण ब्रहमांड कामपने
06:50लगा
06:51छली असुर राहु ने अपनी मायावी गती से धनवंतरी के हाथों से अमरित कलश छीन लिया और युद्धक्षेत्र में भागने
06:59का प्रयास किया
07:01राहु को भागते देख इंद्र ने अपना प्रचंड वजर चला कर उस पर प्रहार किया जिससे पूरे आकाश में भयंकर
07:09बिजली कड़क उठी
07:11मायावी स्वर्भानू और उसके दानवी सहायकों ने काले जादू की अगनी बरसा कर देवों का मार्ग अवरुद्ध कर दिया
07:19पवंदेव और वरुनदेव ने अपने दिव्यधनुष संभाल कर असुरों की विशाल सेना पर बानों की अनवरत वर्षा आरंभ कर दी
07:29विशाल का अधानवों ने अपनी गदाओं से प्रित्वी और महासागर को जख जोर दिया जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच
07:36गया
07:38यह धर्म और अधर्म का ऐसा भयावह युद्ध बन गया जिसके महाविनाश से स्रिष्टी का अस्तित्व ही संकट में पढ़
07:45गया
07:47देव पक्ष की सहायता के लिए दिव्य पक्षी गरूर आकाश में प्रकट हुए और अमरित कलश की ओर तेजी से
07:54जपटे
07:55असुरों ने तुरंत गरूर पर आक्रमण कर दिया और उन पर विशैले बानों तथा भारी गदाओं से प्रहार करने लगे
08:04घमासान युद्ध के बीच अमरित से भरा कलश हाथ से फिसल कर शूने में लटक गया जिससे सभी की सांसे
08:11थम गई
08:13अगनेदेव और सूर्यदेव ने अपनी प्रचंड ज्वालाओं से कलश के चारों और एक अभेद्य सुरक्षा कवच बना दिया
08:20यह भयंकर स्थिती देख कर देवर्शी नारत चिन्तित हो उठे और उन्होंने भगवान विश्नु का ध्यान करके उनसे सहायता मांगी
08:31परंतु असुरों का बल भारी पढ़ने लगा और वे पुन्ह अमरित कलश पर अपना अधिकार जमाने में सफल होने लगे
08:39जब अधर्म की विजय निश्चित प्रतीत होने लगी तब संपूर्ण स्रिष्टी में त्राहित्राही का स्वर गूंजने लगा
08:47हताश होकर देवराज इंद्रनेक शीर सागर के तट पर घुटने टेक दिये और भगवान श्री हरी विश्नु को पुकारा
08:55तभी अचानक संपूर्ण आकाश में करोडो सूरियों के समान एक अलोकिक और दिव्यस्वर्णिन प्रकाश प्रजवलित हो उठा
09:04उस परम जोती के मध्य से एक ऐसी मोहिनी और अद्वितिय शक्ती का प्रादुर्भाव होने लगा जो सम्पूर्ण ब्रहमांड को
09:12सम्मोहित करने वाली थी
09:15समुद्र मंथन के पश्चात जैसे ही अमरित कलश प्रकट हुआ
09:19देवों और असुरों के बीच अमर्ता पाने के लिए भयंकर धर्म युद्ध छिड़ गया
09:25असुरों की विशाल शक्ती के आगे देवता विवश होने लगे और दानव राज बली के योध्धाओं ने अमरित कलश पर
09:32अपना अधिकार जमा लिया
09:35स्रिष्टी को विनाश से बचाने और धर्म की पुनरस्थापना के लिए देवताओं ने भगवान विश्णु का अत्यंत कातर भाव से
09:43आहवान किया
09:45देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विश्णु ने बिना किसी युद्ध के समस्या के समाधान हेतु मोहिनी रूप धारन करने का
09:53निर्ने लिया
09:55परमेश्वर का मोहिनी रूप अत्यंत सम्मोहक और अलौकिक सौंदर्य से परिपूर्ण था जिसकी कांती से समस्त ब्रहमांड आलोकित हो उठा
10:05मोहिनी के चरण कमलों की चाप सुनते ही क्षीर सागर के तट पर जारी भयंकर युद्ध सहसा थम गया
10:12देव और दानव दोनों ही मोहिनी के इस दिव्य और अलौकिक सौंदर्य को देखकर पूरी तरह स्तब्ध रह गए
10:21असुरों का शक्तिशाली राजा बली और उनके भयंकर सेनापती मोहिनी के एक मात्र कटाक्ष पर अपने होश गवा बैठे
10:30अत्यंत मंद चाल से चलती हुई मोहिनी मुस्कुराते हुए असुरों के समुह के निकट पहुँची
10:37मोहिनी के मायावी रूप के प्रभाव में आकर दानवों ने स्वेच्छा से वह अमरित कलश उनके हाथों में सौंक दिया
10:45अमरित कलश धारण करते ही मोहिनी की मुस्कान में एक रहस्यमई और अलौकिक तेज़ चा गया
10:52मोहिनी ने असुरों को अपने सम्मोहक मीठे वचनों में उलजा कर अमरित का समरूप विभाजन करने का प्रस्ताव रखा
11:01कामदेव के बाणों और मोहिनी के सौंदर्य से मोहित होकर असुरों ने बिना किसी संकोच के उनकी हर बात स्विकार
11:09कर ली
11:10भगवान विष्णों की योजना के अनुसार मोहिनी ने देवताओं और दैतियों को दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठने का निर्देश
11:18दिया
11:19देवता मोहिनी के वास्तविक रूप को समझ कर अत्यंत शांती और धैर्य के साथ अपनी पंक्ती में बैठ गए
11:28दूसरी और कामांध असुर मोहिनी के रूप रंग में इतने खो चुके थे कि वे अमरित के मूल उद्देश को
11:35ही भूल गए
11:36हाथ में स्वर्णिम अमरित कलश लिये मोहिनी ने किसी नृत्यांगना की भांती तालबध और भव्यचाल चलना प्रारंब किया
11:45मोहिनी सबसे पहले देवताओं की पंक्ती की और बढ़ी ताकी अमरता का रस केवल धर्म के रक्षकों को ही प्राप्थ
11:53हो सके
11:54असुरों को अपनी मोहपाश में बांधे रखकर मोहिनी ने देवताओं को पहला अमरित पान कराना शुरू कर दिया
12:02भगवान विश्णू की यह मोहिनी लीला धर्म की विजय और असुरों के चलावे की सबसे महान पौरानिक कथा बन गई
12:11शीरसागर के तटपर जैसे ही भगवान विश्णू के मोहिनी रूप का प्राकट्य हुआ
12:16उनकी अलोकिक सुन्दरकांती से समस्ट ब्रहमांड चौन्धिया गया और भयंकर युद्ध में लीन असुर अचानक स्तब्ध खड़े रह गए
12:25असुर राज बली और उसके पराक्रमी सेनाप्ती मोहिनी के अद्वितिय सौंदर्य और सम्मोहक मुस्कान को देखकर अपने सारे क्रोध और
12:34अस्त्रशस्त्रों को पूरी तरह भूल गए
12:38अपनी और बढ़ती हुई मोहिनी के नूपुरों की मधूर जहनकार सुनकर असुरों का कठोर हिदय पिखल गया और वे उसके
12:45मायावी प्रभाव में पूरी तरह जक्रे चले गए
12:49मोहिनी ने अपने चंचल नेत्रों और मधूर वानी से असुरों को मोहित करते हुए अमरित कलश के बंटवारे के लिए
12:56एक अत्यन्थी कौतुपूर्ण प्रस्ताव रखा
13:00राहु और केटु जैसे भयानक असुर भी मोहिनी के रूप पाश में ऐसे बंधे की उन्होंने अमरित पर अपने आधिपत्य
13:08का विचार तक त्याग दिया
13:11मोहिनी ने असुरों से मुस्कुराते हुए कहा कि वे एक अंजान्स्त्री पर इतनी जल्दी विश्वास कैसे कर सकते हैं जिससे
13:19असुरों का विश्वास उस पर और भी द्रिड हो गया
13:23असुरों ने मोहिनी के सौंदर्य से अंधे होकर यह घोशना कर दी की वे अमरित का कलश पूरी तरह से
13:30उसी की इच्छा पर सौंपते हैं
13:33मायावी मोहिनी ने अपनी कटी पर हाथ रख कर मंद मुसकान बिखेरी जिससे असुरों का विवेक पूरी तरह नश्ट हो
13:41गया और वे उसके हर शब्द को सत्यमानने लगे
13:45असुरों के हाथों में थमा हुआ पवित्र अमरित कलश अब मोहिनी की अलौकिक माया का मुख्य केंद्र बन चुका था
13:54दानवराज बली ने स्वया आगे बढ़कर बड़ी विनमर्ता के साथ अमर्ता प्रदान करने वाला वह पावन कलश मुहिनी के हाथों
14:02में थमा दिया
14:04अमर्त कलश को स्पर्श करते ही मुहिनी का रूप और भी अधिक तेजोमय हो उठा जिसे देखकर देवता मन ही
14:11मन भगवान विश्नु की लीला को प्रणाम करने लगे
14:15असुरों के बीच खुशी की लहर गौड़ गई क्योंकि वे सोच रहे थे कि यह असीम सुंदरी सबसे पहले उन्हें
14:22ही अमर्ता का रस्पान कराएगी
14:25मुहिनी ने अपनी चतुर योजना के अनुसार देवों और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठने का निर्देश दिया
14:34सम्मोहन के प्रभाव में आये असुर बिना किसी विरोध के तुरंत भूमी पर पंक्ति बद्ध होकर बैठ गए और अमर्त
14:41की प्रतीक्षा करने लगे
14:43दूसरी और देवगन भी भगवान विश्नु के इस चलावापूर्ण खेल को समझते हुए शान्ति पूर्वक अपनी पंक्ति में विराजमान हो
14:52गए
14:53मोहिनी ने अमरित बांटने का कार्य प्रारंभ करने से पूर्व एक बार पुनह अपनी मोहिनी द्रिष्टी से असुरों को पूरी
15:01तरह से विचलित कर दिया
15:03असुरों का ध्यान पूरी तरहे से मोहिनी के मुखमंडल और हावभाव पर ही टिका रहा, जिससे वे उसकी चाल को
15:11समझ ही न सके
15:13मोहिनी अपनी अलौकिक चाल से चलती हुई सबसे पहले देवों की पंक्ती की ओर बढ़ी, जिससे असुरों को भनक तक
15:20न लगी
15:22देवता अपने उध्धार करता विश्नु के इस मोहिनी रूप को देखकर भक्तिभाव से भर गए और अमरित पाने की प्रतीक्षा
15:30करने लगे
15:32इस प्रकार मोहिनी की माया के वशीभूत होकर असुरों ने अपनी ही पराजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया और अमरित
15:39से वंचित होने की कगार पर पहुँच गए
15:43मोहिनी रूप धारन किये भगवान विश्नु ने अपने कमल समान हाथों में जग्मगाता अमरित कलश लेकर समस्त ब्रहमांडिय सभा को
15:51अपनी अलौकिक माया से स्तंभित कर दिया
15:55सुन्दर्ता की देवी मोहिनी ने अपनी कोमल मुस्कान के साथ प्रस्ताव रखा कि बिना किसी अशान्ती के अमरित पाने के
16:03लिए सभी को अनुशासित पंक्तियों में बैठना होगा
16:07मोहिनी की मनमोहक रूप सुधा में पूरी तरह डूबे असुरों ने बिना कोई संदेह किये उसके इस प्रस्ताव को सहर्ष
16:14स्विकार कर लिया
16:17देवराज इंद्र के नेतरित्व में समस्थ देवता मर्यादा का पालन करते हुए दाहिनी और की एक व्यवस्थित पंक्ती में विराजमान
16:25हो गए
16:26दूसरी तरफ मोहिनी के सम्मोहन पाश में बंधे दैत्यराज बली और अन्यदानव बाईं ओर की विशाल पंक्ती में बैठ गए
16:35हाथों में चमकता अमरित घट थामे मोहिनी दोनों पंक्तियों के मध्य अपने नुपुरों की छमचम ध्वनी के साथ मंदगती से
16:43चलने लगी
16:45मोहिनी ने चतुर्ता पूर्वक अपनी तिर्ची और कटाक्षभी द्रिष्टी असुरों की ओर डाली जिससे वे उसकी सुन्दर्ता के जाल में
16:53पूरी तरह उलच गए
16:56असुर मोहिनी की मनमोहक मुग्राओं को देखने में इतने लीन हो गए कि वे अमरित पाने की अपनी पुरानी उच्छुकता
17:03और शंका तक भूल गए
17:06अपनी योजना के पहले चरण को पूरा करते हुए मोहिनी धीरे-धीरे देवताओं की पंक्ती की ओर बढ़ी और अपना
17:13स्वर्ण कर्ची उठाया
17:16मोहिनी ने अमरित घट में से अलौकिक द्रव निकाल कर देवराज इंद्र की अंजुली में डालना प्रारंभ कर दिया
17:35अगनी, वायू और वरुण जैसे अन्य देवताओं को भी क्रमपूर्वक अमरित परोसने लगी
17:42असुर केवल मोहिनी की मनमोहब चाल और उसकी आकरशक चेश्टाओं को ही देखते रहे यह समझे बिना की उनका अधिकार
17:50छीना जा रहा है
17:53मोहिनी ने असुरों की ओर देखकर एक मीठी मुस्कान बिखेरी जिससे वे शांत रहकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे
18:02अमरित का सेवन करने से देवताओं के चहरे नवजीवन और दिव्य प्रभाव से चमकने लगे जिससे उनका बल कई गुना
18:10बढ़ गया
18:11किन्तु असुरों की पंक्ती में बैठे चतुर और शंकालू असुर रहु ने इस चालबाजी को भांप लिया और सावधान हो
18:19गया
18:20रहु ने ध्यान से देखा कि मोहिनी केवल देवताओं को ही अमरित पिला रही है और असुरों को केवल अपनी
18:27बातों में बहला रही है
18:30अमरित प्राप्त करने की तीवर त्रिशना से प्रेरित होकर राहु ने छिपकर अपना रूप बदला और देवताओं की पंक्ती में
18:38प्रवेश करने की योजना बनाई
18:41भगवान विश्णु का यह मोहिनी रूप बिना किसी युद्ध के असुरों को उनके अधिकार से वंचित करने की अत्यंत चतुर
18:48लीला थी
18:50पूरी सभा मोहिनी के रूप जाल में फंसी रही जबकी नेती ने चुपचाप अमर्ता का पढ़डा देवताओं के पक्ष में
18:57जुका दिया
18:59जब मोहिनी अपनी मायावी लीला से असुरों को मुग्ध कर देवताओं को अमर्त बाट रही थी तब संपूर्ण सभा उनकी
19:07मोहिनी सुन्दर्ता में खोई हुई थी
19:10परंतु असुरों की भीड में खड़ा अत्यंत चतुर और कुटिल दानव रहु मोहिनी के इस दिव्य चलावे को भाप गया
19:18अमर्त पाने की तीवर लालसा में रहु चुपचाप असुरों की पंक्ती से पीछे हटने लगा ताकि कोई उस पर संदेह
19:26न कर सके
19:28अपनी तंत्रविद्या और मायावी शक्तियों का प्रयोग करके रहु ने अपना भयानक दानवी रूप बदल कर एक तेजस्वी देव का
19:36रूप धारण कर लिया
19:38शद्म वेश में छिपा रहु बिना किसी का ध्यान खीचे देवताओं की पवित्र पंक्ती की और अत्यंत सावधानी से बढ़ा
19:46बड़ी ही चालाकी से राहु देवताओं के बीच जाकर बैठ गया और उसने ठीक सूर्यदेव तथा चंद्रदेव के मध्य अपना
19:55स्थान चुन लिया
19:57प्रचंड तेज और अगनी के स्वामी सूर्यदेव अपने ध्यान में मगन होकर अमरित प्राप्ती की प्रतीक्षा कर रहे थे
20:05उनके समीप बैठे शीतल और शांत चंद्रदेव भी मोहिनी के हाथों से अमरित की बूदें प्राप्त करने के लिए तत्पर
20:13थे
20:14दोनों प्रतापी देवताओं के बीच बैठा छद्मवेशी राहु अपनी दानवी अगनी को छिपा कर अत्यंत शांत और सौमय होने का
20:23अभिनय कर रहा था
20:25मुस्कुराती हुई मोहिनी अमरित का स्वर्णिन कलश लिये उसी पंक्ती की ओर आगे बढ़ी जहा सूर्य, राहु और चंद्र बैठे
20:33थे
20:34अपनी मायावी मुस्कान से सब को वशीभूत करते हुए मोहिनी ने अमरित से भरी स्वर्णिन करची राहु की ओर बढ़ा
20:42दी
20:43अमर्ता की आकांक्षा से राहु के नेत्रों में लालसा की चमक दौड गई और उसने अत्यंत शीघरता से अपनी अंजुली
20:51आगे फैला दी
20:53मुहिनी ने बिना राहु के छल को प्रकट किये उस दिव्याति दिव्य अमरित की बूदे राहु की अंजुली में ढाल
20:59दी
21:01जैसे ही राहु ने अमरित को अपने मुख की ओर बढ़ाया उसके छद्म वेश के पीछे से एक काली दानवी
21:08चाया क्षण भर के लिए कौंध उठी
21:11तीवर द्रिष्टी वाले सूर्य देव ने तुरंत उस सुख्ष्म दानवी चाया और राहु के शरीर से निकलती नकारात्मक उर्जा को
21:19ताड लिया
21:21उसी क्षण चंद्रदेव ने भी अपने पास बैठे जीव में से एक असामान्य और भयानक दानवी कमपन का अनुभव किया
21:30सूर्य और चंद्र दोनों ने मिलकर जब ध्यान से देखा तो देव रूप के पीछे छिपे भयानक दानव राहु का
21:37वास्तविक चहरा उनके समक्ष उजागर हो गया
21:41सूर्य देव ने ततकाल अपना दाहिना हाथ उठा कर तीवर स्वर में मोहिनी को सचेट करते हुए चीख कर चेतावनी
21:48दी
21:50चंद्र देव ने भी पूरी सभा के सामने चिल्ला कर घोशना कर दी की देवताओं की पंक्ती में एक दानव
21:56छल से अमरित पीने आ बैठा है
22:00सूर्य और चंद्र की चेतावनी पूरी होने से ठीक पहले राहु ने अमरित की पहली बूंड अपने गले के नीचे
22:07उतार ली जिससे संपून ब्रहमांड में संसनी थैल गई
22:12कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
22:29कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
22:45कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
23:02कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
23:19कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
23:23Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
23:33body becomes Ketu
23:35कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
23:40Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
23:50body becomes Ketu
23:52कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
23:56Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
24:07body becomes Ketu
24:09कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
24:13Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
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24:26कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
24:30Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
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24:42कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
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24:59कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
25:03Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
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27:17Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
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27:34Lord Vishnu immediately unleashes his सुदर्शना चक्र, decapitating Rahu because he had swallowed Amrita, his head becomes Rahu and his
27:44body becomes Ketu
27:46Amrita का पान करते ही देवताओं का शरीर दिव्यस्वर्णिन कांती से प्रजवलित हो उठा और उनके भीतर असीन ब्रहमांडिये उर्जा
27:54का संचार होने लगा
27:57देवराज इंद्र ने अपनी धमनियों में बहते अमर्ता के प्रभाव को अनुभव करते हुए अत्यंत आत्म विश्वास और तेज के
28:05साथ अपना अस्त्र संभाला
28:08मोहिनी रूप के ओजल होते ही असत्य और छल का बोध होते ही असुरों का क्रोध महाविनाशकारी ज्वाला की भांती
28:16भड़क उठा
28:18दैत्यराज बली ने अपनी पराजित सेना को अंतिम सांस तक युध करने का आदेश देते हुए देवताओं पर भीशन आक्रमन
28:26करने की ललकार भरी
28:28पाताल की काली छाया से घिरे असुर विशाल गदाये और विशैले बाण लेकर अमर देवताओं की ओर हुंकार भरते हुए
28:36बढ़े
28:37देवराज इंद्र ने गगनभेदी गर्जना के साथ अपने वजर को जागरित किया जिससे संपूर्ण अंतरिक्ष में विद्यूप की प्रचंड तरंगे
28:46दोड़ गई
28:48इंद्र द्वारा चलाए गए चमकते वजरप्रहार ने असुर सेना की अग्रिम पंक्तियों को एक ही क्षण में भस्म करके छिन्न
28:55भिन्न कर दिया
28:57पवन्देव वायू ने प्रचंड ब्रहमांडिय आंधियों का आहवान करके असुरी रथों और धनुर्धरों को तिनकों की भांती उड़ा दिया
29:06अग्निदेव ने अपनी प्रजवलित ज्वालाओं से संपूर्ण युद्ध भूमी को घेर कर दैट्य सेना के अहंकार को भस्म करना प्रारंभ
29:14कर दिया
29:16वरुन्देव ने समुद्र के उत्ताल और प्रचन प्रवाह को जागरित करके असुरी वाहिनी के विशालकाय भयानक राक्षसों को दुबो दिया
29:25सिर कटने के बाद भी राहू और केतू की भयानक आकरितियां छटपटाती रही जिससे दैट्य सेना में अत्यंत भय और
29:33हताशा फैल गई
29:36भगवान विश्नु अपने परम दिव्य चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर देवताओं पर अपनी कृपाद रिष्टी और विजय का आशिर्वात बरसाने
29:44लगे
29:46सुर्यदेव के प्रचंड और तीवर प्रकाश ने असुरों की द्रिष्टी को अंधकार्मय कर दिया जिससे वे असहाय होकर युद्ध भूमी
29:54में भटकने लगे
29:56स्वर्णिन दिव्य अस्त्रों और काले असुरी शस्त्रों के भीशन तकराव से संपून ब्रहमांड का आकाश थर्राने लगा
30:04अमर देवताओं की अजय शक्ती के सामने स्वयन को असाय पाकर दैत्यराज बली ने अपनी बची हुई सेना को पीछे
30:12हटने का आदेश दिया
30:14पराजित और भयभीत असुर अपनी जान बचाने के लिए पाताल लोग की अंधेरी गहराईयों की ओर भागने लगे
30:23देवताओं ने विजय का प्रचंड हुंकार भरते हुए भागते हुए असुरों को पाताल के द्वार तक खदेड दिया
30:30पाताल लोग के विशाल और भारी द्वार भीशन गर्जना के साथ बंध हो गए और असुर सदा के लिए अंधकार
30:38में कैध हो गए
30:40असुरों के निशकासन के पश्चात स्वर्गलोग पुनह दिव्य जोती से जग्मगा उठा और आकाश से पारिजात पुष्पों की वर्षा होने
30:48लगी
30:50देवराज इंद्र और समस्त देवताओं ने हाथ जोड कर भगवान विश्णु के चर्णों में शीश नवाया और ब्रहमांड में पुनह
30:57धर्म एवन शान्ती की स्थापना हुई
31:01समुद्र मन्थन के महासंद्राम के पश्चात समस्त ब्रहमांड में एक अलोकिक शान्ती छागई और क्शीर सागर से उत्पन्न दिव्य प्रकाश
31:10ने तीनों लोकों को आलोकित कर दिया
31:13भगवान श्री हरी विश्णु ने अपने मोहिनी स्वरूप का समवरण कर अपना परम तेजस्वी चार भुजाओं वाला चतुर्भुज नारायन रूप
31:21पुनह धारण किया
31:23अमरित का पानकर असीम ऊर्जा और अमर्ता प्राप्त करने के उपरांथ देवराज इंद्र के नेतरित्व में समस्त देवता अपने खोये
31:32हुए स्वाभिमान के साथ स्वर्गलोग की ओर प्रस्थान करने लगे
31:37असुरों के चल और अंधकार से मुक्त होकर स्वर्ग की अमरावती नगरी के स्वर्ण द्वार पुनह देवताओं के स्वागत में
31:45भव्यता से खुल गए
31:47देवराज इंद्र ने अमरावती के रतनों से जड़े दिव्य सिनहासन पर पुनः विराजमान होकर त्रिभुवन के अधिपती के रूप में
31:55अपना स्थान ग्रहें किया
31:57स्वर्ग के राजसभा में गंधर्वों के मधूर संगीत और महर्शियों के वेद पाठ से पूरा बातावर्ण अलोकिक आनन से गुझ
32:06उठा
32:07तभी क्षीर सागर से प्रकट हुई जगजजन्नी देवी लक्षमी ने अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर स्वर्ग लोक को अखंड
32:15समरिधी का वर्दान दिया
32:17माता लक्षमी के श्री चर्णों के स्पर्ष से स्वर्ग की खोई हुई आभा पुना लोट आई और समस्त दसों दिशाएं
32:25अपार धंधान्य तथा वैभव से परिपूर्ण हो गई
32:29गरुर पर सवार होकर भगवान श्री हरी विश्नु और माता लक्षमी ने एक साथ प्रकट होकर देवताओं को अपने सन्युक्त
32:37लक्षमी नारायन स्वरूप के दर्शन दिये
32:40आकाश में परम्पिता ब्रहमा और भगवान श्रीव प्रकट हुए और उन्होंने लक्षमी नारायन के इस अलोकिक युगल स्वरूप पर पुश
32:49पवर्शा करते हुए उन्हें नमन किया
32:52चतुर्मुख ब्रहमा जी ने अपने चारों मुखों से पवित्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए स्रिष्टी में धर्म और संतुलन
32:59की पुनरस्थापना की घोशना की
33:03कैलाश पर्वत पर विराजमान देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती के साथ संपून ब्रहमाड में फैली शांती को देखकर मंद मुस्कान
33:12के साथ आशिरवाद दिया
33:15महर्शी दुर्वासा ने इंद्र के विनम्रव्यभार और देवी लक्षमी के प्रती अगाध भक्ती को देखकर अपना दिया हुआ शाप पूर्णता
33:23वापस ले लिया
33:25देवर्शी नारद अपनी वीना की मधुरतानों पर नारायन नारायन का जाप करते हुए तीनों लोकों में भगवान विश्नुकी लीलाओं का
33:33यशगान करने लगे
33:36पराजत और दिशाहीन होकर असुर पाताल लोग की गहराईयों में लोट गए और उन्होंने श्री हरी के न्याय और धर्म
33:43की श्रेश्थता को स्विकार किया
33:47स्वर्गलोग की सभा में अपसराएं उर्वशी और मेन का अपने अलोकिक न्रित्य से देवताओं के हृदय को असीम प्रसन्नता से
33:54भर रही थी
33:56दिव्यकल्प व्रिक्षपुना पल्लविथो उठा और कामधेनु गाय के प्रभाव से पूरे स्वर्ग में अमूल्य निधियों की वर्षा होने लगी
34:06देवराज इंद्र ने भगवान विष्णू और माता लक्षमी के प्रती अपनी कृतग्यता व्यक्त करने के लिए स्वर्ग लोक में एक
34:13विशाल और पवित्र महायग्य का आयोजन किया
34:17प्रित्वी, स्वर्ग और पाताल, तीनों लोक एक बार फिर सत्यक, धर्म और न्याय की एक अटूट दोर में बंध कर
34:24शांत और समरिध हो गए
34:27भगवान विश्नु और माता लक्षमी ने अपने अनंत अनुग्रह से संपूर्ण स्रिष्टी को यह संदेश दिया की जहां धर्म और
34:35भक्ती है, वहां सदैव विजय और कल्यान होगा
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