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तारकासुर के वध के बाद ब्रह्मांड में शांति तो लौट आई, लेकिन देवताओं की समृद्धि और शक्ति पर अचानक मंडराया एक भयानक खतरा! क्रोधित ऋषि दुर्वासा के श्राप ने कैसे छीन ली स्वर्ग की लक्ष्मी? 💔 इंद्र के अहंकार ने कैसे देवताओं को पतन की ओर धकेला? भगवान विष्णु ने इस महासंकट से मुक्ति पाने के लिए कौन सा अद्वितीय मार्ग सुझाया? जानिए अमृत मंथन की अद्भुत गाथा की शुरुआत, जहां देवता और दानव एक अविश्वसनीय संधि के लिए विवश होते हैं! इस महागाथा में गोता लगाएँ और जानें कैसे लक्ष्मी का पुनर्जन्म और अमरता का रहस्य उजागर होता है! #VishnuPurana #SamudraManthan #DurvasaCurse #AmritManthan #DevasAndAsuras #Lakshmi #Indra #LordVishnu #Mythology #HinduGods #Puranas #S2E15 #EpicStories #DivineCurse #Immortality
Transcript
00:00तारकासुर के सहार के बाद ब्रहमांड में एक गंभीर शांती छा गई थी, मानों युद्ध के हर घाफ पर समयने
00:07मरहम लगा दिया हूँ।
00:10देवगन अपने अपने लोकों को लोट रहे थे, उनके चेहरों पर विजय की आभा और आने वाले स्वर्ण युग की
00:17आशा स्पष्ट दिख रही थी।
00:20कैलास परवत पर भगवान शिव और देवी पारवती अपने दिव्य पुत्र सकंड को गोध में लिए नवजागरित ब्रहमांड की शांती
00:28का अवलोकन कर रहे थे।
00:31वैकुंठ में भगवान विश्नु शेशनाग की शयापर देवी लक्ष्मी के साथ विश्व के नए संतुलन को निहारते हुए असीम शांती
00:40का अनुभव कर रहे थे।
00:42सत्यलोक में ब्रहमाजी कमल पर विराजमान स्रिजन की नई लहरों को महसूस कर रहे थे, जहां हर और नई उर्जा
00:50का संचार हो रहा था।
00:53देवर्शी नारद वीना बजाते हुए तीनों लोकों में भ्रमन कर रहे थे, अपनी मधुर संगीत से शांती और सौहार्थ का
01:00संदेश फैला रहे थे।
01:03स्वर्ग के द्वार समरिध्धी और एश्वर्य के लिए खुल गए थे, और अमरित वर्षा की भाती खुशिया हर दिशा में
01:10फैल रही थी।
01:13इंद्र का भव्य सिनहासन कक्ष धीरे धीरे दिव्य प्राणियों और देवदूतों से भर रहा था, जो अपने राजा के गौरवशाली
01:20शासन की प्रशंसा करने आये थे।
01:23फिर एक दिव्य गर्जना के साथ देवराज इंद्र अपने वजर के साथ प्रकट हुए, उनके आगमन से पूरा स्वर्ग प्रकाश्मय
01:32हो उठा।
01:33वे अपने रत्नजडित सिनहासन पर विराज मान हुए, मानो स्वयन सूर्य देव स्वर्ग के केंद्र में आविराजे हों।
01:42इंद्र के दर्बार में देवतागन, गंधर्व और अपसराय उनकी जैजैकार कर रहे थे और संगीत एवन रित्य की धुने स्वर्ग
01:51में गूंज रही थी।
01:53विजय के उल्लास और चिरस्थाई शांती की अनुभूती ने देवताओं को असीमित आनंद में डुबो दिया था, जिसने उनके हृदय
02:01को अहंकार से भर दिया।
02:04देवराज इंद्र का एश्वर्य दिनों दिन बढ़ता जा रहा था, उनके राजमहल में सोने और रत्नों की चमक हर कोने
02:11में दिखती थी।
02:13स्वर्ग में अन्वरत उत्सवों का सिलसिला चल रहा था, जहां देवतागन अमरित के समान सोमरस का पान करते और दिव्य
02:21भोज का आनंद लेते थे।
02:24अपनी अजे शक्ती पर गर्व करते हुए, इंद्र अपने सिनहासन पर बैठे, उनकी आखों में असीम आत्म विश्वास और सत्ता
02:32का नशास पष्ट जलक रहा था।
02:35देवताओं ने धीरे-धीरे अपने कर्तवियों और जिम्मेदारियों को भूलना शुरू कर दिया था, वे केवल अपने सुख भोग में
02:43लीन थे।
02:44ब्रहमांड में शान्ती थी, पर कहीं कहीं प्रकृती में एक सुख्षम बेचैनी महसूस की जा रही थी, जैसे किसी आने
02:53वाली आपदा का संकेत हो।
02:55इंद्र ने अपने स्वर्गिय वैभव में इतना खो दिया था, कि वे साधारन प्राणियों और तपस्वियों के प्रती अपना आदर
03:03खो चुके थे।
03:05शांती के इस जूठे आवर्ण के नीचे अहमकार और असावधानी के बीज बोय जा रहे थे, जो भविश्य में देवताओं
03:13के पतन का कारण बनने वाले थे।
03:17ब्रहमांड एक भव्य नाटक के अगले अंत की तयारी कर रहा था, जहां यह गहरी शांती जल्द ही एक प्रचंड
03:24तूफान में बदलने वाली थी।
03:27अमरावती की स्वर्ण सभा में देवराज इंद्र अपनी अपार समरिधी और अपसराओं के नृत्य के बीच अहंकार के मद में
03:35डूबे हुए थे।
03:37स्वर्गलोग की इस वैभवशाली संध्या में चारों और दिव्य संगीत गूँज रहा था और सभी देवता सुख भोग में लीन
03:45थे।
03:45इसी क्षण सुदूर क्षितिज से परम तपस्वी और अपने तीवर क्रोध के लिए विख्यात महर्शी दुर्वासा देवलोग के मुख्यद्वार की
03:54ओर बढ़ रहे थे।
03:56महर्शी दुर्वासा के जटाजूट से अगनी की लप्ते सी निकल रही थी और उनका प्रखर तपस्वी रूप देखकर दिशाएं भी
04:05थर्थरा रही थी।
04:07उनके हाथों में भगवान शिव का दिया हुआ एक अत्यंत अलौकिक पारिजात पुष्पों का दिव्यहार चमक रहा था जो कभी
04:14मुर्जा नहीं सकता था।
04:16कैलाश परवतपर भगवान शिव ने महर्शी दुर्वासा की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर यह अक्षय सौभाग्य दायक दिव्यमाला उन्हें भेंट
04:26की थी।
04:27महर्शी दुर्वासा उस पवित्र महाप्रसाद को अत्यंत आदर और श्रद्धा भाव से देवराज इंद्र को देने के उद्देश से अमरावती
04:36ले जा रहे थे।
04:38जैसे ही रिशिश्रिष्ट दुर्वासा ने राजसभा में प्रवेश किया, वहां का उत्सव क्षण भर के लिए उनकी तेजस्विता से स्तब्ध
04:46हो गया।
04:48अपने उच्चस्वर्ण सिनहासन पर विराजमान देवराज इंद्र ने रिशिवर के आगमन को देखा पर अपने मदमेवे पूर्णता विनमर न हो
04:56सके।
04:58महर्शी दुर्वासा दिव्य माला की सुगंध बिखेरते हुए इंद्र के समीप पहुँचे, जिससे संपूर्ण देवसभा अलोकिक उर्जा से भर उठी।
05:08महर्शी ने इंद्र से कहा कि यह पुष्पमाला साक्षात महादेव का आशिरवाद है, जो संपूर्ण ब्रहमाण में लक्ष्मी और विजय
05:16का प्रतीक है।
05:19अपने हाथों में चमकती उस अध्भुत पारिजात माला को उठाकर दुर्वासा रिशी ने अत्यंत सने और आशिरवाद के साथ इंद्र
05:27की ओर बढ़ाया।
05:29उस दिव्यमाला से निकलती भीनी भीनी अलौकिक सुगंध से देवसभा के सभी देवता और गंधर्व मंत्र मुग्ध हो गए।
05:38देवराज इंद्र ने अपने रत्नजडित सिनहासन से उठकर उस शिवप्रसाद स्वरूप दिव्यमाला को अपने हाथों में ग्रहन किया।
05:47महर्शी दुर्वासा को पूर्ण विश्वास था कि इंद्र इस परम पवित्र उफार को अपने मस्तक से लगाकर सदैव संजो कर
05:55रखेंगे।
05:57परंतु वैभव और सत्ता के अभिमान में अंधे हो चुके इंद्र ने उस अलौकिक उफार के महत्व को पूर्णत अंदेखा
06:05कर दिया।
06:06इंद्र का ध्यान अभी भी सभा में चल रहे सुरा और सुन्दरी के विलासिता पूर्ण वातावर्ण में ही भटका हुआ
06:13था।
06:27वह दिव्य पारिजात माला अपने एरावत हाथी के मस्तक पर लापरवाही से रख दी। उस दिव्य माला की तीवर सुगंध
06:35से व्याकुल होकर एरावत हाथी ने अपनी विशाल सून्द को हिलाना शुरू कर दिया, जो आने वाले विनाश का संकेट
06:43था।
06:44स्वर्गलोग की दिव्य आभा और अपने अटूट एश्वर्य के अहंकार में डूबे देवराज इंद्र अपने विशालकाई गजराज एरावत पर सवार
06:53होकर एक भव्य यात्रा पर निकले थे।
06:57अमरावती नगरी के स्वर्ण पथों पर देवराज इंद्र का विजय जुलूस आगे बढ़ रहा था, जहां गंधर्व और अपसराएं उनकी
07:05जैजैकार करते हुए फूलों की वर्शा कर रहे थे।
07:09अपनी असीमित शक्तियों और त्रिलोक के स्वामित्व के अभिमान में लीन इंद्र के मुख पर केवल अपने पद का मद
07:16और अन्य जीवों के प्रती उपेक्षा जहलक रही थी।
07:21उसी समय कठिन तपस्या से पूर्ण होकर महर्शी दुर्वासा दैव्योग से उसी मार्ग पर आपहुँचे जिनके हाथ में एक परम
07:29पवित्र दिव्य संतानक पुष्पों की माला थी।
07:32महर्शी दुर्वासा के चहरे पर उग्रत अपोबल का तेज चमक रहा था और वे देवराज इंद्र को आशिरवाद स्वरूप वह
07:40अत्यंत दुर्लभ माला भेंट करने आगे बढ़े।
07:44रिशी दुर्वासा ने सम्मान और प्रेम पूर्वक वह अलोकिक माला इंद्र की ओर बढ़ाते हुए उसे भगवान विश्नु और महालक्ष्मी
07:53का परम प्रसाद बताया।
07:55परंतु अपने एश्वर्य के नशे में चूर इंद्र ने न तो रिशी का नमन किया और नहीं उस महाप्रसाद का
08:02यथोचित आदर स्विकार किया।
08:05इंद्र ने बिना किसी भक्तिभाव के उस अत्यंत पवित्र माला को लिया और लापर वाही से उसे अपने गजराज एरावत
08:13के मस्तक पर टांग दिया।
08:15उस दिव्य माला की तेज गंध और उस पर भिनभिनाती मधुमक्खियों से परेशान होकर एरावत हाथी व्याकुल हो उठा।
08:24क्रोध और खीज में आकर एरावत ने अपनी विशाल सून से उस पवित्र माला को उतार फेंका और उसे जमीन
08:31पर गिरा दिया।
08:33इसके बाद उस विशालकाय हाथी ने बिना सोचे समझे उस दिव्य प्रसाद रूपी माला को अपने भारी भरकम पैरों तले
08:41बेर्हमी से रौंद डाला।
08:44महा प्रसाद का यह भयानक अनादर देखकर महर्शी दुर्वासा का शरीर क्रोध के मारे कामपने लगा और उनकी आखें अगनी
08:52के समान लाल हो गई।
08:55रिशी दुर्वासा का सौमे रूप पल भर में प्रचंड महाकाल की भांती भयंकर हो उठा और उनकी तपो अगनी से
09:02संपूर्ण वातावर्ण दहकने लगा।
09:05अपनी अवहेलना और लक्ष्मी रूपी प्रसाद के अपमान से कुपित होकर दुर्वासा रिशी ने इंद्र की और अपनी उंडली उठा
09:13कर गर्जना की।
09:16दुर्वासा ने कठोर वानी में कहा कि जिस एश्वर्य के अहंकार में इंद्र ने माता लक्ष्मी की माला का अनादर
09:23किया है वह एश्वर्य अब उनका साथ छोड़ देगा
09:27रिशी ने भयंकर श्राप दिया कि आज ही से संपूर्ण देवलोक श्रीहीन हो जाएगा और देवता अपनी कांती, शक्ती तथा
09:36अमर्ता के अभिमान से वंचित हो जाएंगे
09:39श्राप के प्रभाव से उसीक्षन अमरावती की दिव्य आभा लुप्थ होने लगी और देखते ही देखते चारों और अंधकार और
09:48उदासी चागई
09:50श्राप का सबसे पहला प्रभाव इंद्र पर पड़ा, जिनकी स्वर्ण मुकुट की मनिया निश्प्रभ हो गई और उनके चहरे का
09:57दिव्य तेज समाप्थ हो गया
10:00स्वर्ग की समस्थ संपदा और समृध्धी की अधिश्ठात्री देवी महालक्ष्मी इंद्र के इस घोर पाप के कारण देवलोग का त्याग
10:09कर क्शीर सागर में विलीन हो गई
10:11अब भय और पश्चाताप से कापते हुए देवराज इंद्र अपने हाथी से नीचे उतरे और रिशी दुर्वासा के चर्णों में
10:20गिरकर अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की क्शमा मांगने लगे
10:25महरशी दुर्वासा के भयंकर श्राप के गुंचते ही देवराज इंद्र के अहमकार का सवर्निन मेहल क्षन भर में भर भरा
10:32कर ढहने लगा
10:34श्राप के भयंकर प्रभाव से धन, समरिध्धी और कांती की देवी श्री लक्षमी स्वरगलोग को त्याग कर क्षीर सागर के
10:42अगाध जल में अंतरध्यान होने लगी
10:45देवी लक्ष्मी के लुप्त होते ही स्वर्गलोग के विशाल स्वर्ण स्तंभ अपनी चमक खोकर मटमैले और जरजर पत्थरों में बदलने
10:53लगे
10:55समस्त देवताओं के मस्तक के पीछे चमकने वाला दिव्य अभामंडल अचानक बुझ गया और उनकी अमर शक्तियां क्षीन होने लगी
11:05स्वर्ग के पावन नंदन वन के अमर पुष्प मुर्जा कर काली राख में बदल गए और हरियाली देखते ही देखते
11:12रिगिस्तान बन गई
11:14सबकी मनो कामनाएं पूरी करने वाला अमर कल्प वरिक्ष सूख कर जड़ से उखडने लगा जिससे स्वर्ग में चारों और
11:21उदासी चा गई
11:23स्रिष्टी को संपन्ता प्रदान करने वाली दिव्यकामधेनुगाए उदास होकर स्वर्ग से अद्रिश्य हो गई और चारों और हाहाकार मच गया
11:33आकाश गंगा की पवित्रधाराय सूख कर कीचर में तबदील हो गई और स्वर्ग में शीतल बयार की जगह तप्ट आंधियां
11:41चलने लगी
11:43स्वर्गलोग का यह पतन केवल देवलोग तक सीमित न रहा बलकि इसका विनाशकारी प्रभाव सीधे प्रिथवी लोग पर भी दिखाई
11:51देने लगा
11:53प्रिथवी पर अचानक भयंकर अकाल पड़ गया, नदिया सूख गई और खेतों की उपजाओ भूमी में गहरी दरारें आ गई
12:02रिशियों और मुनियों के यग्य कुंडों की पवित्र अगनी स्वतह बुझने लगी और तंत्रमंत्र अपनी शक्तिक होने लगे
12:11प्रिथवी पर चारों तरफ अधर्म, भूख और व्याधियों का बोलबाला हो गया, जिससे मानव जाती तडप उठी
12:19पाताल लोक में असुर राज बली और उनके सेनापतियों को जब देवताओं के इस पतन का समाचार मिला, तो वे
12:26उल्लास से भर उठे
12:29दानव गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर असुरों ने अपने भयंकर अस्त्रशस्त्रों को पुनह चमकाना और युद्ध की तैयारियां शुरू कर
12:37दी
12:38भयानक रूप वाले लाखों असुरों की विशाल सेना पाताल लोग की सीमाओं को लांकर तीनों लोगों पर अधिकार करने निकल
12:46पड़ी
12:48असुरों के भयानक युद्ध घोश से तीनों लोग कांप उठे और उन्होंने असहाई स्वर्गलोग के मुख्य द्वारों पर धावा बोल
12:56दिया
12:57शक्तिहीन हो चुके देवता असुरों के भीशन प्रहारों का सामना न कर सके और उनके दिव्य शस्त्र निश्प्रभावी साबित हुए
13:06देवराज इंद्र का दिव्य वजर भी अपनी चमक और घातक शक्तिक हो चुका था जिससे वे युद्ध भूमी में पूरी
13:14तरह विवश हो गए
13:16पराजित और अपमानित होकर समस्त देवता अपने प्राण बचाने के लिए स्वर्गलोग छोड़कर अंधकार मैं कंदराओं में छिप गए
13:25चारों और फैले घोर अंधकार से व्याकुल होकर देवताओं ने जगत के पालनहार भगवान विश्नु की शरण में जाने का
13:33निर्णय लिया
13:34त्रिलोग का समस्त वैभव और अधिकार छिन जाने के बाद श्रीहीन हो चुके देवराज, इंद्र और अन्य देवता असहाय होकर
13:43ब्रहमान्ड के उजार्ग शेत्रों में भटकने लगे
13:47माता लक्ष्मी के रूट जाने से देवताओं का वह अलौकिक तेज समाप्थ हो गया था, जिसने कभी उन्हें अजे और
13:54अमर बनाया था
13:56दूसरी और असुरों ने स्वर्गलोक पर अपना पूर्ण अधिकार जमा लिया था और उनकी ललकार से पूरा ब्रहमान्ड धर्रा रहा
14:04था
14:06अपनी रक्षा का कोई मार्ग न देखकर देवराज इंद्र ने अपने खाली और कापते हाथों को देखकर महर्शी दुर्वासा के
14:14उस भयानक श्राप को याद किया
14:17अगनी की ज्वालाएं ठंडी पड़ चुकी थी, वायू का वेग मंध हो गया था और सभी देवताओं की शक्तिया निश्प्रभ
14:25होकर क्षीन हो गई थी
14:27निराशा के घने बादलों के बीच सभी प्रमुख देवताओं ने एकत्रित होकर स्रिष्टी के रच्चिता भगवान ब्रह्मा की शरण में
14:35जाने का निर्णय लिया
14:38समस्त देवताओं और हताशा से भरे हुए परम्पिता ब्रहमा के निवास स्थान सत्यलोग की ओर अतिक्षीन गती से बढ़ने लगे
14:47जैसे ही वे सत्यलोग के दिव्य और भव्यस्वर्ण द्वारों पर पहुँचे वहां की असीम शान्ती ने उनके अशान्त मनों को
14:55क्षणभर के लिए स्तब्ध कर दिया
14:58सत्यलोग के केंद्र में एक विशाल दैविय कमल पर विराजमान भगवान ब्रहमा अपनी अनंत शान्ती और संपून ब्रहमांडिये चेतना के
15:07साथ ध्यानमगन थे
15:09समस्त देवताओं ने भगवान ब्रहमा के सामने पहुँच कर उनके श्रीचर्णों में साष्टान प्रणाम किया और अपने आसूँ से भूमी
15:18को भिगो दिया
15:20देवराज इंद्र ने कापते हुए स्वर और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ भगवान ब्रहमा के समक्ष अपनी दैनिय स्थिती का वर्णन
15:28करना प्रारंभ किया
15:31स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा ने अपने चारों मुखों के नेत्र खोले और देवताओं की कांतिहीन काया तथा उनका दुख देखकर अत्यंत करुणा
15:39से भर गए
15:41इंद्र ने बताया कि कैसे महर्शी दुर्वासा के क्रोधवश दिये गए श्राप के कारण माता लक्षमी समुदर में लीन हो
15:48गई और संपूर्ण देवलोक श्रीहीन हो गया
15:52देवताओं ने आगे कहा कि लक्षमी के चले जाने से असुर्राज बली और उसके राक्षसों ने स्वर्व पर आक्रमन कर
16:00उन्हें अपने ही घर से बेदखल कर दिया है
16:04देवताओं ने रोते हुए कहा कि अब ब्रह्मांड से सत्य, धर्म, सम्रिध्धी और ओज का अंत हो चुका है और
16:11अधर्म का अंधकार चारों और फैल रहा है
16:15स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा ने देवताओं की व्यथा सुनकर गेहन विचार किया और ब्रह्मांड के नियमों और नेती के
16:23संतुलन को समझा
16:25ब्रह्मा जी ने गंभीर्ता से कहा कि महर्शी दुर्वासा का श्राप कोई साधारन प्रकोप नहीं बलकि परम सत्ता की एक
16:34गूड लीला का भाग है
16:36उन्होंने देवताओं को अवगत कराया कि इस घोर संकट से उबरने और माता लक्ष्मी को कुनह प्राप्त करने का उपाय
16:44केवल भगवान विश्नु के पास ही है
16:48भगवान ब्रहमा ने स्वय देवताओं का नेत्रित्व करने का निर्णय लिया और उन्हे भगवान विश्नु के निवास स्थान क्षीरसागर चलने
16:56का आदेश दिया
16:58ब्रह्मा जी के वचनों से देवताओं के हृदय में उन्हा आशा की किरन जागरत हुई और वे सभी श्रीहरी विश्नु
17:05की स्तुती के लिए क्शीर सागर की ओर प्रस्थान कर गए
17:10समस्थ देवताओं का समूह जिसने अपनी दिव्य आभा और खोई हुई श्री के कारण तेजस्विता खो दी थी निराशा की
17:18गहरी गर्त में डूबा हुआ अपने भाग्य पर विलाप कर रहा था
17:23ब्रह्मा देव अपने चतुर मुखी स्वरूप में देवताओं की दैनिय स्थिती पर अपनी शांत गंभीर द्रिश्टी गड़ाए हुए थे उनके
17:31मुख मंडल पर गहरी चिंता की रेखाए स्पष्ट दिख रही थी
17:36उनकी दिव्यवानी एक ब्रह्मांडिय प्रतिध्वनी के समान उस उदास सभा में गूंज उठी जो देवताओं के भीतर आशा की एक
17:45शीन लौ जलाने वाली थी
17:48ब्रह्मा ने स्पष्ट किया कि देवी लक्ष्मी का यह श्राप जिसने देवताओं की सारी शक्ती छीन ली थी
17:54कोई साधारन घटना नहीं बलकि एक गहन ब्रह्मांडिय असंतुलन का परिनाम था
18:01उन्होंने समझाया कि देवों की खोई हुई श्री जिसे देवी लक्ष्मी स्वयं प्रतिनिधित्व करती हैं
18:07इतनी गहरी है कि इसे पुनर्स्थापित करना स्वयं उनके ब्रह्मा के वश में भी नहीं है
18:15देवता अपनी आशा की अंतिम किरण को भी धूमिल होते देख गहरी हताशा और दुख के साथ ब्रह्मा के शब्दों
18:23को सुनते रहे उनके चहरे पर अब और भी अधिक उदासी चा गई थी
18:29ब्रह्मा ने श्री के गहन अर्थ को समझाया यह केवल धन नहीं बलकि ब्रह्मांडिय संतुलन, समरिध्धी, सुन्दर्ता और देवताओं के
18:37स्वयं के अस्तित्व का सार है जो उनसे दूर हो चुका है
18:43उन्होंने इस अनुपस्थिती के कारण होने वाले ब्रह्मांडिय असंतुलन पर जोर दिया, जहां समस्थ स्रिष्टी पर इसका नकारात्मक प्रभाफ पड़
18:51रहा था, जिससे प्रकृती और जीवन के चक्र में अव्यवस्था फैल रही थी
18:57ब्रह्मा ने फिर एक उम्मीद की किरन दी, यह कहकर की ब्रह्मांड में एक ऐसी शक्ती मौजूद है, जो स्रिष्टी
19:05के इस गंभीर असंतुलन को बहाल कर सकती है
19:10उन्होंने घोशनाकी की केवल स्रिष्टी के पालक और संरक्षक, भगवान विश्णु ही इस गंभीर संकट से उबार सकते हैं और
19:18खोई हुई श्री को पुनह स्थापित करने का मार्ग दिखा सकते हैं
19:23विश्णु का नाम सुनकर देवताओं की आखों में आशा की एक नई प्रबल चमक कौन्ध उठी जैसे गहन अंधकार के
19:31बाद सूर्य की पहली किरन फूट पड़ी हो
19:35ब्रह्मा ने विश्णु की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला उन्हें ब्रह्मांड के शाश्वत रक्षत, संतुलन के धारक और समस्त
19:43प्राणियों के परम आश्रे के रूप में वर्नित किया
19:47उन्होंने देवताओं को सलाह दी की वे अहंकार और निराशा को त्याग कर पूर्ण श्रद्धा और विनमृता के साथ भगवान
19:55विश्णु की शरण में जाएं क्योंकि वही इस संकट के एक मात्र समाधान करता है
20:02ब्रह्मा ने उन्हें वैकुंट की ओर जाने का मार्ग और विश्णु तक पहुँचने के लिए आवश्यक अनुष्ठानों तथा प्रार्थनाओं के
20:10बारे में मार्ग गर्शन दिया ताकि उनकी पुकार सुनी जा सके
20:15उन्होंने देवताओं को विश्वास दिलाया कि भगवान विश्णु अपने अनंत करुणा और गेहन ज्यान के साथ उनकी पुकार अवश्य सुनेंगे
20:24और इस संकट से उन्हें मुक्ती दिलाएंगे
20:28देवताओं ने अपनी सारी हताशा त्याग कर ब्रह्मा के दिव्य मार्ग गर्शन के आगे सिर जुका लिया उनकी आखों में
20:36अब एक नया संकल्प चमक रहा था
20:39ब्रह्मा ने उन्हें अंतिम बार प्रोथ साहित किया याद दिलाते हुए कि सच्ची शक्ती विनमर्ता और अटूट भक्ती में नहित
20:47है और विश्नु निश्चित रूप से उनके कश्टों का निवारण करेंगे
20:52समस्त देवता अब एक नए उद्देश्य से उतप्रोथ थे अपनी खोई हुई गरिमा और श्री को पुनह प्राप्त करने के
21:00लिए भगवान विश्नु के पास जाने का अटल संकल्प ले चुके थे
21:05दुहक और निराशा के काले बादल छंट गए थे और उनकी जगह एक नई उर्जा एक प्रबल आशा तथा एक
21:13द्रिड संकल्प ने ले ली थी जिसने वातावर्ण को प्रकाशित कर दिया
21:18इस प्रकार देवताओं ने ब्रहमा के मार्ग दर्शन में अपने गौरव और सम्रिध्धी को पुनह प्राप्त करने की आशा में
21:26वैकुंट के मार्ग पर अपनी यात्रा आरंभ की
21:30ब्रहमाजी के परामर्ष का पालन करते हुए सभी हताश और आभाहीन देवताक शीरसागर के पवित्र तट पर एकत्रित होते हैं
21:40अपनी खोई हुई कांती और स्वर्ग के पतन से अत्यंत दुखी होकर देवराज इंद्रक शीरसागर की उत्तुम तरंगों को निहारते
21:48हैं
21:50पवन अगनी, वरोन और सूर्य देव अत्यंत पीडित मन से भगवान विश्नु की कृपा पाने की प्रतीक्षा में खड़े होते
21:58हैं
21:59परंपिता ब्रहमा क्शीरसागर के तट पर खड़े होकर सर्वव्यापी भगवान नारायन का ध्यान और पावन आहवान प्रारंभ करते हैं
22:09समस्त देवगन एकाग्रचित होकर अपनी आखे मूंदते हैं और हाथ जोड कर नारायन की स्तुती में पूर्ण रूप से लीन
22:18हो जाते हैं
22:20देवताओं के निर्मल भाव और भक्तिपूर्ण मंत्रों चार से क्शीरसागर की तरंगें दिव्य नीली कांती से प्रजवलित होने लगती हैं
22:30देवराज इंद्र अपने पूर्व अहंकार पर अनुताप करते हुए अश्रुपूरित नेत्रों से लक्षमिक्ती विश्नु से क्शमा की याचना करते हैं
22:40ब्रहमाजी पुरुष सूप्त के पावन चंदों का उच्च स्वर में गान करते हुए विश्नु की अनन्त महिमा का बखान करते
22:47हैं
22:49स्तुती के तीवर होते ही क्शीरसागर के गर्ब से एक अध्भुत और जाजवल्यमान स्वर्ण प्रकाश प्रकट होने लगता है
22:58शीरसागर की विशाल लहरेन दिव्य स्पंदन के साथ नृत्य करने लगती हैं और पूरा वातावर्ण हरिनाम के जाप से गूँच
23:06गुठता है
23:08देवगण अश्रुपून वानी में असुर राज बली द्वारा किये गए स्वर्ग पर अधर्म और अत्याचार का वृत्तान्त सुनाते हैं
23:17अगनी और वरोन देव स्रिष्टी का संतुलन बिगडने और अपने दिव्य अस्त्रों की शक्ती क्षीन होने की व्यथा व्यक्त करते
23:25हैं
23:27महर्शी नारद अपनी दिव्यवीना की मधुर जंकार से देवताओं की प्रार्थना को और अधिक मर्मस्पर्शी बना देते हैं
23:36ब्रहमाजी कातर स्वर में पुकारते हैं कि हे प्रभुक अविलम प्रकट होकर अपने शर्नागत भक्तों का उद्धार कीजिए
23:45देवताओं की कातर पुकार सुनकर शीरसागर का जल सहसा मार्ग देने लगता है और एक अलोकिक द्रिश्य उपस्थित होता है
23:55समस्थ देवतागन पूर्ण रूप से नत्मस्तक होकर शीरसागर की बालू पर लेटकर भगवान विश्णू के प्रती साष्टान प्रणाम करते हैं
24:05समुद्र के मध्य से अनंतनाग की सहसर फणों वाली विशाल चाया के साथ भगवान विश्णू की दिव्य आभा जलकने लगती
24:13है
24:15शीरसागर के उपर चतुर्भुज नारायन की मनमोहक और अलोकिक छवी का मंदमन प्रकाश चारों दिशाओं में फैल जाता है
24:24देवताओं का निराश हृदय पुनहाशा और आनंद से भर उठता है तथा आकाश जैश्री हरी के जैगोश से गूँज उठता
24:33है
24:35भगवान विश्णू की करुनामई उपस्थिती का अनुभव करके ब्रहमाजी और सभी देवगन परम शान्ती प्राप्त करते हैं
24:44जब देवताओं की विवश पुकार से समस्त ब्रहमांड कांप उठा तब ख्षीर सागर के उपर एक असीम और दिव्य प्रकाश
24:52का पुन्च प्रकट होने लगा
24:55देवताओं के घोर अंधकार और निराशा को चीरते हुए भगवान श्री हरी विश्नु अपने अत्यंत सुन्दर और अलोकिक रूप में
25:03गरोड पर सवार होकर अवतरित हुए
25:06चार भुजाओं वाले श्री हरी का नील्मनी समान, श्याम, वर्ण और मस्तक पर चमकता हुआ मुकुट पूरे ब्रहमांड को अपनी
25:14अलोकिक कांती से आलोकित कर रहा था
25:17देवराज इंद्र और समस्त देवगन अश्रुपूर्ण नेत्रों से जगत्पती विश्नु के चर्णों में जुपकर अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगे
25:27दयानिधी भगवान विश्नु ने अपने अभय हस्त को उठा कर भईभीत देवताओं को आश्वस्त किया और उनके दुखों के अंत
25:35का वचन दिया
25:37भगवान विश्नु ने देवताओं को स्मरण कराया कि देवी लक्ष्मी का अपमान ही उनके इस सम्पूर्ण पतन और शक्तिहींता का
25:45मुख्य कारण है
25:47श्री हरी ने रहस्य उजागर करते हुए बताया कि देवी श्री और समस्त दिव्य निधिया इस समय क्षीरसागर की अगाध
25:55गहराईयों में समा चुकी है
25:59भगवान विश्नु ने देवताओं के समक्ष ब्रह्मान के इतिहास की सबसे अभूतपूर्व योजना समुद्र मन्थन का प्रस्ताव रखा
26:08उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल श्रीरसागर को मतने से ही दिव्य अम्रित और देवी लक्षमी पुनह प्राप्त किये जा सकते
26:15हैं
26:17इस महायग्य को संपन्न करने के लिए भगवान विश्नु ने एक कूटनी तिक चाल चलते हुए असुरों के साथ संधी
26:25करने का परामर्श दिया
26:27श्री हरी ने बताया कि इस मन्थन के लिए विशाल मंदराचल परवत को मतानी और नागराज वासुकी को नेती के
26:35रूप में प्रयोग करना होगा
26:37देवराज इंद्र ने शंका व्यक्त की की इस विशालकाय परवत को उखाड़ना और मतना अकेले देवताओं के वश्की बात नहीं
26:45है
26:47तब नारायन ने मंद मुसकान के साथ कहा कि असुरों को अमरित का लालच देकर इस कार्य में सहयोग के
26:54लिए आमंतरित किया जाए
26:57भगवान विश्णू ने देवताओं को सचेत किया कि मन्थन के समय धैर्य रखना होगा और उत्पन होने वाले किसी भी
27:04प्रलोभन में नहीं फंसना होगा
27:07श्री हरी ने गुप रूप से देवताओं को आश्वस्त किया कि वे केवल छल से असुरों की सहायता लेंगे परंतु
27:15अमरित केवल देवताओं को ही मिलेगा
27:18नारायन ने प्रतिग्या ली कि इस सम्पूर्ण महाकार्य में आने वाली हर विघनबाधा का निवारन वे स्वय अपने अवतारों के
27:26माध्यम से करेंगे
27:28भगवान विष्णु के इंदिव्य और आशावादी वचनों को सुनकर देवताओं के बुझे हुए चेहरे पुनह कान्तिमान और उत्साहित हो उठे
27:38ब्रह्मा जी और शिव जी के गणों ने भी भगवान विष्णु के इस दूरदर्शी निर्णय का जैजैकार करते हुए समर्थन
27:46किया
27:47संपूर्ण देवगण भगवान विष्णु के निर्देशानुसार समुद्र मन्थन की महान तैयारियों में जुटने के लिए संकल पबद्ध हुए
27:56परमेश्वर विष्णु अपने परम तेज में अंतरध्यान हो गए जिससे संपूर्ण ख्षीर सागर एक नई अलोकिक उर्जा और आशा की
28:05तरंगों से स्पंदित होने लगा
28:08देधी प्यमान भगवान विष्णु के समक्ष श्रीहीन और शक्तिहीन देवता निराशा के अथा सागर में डूबे थे उनके चहरों पर
28:16लक्ष्मी के श्राप की काली चाया स्पष्ट दिख रही थी
28:20जब भगवान विष्णु ने अपना मुख खोला तो उनकी वानी से निकली दैविये उर्जा ने देवताओं के विचलित मन को
28:28शांत कर दिया और सभा में एक गेहन सम्मान जनक मौन चा गया
28:33विष्णु ने गंभीर्ता से घोशना की यह अमरित मन्थन का कार्य के देवो तुम्हारी वर्तमान शक्ती से कहीं अधिक विशाल
28:42और दुशकर है जिसे तुम अकेले कदापी संपन्न नहीं कर सकते
28:47उन्होंने मन्थन की विराटता का वर्णन किया मानो कोई अग्यात अथा महासागर स्वय हिलोरे ले रहा हो जिसकी गहराईयों में
28:56अंगिनत रहस्य और चुनौतिया छिपी थी
29:00देवताओं ने शुरू में स्वयं की कमजोरी पर स्थब्धता और विरोध व्यक्त किया उनकी आखों में अपनी पूर्व की महिमा
29:07के खो जाने का दर्ध साफ जलक रहा था
29:11विष्णू ने शांत और स्थिर स्वर में यह कठोर सत्य दोहराया तुम अपनी दैविय शक्ती और ओजखो चुके हो तुम्हारी
29:19वर्तमान अवस्था इस महान कार्य के लिए अपर्याप्त है
29:24तब विष्णू ने उस अकलपनिय समाधान का अनावरण किया अमरित मन्थन के लिए तुम्हें अपने चिर्षत्रू असुरों के साथ एक
29:33अस्थाई गठ बंधन करना होगा
29:36देवताओं ने तुरंट इस विचार को अस्वीकार कर दिया, क्रोध और घ्रेना से भर कर बोले हमारे शाश्वत शत्रू
29:43उनके साथ भला कैसे संभव है
29:48विश्नु ने अपनी शांत मुद्रा बनाय रखी और दिव्य ज्यान से समझाया
29:53परिस्थिती की आवश्शक्ता ही तुम्हें यह अप्रत्याशित गठ बंधन करने पर विवश करती है
29:58इसके अतिरिक्ट कोई मार्ग नहीं
30:02उन्होंने देवताओं को यह समझाया कि असुरों को अमरित के शाश्वत प्रलोभन से ही सहयोग के लिए सहमत किया जा
30:09सकता है
30:10एक ऐसी चाल जिसमें छल और रणनीती दोनों नहित थी
30:15विश्णू ने स्पष्ट किया कि यह गठ बंधन केवल अमरित मंधन के विशाल कार्य को संपन्न करने हेतु एक अस्थाई
30:23समझोता होगा
30:24स्थाई मैत्री नहीं
30:26धीरे धीरे देवताओं के मन में रणनीती का बीज बोया गया
30:30और वे इस असहच परंतु आवश्चक गठ बंधन की गहराईयों को समझने लगे
30:36विश्णू ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से विशाल मंदराचल परवत को दर्शाया
30:41मानो वह स्वयंक शीरसागर के मध्य एक विशाल मतनी बनने को तयार हो
30:47फिर उन्होंने नागराज वासुकी का चितरन किया
30:50जो अपनी असीमित शक्ती के साथ मंधन के लिए एक विशाल और शक्तिशाली रसी के रूप में प्रस्तुत होने वाले
30:57थे
30:59विश्णू ने बल देकर कहा कि यह असाधारन कार्य अकेले किसी एक शक्ती से संभव नहीं
31:05इसके लिए देव और असुर्प दोनों के सम्मिलित बल की आवश्शक्ता होगी
31:11देवताओं के चहरों पर धीरे धीरे एक गहरी निराशा और भारीपन छा गया
31:16क्योंकि उन्होंने इस अप्रिय सत्य को स्विकार कर लिया कि उन्हें अपने शत्रों से सहयोग मांगना होगा
31:24भगवान विश्णू ने तब उन्हें दिव्य सुरक्षा और अपने असी मार्ग दर्शन का आश्वासन दिया
31:30जिससे देवताओं के हृदय में एक नई सुक्ष्म आशा का संचार हुआ
31:36और अंत में उन्होंने अमरित का भव्य दर्शन प्रस्तुत किया
31:40वह अनश्वर, जीवन दाई, तेजस्वी अमरित जो उनकी सारी कठिनाईयों का अंतिम प्रतिफल होगा
31:46इस प्रकार देवताओं ने भले ही अनिक्षा से और भारी मन से अपने चिर्शत्रों के साथ एक अस्थाई गठ बंधन
31:56करने की आवश्शक्ता पर अपनी मौन सहमती प्रदान की
32:01भगवान विश्णों के चहरे पर एक शांत विजपूर्ण मुस्कान फैल गई क्योंकि मन्थन की ब्रहमांडिय लीला के लिए रंगमंच अब
32:09पूरी तरह से तैयार हो चुका था
32:12कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
32:16भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमरित मन्थन के प्रस्ताव के साथ
32:24साथ अमरित में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
32:28अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
32:35जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
32:42कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
32:47भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
32:54साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
32:58अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
33:05जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
33:12कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
33:17भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
33:25साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
33:29अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
33:35जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
33:43कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
33:47भगवान विश्नों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
33:55साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
33:59अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
34:06जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
34:13कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
34:18भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
34:25साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
34:29अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
34:36जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
34:43कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
34:48भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
34:55-साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
34:59अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
35:06जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
35:14कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
35:18भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
35:26साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
35:30अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
35:36जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
35:44कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
35:49भगवान विश्णो के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
35:56साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
36:00अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
36:07जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
36:14कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
36:19भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
36:26साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
36:30अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
36:37जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
36:44कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
36:49भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
36:57साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
37:01अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
37:07जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
37:15कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
37:19भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
37:27साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
37:31अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
37:38जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
37:45कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
37:50भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
37:57साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
38:01अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
38:08जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
38:15कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
38:20भगवान विश्नों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
38:28साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
38:31अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
38:38जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
38:46कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
38:50भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
38:58साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
39:02अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
39:09जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
39:16कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
39:21भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
39:28साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
39:32अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
39:39जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
39:46कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
39:51भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
39:58साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
40:02अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
40:09जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
40:17कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
40:21भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
40:29साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
40:33अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
40:39जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
40:47कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
40:51भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
40:59साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
41:03अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
41:10जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारिया शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
41:17कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है
41:22भगवान विश्णों के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
41:29साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
41:33अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
41:40जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोड का आधार बनेगी
41:47कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
41:52भगवान विश्नो के मार्ग दर्शन में देवता असुरों के पास जाते हैं और उन्हें अमर्त मन्थन के प्रस्ताव के साथ
42:00साथ अमर्त में हिस्सेदारी का लालच देते हैं
42:03अमर्ता के वर्दान की लालसा में असुर अंत्य देवताओं के इस प्रस्ताव को स्विकार कर लेते हैं
42:10जिससे महास्मुद्र मन्थन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जो अगले एपिसोर का आधार बनेगी
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