00:00शुरू करते हैं आज का ये दिल्चस्प सफर आज के इस तफसिली जाइजे में हम एक ऐसी अजीम हस्ती के
00:05बारे में बात करने वाले हैं जिनका नाम तारीख के सफात पर सुनेहरी हुरूफ में लिखा है।
00:11जी हां हम बात कर रहे हैं मारूफ सुफी बुजर्ग, मुफक्र और शायर शाह अब्दुल्लतीफ भुटाई की। हम मिलकर देखेंगे
00:18के आखिर कैसे उनका कलाम आज भी लाखों दिलों की धरकन है और किस तरह उनकी बेमिसाल शायरी ने पूरी
00:25एक तहजीब को एक नई पह�
00:39दाद है जो हर साल भट्शा में जमा होते हैं ये महवजिक मजमा नहीं बलके शाह अब्दुल्लतीफ बताई कि इस
00:46बेपना और सहर अंगेज असर का सबसे वाज़ सुबूत है जो सद्या गुजर जाने के बाद भी बिलकुल इसी शान
00:52से कायम है तो आगे बढ़ने से पहले
00:55एक नजर इस बात पर डाल लेते हैं कि आज किन किन पहलूँ पर बात होगी हम शुरुआत करेंगे एक
01:01सूफी शायर की अजीम मिरास से फिर मशूर शाह जो रिसालों पर बात होगी उसके बाद इसके बाद इसके इलाही
01:06के अबवाब फिर भट्शा में मौजूद तारीखी
01:23बटाई को बिला शुबा सिंधी जबान का सबसे अजीम मुस्लिम शायर माना जाता है उनके जिन्दगी की टाइम लाइन को
01:30देखना काफी दिल्चस्प है ये सफर शुरू होता है भट्शा की उसी पुरसकून करार जील के किनारे से जहां बैठकर
01:37उन्होंने अपना कलाम त
01:53लिरी क्लिंटन ने भी खास तोर पर इस दरगाह का दौरा किया और दौरे हाजर में आज भी वहां आइंदा
01:59सालाना और्स की तैयारियां पूरे जोरो शोर से जारी रहती हैं गोया ये कैसा तारीखी सिलसला है जो कभी नहीं
02:06तूटा हिस्सा दोम शाहजर असालो एक अजीम
02:33अजीम शाहकार
02:40ये ही शाहकार है ये इस खिते की रूह का हिस्सा बन चुका है इस शाहकार को गहराई से समझने
02:46के लिए एक खास इस्तिला को जानना बहुत लाजमी है और वो लवज है सुर शाह जो रिसालों में कुल
02:53मिलाकर तीस मुख्तलिफ सुर यानि अबवाब मौजूद है अब इन म
03:09में एक अलग ही रूहानी कैफियत महसूस होती है हिस्सा सूम इश्क इलाही के अबवाब शायरी और लोक दास्तानों का
03:16संगम
03:17और ये बात वागी दिल को छो लेने वाली है कि इन तीस अबवाब में महज रवायती अंदाज बयान नहीं
03:24अपनाया गया बलके इन में सिंध की मिटी से जुड़ी मकामी दास्तानों को क्या खुबसूरती से पिरोया गया है हम
03:31देखते हैं कि कैसे सुर कल्यान में रब ताल
03:46के मुशूर किस्से हैं जो बजाहिर तो लोगदास्ताने हैं लेकिन दरसल इनके जरीए इश्क हकीकी की मनजिलों को समझाया गया
03:53है और प्लेर सुर्राम कली जोगियों और फकीरों की खटन जिंदगी को एक जबरदस्त खिराजेते सीन पेश करता है हिस्सा
04:00चहारुम भट �
04:02में दरगाह एक अजीम यादकार अब तक तो हमने उनके कलाम पर बात की लेकिन अब इस तहरीरी शकल से
04:09निकल कर एक जीती जाकती इमारत की तरफ चलते हैं हम बात कर रहे हैं इस अजीम यादकार की जो
04:15भट चा के मुकाम पर मौजूद है जोगराफियाई लिहास से देखा
04:30मिया गुलामशा कलोडो ने नहायत अकीदत के साथ तामीर करवाया था अब अगर इसकी इमारत पर गोर किया जाए तो
04:37ये हिंद इसलामी तरजी तामीर का एक इंतहाई शांदार और क्लासिक नमूना है इसमें कदम रखते ही एक वसी और
04:44खुला मरकजी सहन नजर आता है और
04:46पूरी इमारत रिवायती गुंबदों से गिरी भी महसूस होती है लेकिन जो चीज सबसे ज़्यादा तवज्जा खेंचती है वो है
04:53इस पर लगी हुई नीले और सफैद रंग की नफीस सिंधी टाइलें ये टाइलें इतनी बारी की और मेहनत से
05:00लगाई गई है कि आँखे �
05:01दंग रह जाती है और हाँ इसी एक ही एहाते के अंदर मजार भी मौजूद है और एक खुबसूरत मस्जिद
05:07भी शामिल है हिस्सा पंजम दरगा की रिवायात एक जिन्दा रिवायत अब यहाँ जो सबसे ज्यादा दिल्चस्प चीज सामने आती
05:16है वो इस मजार की रोजमर
05:30और मुकदस तरीन हिस्सा है जिसे अंदरूनी हरम कहते हैं उसकी देखभाल की तमाम तर जिम्मेदारी खवातीन निभाती हैं है
05:39ना कमाल की बात जबके बाहर इस बड़े से सहिन में मर्द हजरात टोलियों की शकल में जमा होते हैं
05:45और शाह भुटाई की शायरी को उनके मख
05:48सूस सुरों में गुन-गुनाते हैं एक ही मकाम पर ये कैसा जबरदस दवाजन और हम आहंगी है और इस
05:55हम आहंगी की एक और बहुत बड़ी मिसाल इस दरगा का बैन-ुल-मजहब असर है गैर जानिब दाराना तोर
06:03पर दिखा जाये तो ये जगा सिर्फ मुसल्मानों के लि
06:17और बाकाइदगी से अपनी अकीदत का इजहार करने यहां तश्रीफ लाती है आखिर ऐसा क्यूं है इसका जवाब हमें शाह
06:27सहब के अपने कलाम से ही मिल जाता है उनका बन्यादी पैगाम ये था कि लतीफ की शायरी हर अकीदे
06:34के एहतराम का दर्स दीती है ये कोई मामूली
06:37बात नहीं है यही वो सोच है जो मुख्तलिफ मजाहिब के मानने वालों को आज के इस दोर में भी
06:43एक ही छट के नीचे बगएर किसी तफरीक के बड़े प्यार और इहतराम के साथ जोड़ कर रखती है
06:49हिस्सा शेशम सालाना उर्स का तहवार विसाले इलाही का जश्न
07:19अपने महबूब यानि खुदा से जा मिलती है तो ये गम का नहीं बलकि विसाले इलाही की खुशी का मौका
07:26होता है
07:26अब जाहिर है कि इतने बड़े तहवार का एक खास वक्त भी मुकरर है
07:31ये रुहानी अज्टिमा हर साल इसलामी कैलिंडर के मताबिक माह सफर की तेरवी तारीख को शुरू होता है
07:38ये वो तारीख है जिसे लाखों लोग अपने कैलिंडर्स पर निशानज़त करके रखते हैं और पूरा साल इसका शिदद से
07:46इंतिजार करते हैं
07:48और मज़े की बात ये है कि ये कोई भूली बिसरी कहानी नहीं है आज इस वक्त भी अगर हम
07:54हालाते हाजरा पर नज़र डालें तो आएंदा होने वाले इस अजीम सालाना इज्टमा के लिए बाकाइदा सरकारी इजलास हो रहे
08:02हैं और तैयारिया नहायत जोरोशोर से जारी ह
08:05गोया हर साल एक नई तवनाई के साथ इस रवायत को फिर से जिन्दा किया जाता है तो इन तमाम
08:13हकाइक और पहलों को जानने के बाद अब जहन में एक बहुत ही गहरा सवाल पैदा होता है वो ये
08:19के आखिर अठार्वी सदी के एक शायर का कलाम आज की इस तेज तरीन और ब
08:34करती है कि सची महबत और अमन का पेगाम सदियों और सरहदों का मोहताज नहीं होता और इसी सोच के
08:41साथ हमारा आज का ये मालूमाती सफर यहीं अखताम पजीर होता है
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