00:00इस नई एक्स्प्लेनर में हम सिंध के एक ऐसे कस्पे की बात करेंगे जो बजाहिर तो बहुत खामोर सा है
00:05लेकिन उसके अंदर सदियों की तारीक छुपी है जी हाँ हम बात कर रहे हैं जंग शाही की एक ऐसी
00:11जगा जो रिवायती हुनर और एक बहुती खास माहोलियाती एहम
00:28है क्या ये बस रास्ते में आने वाला एक आमसा कस्पा है या फिर इस खामोशी के पीछे कोई बहुत
00:34ही शांदार कहानी मौजूद है तो इस सफर का रोड मैप कुछ यू होगा हम उसकी एक पुराने तारीही जंक्शन
00:40से शिरुआत करेंगे फिर वहां के पत्थर तराशनी
00:42के फन को देखेंगे कुछ रिवायती मीठे का जिकर होगा हलाजी जील की वायल लाइफ पर बात करेंगे और आखिर
00:49में देखेंगे कि जदीब जंक्शाही का मुस्तक्बिल कैसा नजर आता है तो सबसे पहले बात करते हैं एक फरामोश शुदा
00:55तारीही जंक्शन की और इस
01:10लाइन वन पर बनने वाले स्टेशन ने इस चोटे से इलाके को पूरे बरे सगीर से जोडने में एक बहुत
01:15यहम किरदार अदा किया था और अगर बरतानवी एंजिनियरिंग की बात करें तो यहां एक ऐसा शाकार आज भी मौजूद
01:21है जो वाकई हैरान कर देता है ट्रैक्
01:37अगर माजी और हाल का मवाजना करें तो एक बहुत बड़ा फर्क नजर आता है एक वक्त था जब यह
01:42स्टेशन एक मस्रूफ तिजारती मरकस था यहां से हाली जी जील की मचली और मकामी दूद बरी मिकदार में लाहौर
01:49और कराची जाता था लेकिन आज आज आज यह बस ए
02:06इर्दगिर्द के पहाड किस तरह इस कष्बे की महिशत को चलाते हैं यह पूरा कष्बब ऐसे पहाड़ों में घिरा है
02:12जो माधनियाद से माला माल हैं मदब यहाँ सैंस्टोन मिलेगा शीशे के तायारी के लिए Silika मिलेगा और कॉस्मेटिक्स में
02:19इस्तमाल होने वाला Lime st
02:20साथ ही जिपसम और फ्लिंस्टोन भी मौझूद हैं। और यह कोई आम फ्लिंस्टोन नहीं है। यह बिलकुल वही पत्थर है
02:26जिसे पंदरमी सदी में मकली हिल्स के किलों को मजबूत बनाने के लिए इस्तमाल किया गया था। तो यह कहना
02:32गलत नहीं होगा कि यह महस पत्थर �
02:34बलकि तारीख के मेमार है। और इसी के करीब जंपीर के अलाके में अगर देखें तो अंदाजन 25 मिलियन यानि
02:41धाई करोड मेट्रिक टन कोईले की जखायर मौझूद है। यह एक बहुत बड़ा नंबर है। फिलहाल यहां से सालाना 20
02:47,000 टन कोईला निकाला जा रहा है। ज
03:03एक आयलगर, मकामी, कौट साइट और ग्रेनाइट के पत्थरों को इतनी महारत और बारिक बीनी से तराशते हैं कि अकल
03:09दंग रह चाती है। दरसल यह सिर्फ एक रोजमरा का औजार नहीं बलकि सदियों पुराने फन का एक जिन्दा सबूत
03:15है। चलें, अब पत्थरों से �
03:17कर जरा तारीख के मीठे जाएके की तरफ चलते हैं। जंग शाही के मकामी शाही बाजार में दाखिल होते ही
03:23जो चीज़ सबसे ज़्यादा तवज़ा खेंचती है, वो है यहां की मशूर बालु शाही। कहा जाता है कि यह एक
03:28ऐसी मिठाई है जिसने कभी आखरी मोगल बा�
03:45जाते हैं कि यह मूँ में घुल जाने वाली खास मिठाई जंग शाही से ही आई है। अब यह मिठाई
03:51बंती कैसे है, यह प्रोसेस में बड़ा दिलचस्प है। आटा गून कर उसे पंदरा मिनट छोड़ दिया जाता है, फिर
03:57उसकी कमसकम दस तहें बनाकर उसे पूरे तीस म
04:12मिठ बोया जाता है। और बस यही वो चीज है जो इसे एक सचा शाही जायका देती है। मिठाईयों के
04:18बाद जरा रुख करते हैं फितरत का। बात हो रही है हाली जी जील वाइल लाइफ सैंक्चरी की। यह पानी
04:25का एक बहुत ही बड़ा जखीरा है जो ठट्टा से तकरी�
04:2824 किलोमेटर के फासले पर मौजूद है। इस जील की हिस्ट्री बड़ी हैरान कुन है। 1930 की दिहाई में जब
04:35दूसरी जंगे अजीम चल रही थी तो बरतानवी फोज ने उसे पानी की सप्लाई के लिए बनाया था। लेकिन फिर
04:401972 में इसे बाकाइदा वाइल लाइफ सैंक्
04:55कमाल है। लेकिन एक मिनट जील की इस पुर्च सकून सता को देखकर धोका मत खाईएगा। इस पानी के नीचे
05:02मगर मच बसने हैं। इसे लिए यहां बोटिंग करने की बिलकुल इजासत नहीं है। वाइल लाइफ बॉर्डन का भी यही
05:07कहना है कि उनकी सबसे बड़ी जिम
05:23जंग शाही की कि आजकल उसके क्या हालात हैं और मुस्तक्बिल के हवाले से क्या इमकानात मौजूद हैं। देखिए ऐसा
05:30नहीं है कि यहां जिन्दगी रुग गई है। जंग शाही में बुनियादी सहूलियात बिलकुल मौजूद है। एक रूरल हेल्स सेंटर
05:36है जो एमर
05:49पुश्किल 15-20 पारसल ही आते जाते हैं और एक पुरानी धर्म शाला जो तकसीम से पहले हिंदू यात्रियों के
05:55लिए बनाए गई थी और बिलकुल वीरान पड़ी है। लेकिन इन तमाम चीजों के बीच एक बहुत ही जबरदस्त और
06:01पॉजिटिव तबदीली भी आ रही ह
06:03मौाशी जमूत को तोड़ने के लिए रिहान फाउंडेशन जैसे एतारे यहां डिजिटल लिटरिसी पर काम कर रहे हैं। वो मकामी
06:09लोगों को स्मार्ट फोन्स और इंटरनेट का इस्तमाल से खा रहे हैं। और इसका मकसद क्या है? मकसद यह है
06:14कि ये लोग अपने हुनर को
06:15अपनी इस शांदार बालू शाही और पत्थर के काम को सिर्फ जंग शाही तक महदूद ना रखें बलके पूरी दुन्या
06:21के सामने लेकर आएं। और ये सब देखकर एक बहुत ही एहम सवाल जहन में उभरता है कि अगर डिजिटल
06:27लिटरिसी और कल्ट्रल टूरिजम को सही
06:30मानों में इस्तमाल किया जाए तो क्या हम दुनिया भर के ऐसे हजारों फरा मोश शुदा कजबों की तक्दीर नहीं
06:36बदल सकते हैं। जंग शाही तो सिर्फ एक मिसाल है। दुनिया में ऐसी बेशुमार जगे हैं जिनके अंदर जबरदस्त, मौशी
06:42और सकाफती टालेंट �
06:43चुपाए। बस देर है तो उन्हें दर्याफ्त करने और दुनिया से जोडने की। क्या हम ये कर पाएंगे। ये एक
06:49ऐसा सवाल है जिस पर जरूर सोचना चाहिए।