00:09तो चलिए आज के इस दिल्चस्प जाइजे का आगाज करते हैं
00:13हम सिंद के एक इंतहाई रोशन और हैरत अंगेज जिला
00:16खैरपूर के कसीरल जहती खजानों पर रोशनी डालेंगे
00:19ये एक ऐसी जगा है जो तारीख के औराक, सकाफत और आला मेयारे जिंदगी का एक बेहतरीन मजमुआ पेश करती
00:26है
00:26जरा तसवर करें एक ऐसी जगा जहां अठारवी सदी के शाही महलात भी हूँ
00:32मीठे और लजीज हलवे के दो सो से जाइट स्टॉल्स भी हूँ
00:35और जहां खुजूर के लाखों दरख लहला आ रहे हूँ
00:38ये कोई खयाली दुनिया नहीं बलकि एक ही जिले की कहानी है
00:41जो मतनवे, तारीखी, जराई और सकाफती रंगों से भरा हुआ है
00:46आज के सफर में हम जिन एहम पहलों का जाइजा लेंगे
00:49उन में शामिल हैं तालपूर खांदान के अजीम महलात, कोट टीजी और महरानो रिजर्फ, आलमी शोहरत याफ़ता असील खजूर का
00:57मरकस, रिवायती मुसानी हलवा और खैरपूर का तालीमी मुस्तपिल
01:01तो सबसे पहले बात करते हैं तालपूर खांदान के महलात की, जो दरसल सिंद का एक शांदार शाही विर्सा हैं
01:08यहां जो बात वाकई तवज्ज तलब है, वो इस अलाके की तीजी से बढ़ती हुई तारीखी तामीरात हैं
01:141797 में कोट तीजी की ले की तामीर से लेकर फोरण बाद फैज महल का बनना और फिर 1955 में
01:21इस रियासत का बाकाइदा पाकिस्तान में शामिल होना
01:24यह सब एक इंतहाई दिल्चस्प और टेज रफ़तार सफर रहा है
01:28मिसाल के तौर पर फैज महल को यह ले लीजे
01:311798 में बनने वाला ये महल उस वक्त तालपूर ताज का सबसे चमकता हीरा समझा जाता था
01:36उसकी 16 इंतजार गाहें और शीशे का वो आला तरीन काम जिसके बाइस इसे शीश महल भी कहा जाता है
01:43ये उस दोर की बेपना शाही दौलत और फनकाराना महारत की जीती जागती तस्वीर है
01:49महलात की इन अजीमों शान दीवारों से निकल कर अब हम कोट डीजी और महरानों रिजर्व की तरफ परते हैं
01:55जो अपनी बेहतरीन दिफाई हिकमत अमली और कुद्रती पनागाहों के लिए मशूर है
01:59अब यहां एक कमाल का तजाद देखिए
02:02एक तरफ तो फैज महल की इंतिहाई नाजोग, फनकाराना और शाही ऐशो इश्रत है
02:07और दूसरी तरफ कोट डीजी केले का मजबूत दिफा
02:10तीस फुट उंची दिवारे और चूना पथर की पहाड़ी पर पक्की इंटों से बनी ये अजीम इमारत
02:16जो खास तोर पर इसलिए बनाई गई थी ताकि दुश्मन की भारी तोपों का डट कर मुकाबला किया जा सके
02:22और किले की सक्त फिजा के बिलकुल ही करीब महरानो रिजर्व वाकिया है
02:26खुश्क तारीही अमारत के बिलकुल बाराक्स एक नहायत सरसब्स और पुरसुकून माहुलियाती पनागा है
02:32यहां शिकार पर मुकमल पाबंदी है जिसकी वज़ा से नायाब काले हिरन और पाड़ा हिरन जैसे जानवर यहां खुलियाम घुमते
02:38हैं
02:39जीलों पर सेकड़ों बथों का मनजर तो वाकि देखने से तालुक रखता है
02:43तारीख के इन औराक से आगे बढ़ते हुए अब हम जिक्र करते हैं खैरपूर की मईश्चत के सबसे बड़े महर्रक
02:49का यानि असील खजूर का आलमी मरकज
02:53जरा इस अदद पर गोर करें
02:55दो सौ जी हाँ खैरपूर में खुजूर की दो सौ से जाइद अखसाम पैदा होती है
03:00चार हजार साल पुरानी काश्ट की तारीख के साथ ये इलाका आलमी जराई सतय पर एक बहुत बड़ा नाम बन
03:06चुका है
03:07ये बलकुल एक जराई दियो की हैसियत रखता है
03:09इन सब में जो किसम सबसे ज़्यादा चमकती है वो है असील खुजूर
03:14उसका सुनहरी अंबरी रंग, इंतिहाई नर्मगूदा और कैरमेल और शेह जैसी मिठास उसे दुनिया भर में मशूर बनाती है
03:22दर्याई सिंद की मादनियाद से भरपूर मिठी और शदीद गर्मिया
03:26इन दोनों का मिलाप इन बेहद मीठे फलों के लिए बिलकुल आदर्श महौल फराहम करता है
03:31और मज़े की बात ये है कि इन कदीम फलों को अब बिलकुल जदी तरीकों से इस्तमाल किया जा रहा
03:36है
03:36खजूर का पेस्ट एनरजी बार्स में डलता है, इसका सिरफ वीगन मिठास के तोज़ पर इस्तमाल होता है
03:41यहां तक कि इसका पाउडर स्मूदीज में भी शामल किया जाता है
03:44यह देखना वाकई शांदार है कि कैसी हिवजाने सिहत की असूलों पर तैयार होने वाली ये रिवायती पैदावार
03:50आज 30 से जाइद ममाले की फूड इंडस्ट्री की ज़रूरियात पूरी कर रही है
03:54खजूरों की इस आलमी मंडी से वापस आते हैं मकामी सता पर
03:58जहां हम टंडो मस्ती के मशहूर मौसानी हलवे का जिकर करेंगे
04:01एक मकामी शक्स के नाम से मनसूब ये हलवा अजीब बात है कि आज एक पूरी की पूरी मार्केट बन
04:07चुका है
04:08एक आम सी शुरुआत और आज वहां 150 से लेकर 200 तक मुखतलिफ स्टॉल्स मौजूद है
04:13एक इलाकाई मीठे का इस तरह एक नई मकामी इंडस्ट्री को जनम देना किसी कमाल से कम नहीं है
04:20और उसका जाइका इतना खास क्यों है? क्योंकि इसकी बनने का तरीका आज भी बिलकुल असली और देसी है
04:26खालिस भैस के दूद को लकड़ी की खुली आग पर उबाला जाता है
04:30फिर उसे फाड़ कर चीनी के साथ पूरे दो घंटे तक मुसलसल पकाया जाता है
04:34यह जो मेहन तलब काम है यही इसे बनावटी मिठाईयों से अलग और इंतहाई लजीज बनाता है
04:40खैरपूर की इस जानदार जाइजे में यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि यह जिला तालीम के जरीए अपना
04:45मुस्तक्बल कैसे समार रहा है
04:47बालाई सिंथ में शाह अब्दुल्लतीफ युनिवरसिटी वाहिद युनिवरसिटी है जो 302 एकड के वसी रखबे पर पहली हुई है
04:54और इसमें 29 मुख्तलिफ शोबे काइम है आसारी कदीमा के मकामाद और सरसब्स मनाजर के दर्मियान ये इदारा मकामी आबादी
05:02के लिए एक मजबूत तालीमी बुनियात का काम कर रहा है
05:0413,000 से जाइद तुल्बाउ तालिबात यहां आला तालीम हासिल कर रहे हैं
05:09ये युनिवरस्टी नहाइद काम्याबी से इस खिते के नौजवानों को परवान चड़ा रही है ताकि वो आज की इंतहाई मसापकती
05:16मार्किट के तकाज़ों को पूरा कर सकें
05:18लेकिन इन तमाम रोशन पहलों के साथ-साथ एक इंतहाई संजीदा मसला भी है
05:23जरात और तालीम में तरक्की तो हो रही है मगर पिछले वक्तों की वो शांदार महलात और अजीन तारीखी मकामात
05:29अदमे तवज़ी की वज़े से आहस्ता हिस्ता खस्तहाली का शिकार हो रहे हैं
05:33इनका तहफुस वक्त की एहम तरीन जरूरत बन चुका है
05:36तो आखिर में ये बुनियादी सवाल जहन में आता है कि क्या खैरपूर की ये नाकाबल यकीन तारीख इसकी मुनफरिद
05:43पक्वान की रिवायात और इसकी जदीद सलाहियतें आने वाली नसलों के लिए महफूज रह सकेंगी
05:48जरूरत इसमर की है कि हम जदीद मौशी तरक्वी और इन अन्मोल सकाफती खजानों की हिफाज़त के दर्मियान एक तवाजन
05:55कायम करें
05:55क्या हम ऐसा कर पाएंगे ये एक ऐसा सवाल है जिस पर हम सब को ठहर कर जरूर सोचना चाहिए
06:18क्या चाहिए
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