00:09आज के इस तफसीली जाइजे में चलिए चलते हैं सिंद के उन तपते सहराओं और उर्टी रेत की तरफ चाह
00:15हजारों साल पुरानी कहानिया आज भी खामोशी से दफन हैं
00:18हमें अजीब और शांदार चुपे हुए वरसे की गहराई में उतरेंगे
00:21ये एक ऐसा जबरदस सफर है जो एक बिलकुल तबाहाल और गुमशिदा शहर की बिक्री इंटों से शुरू होता है
00:27और फिर वहां से होता हुआ एक ऐसे जिन्दा और मुथर्रिक महौलियाती निजाम तक जाता है जो आज भी सخت
00:32तरीन खिते की बका का जामन है
00:34तो आईए इस कहानी को समझते हैं जो सिर्फ तारीख की पुरानी किताबों में नहीं बलकि आज भी वहां की
00:39हवा और फसलों में महसूस की जा सकती है
00:41अब बजाहिर अगर सोचा जाए तो तारीख, महौलियात और सहरा की एक चोटी सी सबजी इन बिखरे वे टुकड़ों का
00:48आपस में भला क्या दालोग हो सकता है
00:50लगता है ना कि इनका आपस में कोई जोड़ी नहीं
00:52लेकिन हकीकत में ये सब मिलकर बका और मुसलसल जद्व जाहित की एक ऐसी अजीम दास्तान बनाते हैं जो किसी
00:58को भी हैरान कर दे
00:59जब हम इन कड़ियों को जोड़ कर देखते हैं तो ये जानना वाकई बहुत हैरान कोन होता है
01:03कि माजी की शांदार रिवायात, पुर्शिक्वा केले और आज के सखतरीन हालात असल में एक ही धागे में परोई हुए
01:10है
01:10तो इस सफर का रास्ता कुछ इस तरह तैह होगा
01:13सबसे पहले हम अगहम कोट के खंडर देखेंगे फिर वहां की गुमशुदा इल्मी मरकज पर बात होगी
01:18उसके बाद उमर कोट जो के अगबर की जाय पैदाइश है उसकी तरफ बढ़ेंगे
01:22उमर मारवी की अजीम दास्तान का जिकर होगा और आखिर में चबडी जो के वाकिए एक सहराई मोज़ा है उसे
01:28समझेंगे
01:29तो चलिए अपने पहले से से इस कहानी का आगास करते हैं और देखते हैं अगम कोट के खंडर जो
01:35सिंद का एक बिलकुल भुलाया गया मरकाज है
01:38कदीम जमाने में ये शहर यानी अगम कोट सुमा लोहाना का एक इंतहाई एहमदारोल अकूमत था
01:43लेकिन आज आज ये मुझरिमाना गफलत का शिकार है जरा कदीम अगम कोट के उरूच का तसवर कीजिए
01:49किसी दोर में ये दरियाए सिंद की एक शाख पर वाके एक नहायत मस्रूफ बंदरगा हुआ करता था
01:55तसवर करें उन तिजारती कश्टियों का जो यहां लंगर अंदाज होती थी और उन बाज़ारों का जहां हर वक्त रोनक
02:00रहती थी
02:01और अब अचानक से इस दिल खराश हकीकत पर नज़र डालें
02:05ये अजीम शहर अब महस मट्टी के धेर में तबदील हो जुका है
02:08हालात यहां तक खराब हैं कि इन कदी मसाज़ित की इंटों तक को नहीं छोड़ा गया
02:13और हालिया तबाक उन सेलाबों ने पुरानी कबरों को इस हद तक नुक्सान पहुंचाया है
02:17कि इनसानी हड़िया मट्टी से बाहर आ गई है
02:26आगे बढ़ते हैं अपने दूसरे हिस्ती की तरफ
02:29यह वो वक्त है जब यह जगा सिर्फ तिजारत नहीं बलके इल्म कभी एक अजीम मरकज थी
02:33गुमशुदा मदारिस और मसाज़ित की कहानी
02:36इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है
02:38लेकिन दरा सोचिए कि उस वक्त जो शेहर बिलकुल वीरान और खाकालूद है
02:42वहां के एक ही मकामी मदरसे में उस वक्त एक साथ पांच सो तालबे इल्म तालीम आसल कर रहे थे
02:48मुहमद बिन कासिम की सिंदामत के बाद अगम कोट सिर्फ एंटों और बाजारों का शेहर नहीं रहा था
02:53बलकि ठठा के बाद इसलामी उलूम और तहकी का सबसे बड़ा मरकज बन गया था
02:58दूर दरास के लाकों से लोग इल्म की प्यास बजाने के लिए यहां का रुक करते थे
03:02यह मदरसा मशूर आलिम मखदूम इसमाईल सुमरों की जेरे निगरानी चलता था
03:06वहां तालीम की ऐसी शानदार मेफिलें सजा करती थी जिनकी गूंच सच में आज भी तारीक के इन नौराक में
03:12महसूस होती है
03:13और इसी शानदार दोर की एक नहायत खुबसूरत याद एक शेरी मादा ये तारीख है
03:18जो कभी वहां की मशूर पतन वाली मस्जिद पर कुंदा हुआ करता था
03:21अल्फास थे जामया जहानिया जन्नती जिसका मतलब है दुनिया के लिए एक जन्नती मस्जिद
03:27अर्बी और फारसी के इन अल्फास का हिसाब लगाया जाए
03:29तो इस अजीम जामया मस्जिद की तामीर का साल 797 हिज्री बनता है
03:34अब ये एहसास कितना दर्दनाग है
03:36है ना एक ऐसी जगा जिसे कभी दुनिया के लिए जन्नत का टुकड़ा कहा गया
03:40आज इस कदर जमीन बोस हो चुकी है
03:42कि उस मस्जिद की एक महराब या दिवार तक सलामत नहीं बची
03:45वो लफज अब सिर्फ किताबों के सफों में कहती बन कर रहे गए हैं
03:48खेर उमर कोड की तरह बढ़ते हैं जो हमारा तीसरा हिस्सा है
03:52अकबर की जाए पैदाइश और बादशाहों का किला
03:56खेंडरों की धूल से निकल कर अब एक ऐसी जगा चलते हैं
03:59जिसे ताकत और पत्रों ने थोड़ा महफूज रखा है
04:01हम उमर कोड की उस तवील और पेचीदा सियासत की तारीख में कदम रख रहे हैं
04:06ये एक ऐसा किला है जो हर दोर की जंगों और मसलों से बेनियाज सहरा के सीने पर तन कर
04:11खड़ा रहा
04:11अगर साल 1542 के उस नाजुक तरीन वक को याद किया जाए
04:15जब मुगल बादशाह मायूं शेरशा सूरी से शिकस्त का कर सहरा में बैटक रहा था
04:19तब इसी कले के सोधा राजपूतों ने अपनी रिवायात निभाते हुए उसे पना दी थी
04:24और फिर वहीं पर मुगल सल्तनत के अजीम तरीन शेहनशा अकबर की पैदाईश हुई
04:28उसके बाद मसलसल बगावतों और हमलों का सामना करते हुए
04:32ये कला मुगतलिफ हुकमरानों के हाथों से होता हुआ
04:34बिलाखिर 1843 में बरतानवी सल्तनत के जेरे तसल्लत आ गया
04:38इन पत्थरों की मजबूती और इन उची फसीलों की हैबत का अंदाजा लगाना भी एक तज़रा पीछे मुड़कर देखें
04:45कितने ही रेत के तूफान, कितने ही सरकश आंधियां और कितने ही हुखार लशकर इस कले की दिवारों से टकरा
04:52कर वापस लौट गए
04:52दरसल ये महज एक इमारत नहीं है, ये इस खित्ते की पाइदारी का एक बिलकुल जिन्दा शाकार है
04:58इसने सद्यों तक ताकतवर हुकमरानों को पना दी है, तवील महासरे बरदाश की हैं
05:03और सच तो ये है, कि आज भी ये थरके सहरा में माजी की एक खामोश लेकिन नहायत शांदार गवाही
05:10दे रहा है
05:11चौते एसे में हम इस किले की दीवारों में दबी एक और आवास सुनेंगे
05:15उमर मारवी की दास्तान और इस किले में लोक विर्से की कौन्च
05:19देखिए, तारीक सिर्फ बाच्शाओं के जाहो जलाल, खोनी जंगों और तखतो ताज की सियासत का नाम नहीं होती
05:25इस किले की दीवारों में एक ऐसा इनसानी पहलू, एक ऐसा दर्द भी छुपा है, जो वहां की मट्टी में
05:30पूरी तरहा रचबस किया है
05:32ये मारवी की दास्तान है
05:34मारवी जो कि एक गरीब मगर इंतहाई खुदार मकामी धरी लड़की थी
05:38उसने इस इस इलाके के ताकतवर हकुमरान उमर की तरफ से पेश की गई शाही महल की तमाम आसाईशों को
05:44ठुकरा दिया
05:45उसने तख्त की मलका बनने के बजाए इनी तारीख दिवारों के पीछे बरसों की कैद को चुन लिया
05:50अपनी मट्टी से उसका ये इश्क, उसकी ये गुर्बानी, उसे आज भी इस पूरे खिते में वफा, हिम्मत और जमीन
05:57से जुड़े रहने की एक लाजवाल अलामत बनाती है
06:00ये सब तो तारीख के और आक थे, शानो शौकत, जवाल और महबत की दास्ताने
06:05लेकिन या एक बहुत बड़ा सवाल पैद होता है
06:07इस सख्त और कठन सहराई महाल में आज के दौर में इनसान कैसे जिन्दा रहते हैं
06:12आखिर वो क्या चीज़ है जो सूरज की आग बरसाती किरनों और पानी की शदीद कमी के बावजूद यहां जिन्दगी
06:18की दोर को तूटने नहीं देती
06:19तो आईए अपने आखरी और पांचवे हिस्से की तरफ बढ़ते हैं
06:22चिबडी एक सहराई मोजज़ा और सहराई थर में बका का राज
06:26बका का वही सवाल हमारी तवज़ा थर के सहरा की एक नहायत मतहर्रिक और जिन्दा वर्से की तरफ खिंचता है
06:33ये एक छोटी सी मकामी सबसी है जिससे चिबडी या चिबड कहां जाता है
06:37और यकीन मानिये, यह किसी मौज़स से कम नहीं
06:39हैरत की बात तो यह कि यह बिलकुल खालिस, खुद्रती और और्गैनिक फसल है
06:44इसे उगने के लिए किसी किसम की कीड़े मार अदवियात या केमिकल की जरूरत ही नहीं पड़ती
06:48जब कहट साली होती है, बारिश का नाम और निशान नहीं होता, तब भी यह मामूली सी नमी से रेच
06:53चीर कर बाहर आ जाती है
06:54मई और जून की इन जान लेवा गर्मियों में, जब जिसम कतरे कतरे पानी को तरसता है
06:58तो ये चोटी सी सबजी सहराई लोगों में डी हाइडरिशन को दूर करती है और निजामे हाजमा की कई संगीन
07:04बेमारियों से बचाती है
07:05सच में, ये फितरत का एक ऐसा तौफा है जो मुश्किल तरीन हालात में जिन्दगी की जमानत देता है
07:11मकामी लोगों की इस फसल के साथ महबत और लगाओ का अंदाजा इस पात से रगाएं
07:15उमर कोट के एक मकामी रहाईशी हैं, अशोग भाई
07:17वो नहायत दिल्चस्प अंदाज में मुस्कुराते हुए ये दावा करते हैं
07:21कि अगर कोई इस चिबडी का मज़ा चक ले और उसे पका कर खा लेना
07:25तो उसके लजीज जाइके के सामने वो बकरे का गोश भी पूरी तरह भूल जाएगा
07:29तो ये सिर्फ एक सबजी नहीं है, बलकि उनकी सकाफत का एक बड़ा ही जाइका दारिस्सा है
07:33अगर इसके मौसमों के चकर को देखा जाए तो ये वाके इनसानी हिकमत का बेहतरी नमूना है
07:38मई के महीने में जब सूरज आग वर सारा होता है तो मगामी लोग इसकी कटाई करते हैं
07:43पहले तो इस जुलसा देने वाली गरिमी में फौरी राहत और पानी की कमी पूरी करने के लिए इससे ताजा
07:48सलात के तौर पर खा लिया जाता है
07:49लेकिन असल कमाल तो उसके बार शुरू होता है
07:52सदियों पुरानी सहराई जाहनत का इस्तमाल करते हुए इसके बीज निकाल कर इसे कड़कती धूप में सुखाया जाता है
07:58और पिर इसका आचार डालिया जाता है
07:59इस तरह ये छोटी सी सबजी कहजदा और खुश सर्दियों के महीनों में पूरे साल के लिए खुराक का एक
08:05बिलकुल मुस्तकिल और काबल एतमाज जरिया बन जाती है
08:09गफलत का शिकार मटी में मिलते अगहम कोट की इन बिखरी हुई इंटों से लेकर
08:13किला उमर कोट की नकाबल तस्खीर देव हैकल दिवारों तक
08:16और फिर इस कठन रेट में उगने वाली इस एक छोटी सी जिन्दगी बचाने वाली सबजी तक
08:21आज हमने बका और जवाल के कई रंग देखे
08:24अब आखर में सोचने की बात ये है कि क्या हम इस खिते के विर्से को
08:28चाहे वो तारीख हो, सकाफत हो या यहां की माहौलियाद
08:31इसी शिद्दत और महबत से बचाएंगे जितना हम आज जिन्दा रहने के लिए उन पर इनिसार करते हैं
08:36या फिर हम उसे भी वक्त की उड़ती रेत में हामेशा के लिए गुम हो जाने देंगे
Comments