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عمرکوٹ اور اگھم کوٹ کی تاریخی سیر | سندھ کے قدیم شہر، قلعے اور ثقافتی ورثہ

سندھ کی سرزمین اپنے دامن میں ہزاروں سال کی تاریخ، تہذیب، ثقافت اور دلچسپ داستانیں سموئے ہوئے ہے۔ آج کی اس خصوصی ویڈیو میں ہم آپ کو لے کر چل رہے ہیں سندھ کے دو تاریخی شہروں عمرکوٹ اور اگھم کوٹ کی جانب، جہاں ماضی کے کئی یادگار نقوش آج بھی موجود ہیں۔

عمرکوٹ کا تاریخی پس منظر، مغل شہنشاہ اکبر کی جائے پیدائش، مشہور لوک داستان عمر ماروی، تاریخی قلعہ عمرکوٹ اور اس خطے کی ثقافتی اہمیت اس سفر کا اہم حصہ ہیں۔

اس کے ساتھ ہم اگھم کوٹ کی تاریخی حیثیت، قدیم آثارِ قدیمہ، مساجد، مدارس، مذہبی تنوع اور مقامی روایات کا بھی جائزہ لیں گے۔

اس علاقے کی مقامی ثقافت میں شامل چبڑ نامی سبزی اور اس کے فوائد بھی اس پروگرام کا حصہ ہیں۔ افسوس کہ تاریخی ورثے کی حفاظت اور آثارِ قدیمہ کی دیکھ بھال پر مزید توجہ دینے کی ضرورت ہے۔

آئیے سندھ کی تاریخ، تہذیب اور ثقافت کو قریب سے جانتے ہیں۔

📺 مزید تاریخی، ثقافتی، معلوماتی اور سیاحتی پروگرام دیکھنے کے لیے ہمارا یوٹیوب چینل Apna TV New York سبسکرائب کریں۔

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Apna TV New York – تاریخ، ثقافت اور معلومات کا سفر

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00:09आज के इस तफसीली जाइजे में चलिए चलते हैं सिंद के उन तपते सहराओं और उर्टी रेत की तरफ चाह
00:15हजारों साल पुरानी कहानिया आज भी खामोशी से दफन हैं
00:18हमें अजीब और शांदार चुपे हुए वरसे की गहराई में उतरेंगे
00:21ये एक ऐसा जबरदस सफर है जो एक बिलकुल तबाहाल और गुमशिदा शहर की बिक्री इंटों से शुरू होता है
00:27और फिर वहां से होता हुआ एक ऐसे जिन्दा और मुथर्रिक महौलियाती निजाम तक जाता है जो आज भी सخت
00:32तरीन खिते की बका का जामन है
00:34तो आईए इस कहानी को समझते हैं जो सिर्फ तारीख की पुरानी किताबों में नहीं बलकि आज भी वहां की
00:39हवा और फसलों में महसूस की जा सकती है
00:41अब बजाहिर अगर सोचा जाए तो तारीख, महौलियात और सहरा की एक चोटी सी सबजी इन बिखरे वे टुकड़ों का
00:48आपस में भला क्या दालोग हो सकता है
00:50लगता है ना कि इनका आपस में कोई जोड़ी नहीं
00:52लेकिन हकीकत में ये सब मिलकर बका और मुसलसल जद्व जाहित की एक ऐसी अजीम दास्तान बनाते हैं जो किसी
00:58को भी हैरान कर दे
00:59जब हम इन कड़ियों को जोड़ कर देखते हैं तो ये जानना वाकई बहुत हैरान कोन होता है
01:03कि माजी की शांदार रिवायात, पुर्शिक्वा केले और आज के सखतरीन हालात असल में एक ही धागे में परोई हुए
01:10है
01:10तो इस सफर का रास्ता कुछ इस तरह तैह होगा
01:13सबसे पहले हम अगहम कोट के खंडर देखेंगे फिर वहां की गुमशुदा इल्मी मरकज पर बात होगी
01:18उसके बाद उमर कोट जो के अगबर की जाय पैदाइश है उसकी तरफ बढ़ेंगे
01:22उमर मारवी की अजीम दास्तान का जिकर होगा और आखिर में चबडी जो के वाकिए एक सहराई मोज़ा है उसे
01:28समझेंगे
01:29तो चलिए अपने पहले से से इस कहानी का आगास करते हैं और देखते हैं अगम कोट के खंडर जो
01:35सिंद का एक बिलकुल भुलाया गया मरकाज है
01:38कदीम जमाने में ये शहर यानी अगम कोट सुमा लोहाना का एक इंतहाई एहमदारोल अकूमत था
01:43लेकिन आज आज ये मुझरिमाना गफलत का शिकार है जरा कदीम अगम कोट के उरूच का तसवर कीजिए
01:49किसी दोर में ये दरियाए सिंद की एक शाख पर वाके एक नहायत मस्रूफ बंदरगा हुआ करता था
01:55तसवर करें उन तिजारती कश्टियों का जो यहां लंगर अंदाज होती थी और उन बाज़ारों का जहां हर वक्त रोनक
02:00रहती थी
02:01और अब अचानक से इस दिल खराश हकीकत पर नज़र डालें
02:05ये अजीम शहर अब महस मट्टी के धेर में तबदील हो जुका है
02:08हालात यहां तक खराब हैं कि इन कदी मसाज़ित की इंटों तक को नहीं छोड़ा गया
02:13और हालिया तबाक उन सेलाबों ने पुरानी कबरों को इस हद तक नुक्सान पहुंचाया है
02:17कि इनसानी हड़िया मट्टी से बाहर आ गई है
02:26आगे बढ़ते हैं अपने दूसरे हिस्ती की तरफ
02:29यह वो वक्त है जब यह जगा सिर्फ तिजारत नहीं बलके इल्म कभी एक अजीम मरकज थी
02:33गुमशुदा मदारिस और मसाज़ित की कहानी
02:36इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है
02:38लेकिन दरा सोचिए कि उस वक्त जो शेहर बिलकुल वीरान और खाकालूद है
02:42वहां के एक ही मकामी मदरसे में उस वक्त एक साथ पांच सो तालबे इल्म तालीम आसल कर रहे थे
02:48मुहमद बिन कासिम की सिंदामत के बाद अगम कोट सिर्फ एंटों और बाजारों का शेहर नहीं रहा था
02:53बलकि ठठा के बाद इसलामी उलूम और तहकी का सबसे बड़ा मरकज बन गया था
02:58दूर दरास के लाकों से लोग इल्म की प्यास बजाने के लिए यहां का रुक करते थे
03:02यह मदरसा मशूर आलिम मखदूम इसमाईल सुमरों की जेरे निगरानी चलता था
03:06वहां तालीम की ऐसी शानदार मेफिलें सजा करती थी जिनकी गूंच सच में आज भी तारीक के इन नौराक में
03:12महसूस होती है
03:13और इसी शानदार दोर की एक नहायत खुबसूरत याद एक शेरी मादा ये तारीख है
03:18जो कभी वहां की मशूर पतन वाली मस्जिद पर कुंदा हुआ करता था
03:21अल्फास थे जामया जहानिया जन्नती जिसका मतलब है दुनिया के लिए एक जन्नती मस्जिद
03:27अर्बी और फारसी के इन अल्फास का हिसाब लगाया जाए
03:29तो इस अजीम जामया मस्जिद की तामीर का साल 797 हिज्री बनता है
03:34अब ये एहसास कितना दर्दनाग है
03:36है ना एक ऐसी जगा जिसे कभी दुनिया के लिए जन्नत का टुकड़ा कहा गया
03:40आज इस कदर जमीन बोस हो चुकी है
03:42कि उस मस्जिद की एक महराब या दिवार तक सलामत नहीं बची
03:45वो लफज अब सिर्फ किताबों के सफों में कहती बन कर रहे गए हैं
03:48खेर उमर कोड की तरह बढ़ते हैं जो हमारा तीसरा हिस्सा है
03:52अकबर की जाए पैदाइश और बादशाहों का किला
03:56खेंडरों की धूल से निकल कर अब एक ऐसी जगा चलते हैं
03:59जिसे ताकत और पत्रों ने थोड़ा महफूज रखा है
04:01हम उमर कोड की उस तवील और पेचीदा सियासत की तारीख में कदम रख रहे हैं
04:06ये एक ऐसा किला है जो हर दोर की जंगों और मसलों से बेनियाज सहरा के सीने पर तन कर
04:11खड़ा रहा
04:11अगर साल 1542 के उस नाजुक तरीन वक को याद किया जाए
04:15जब मुगल बादशाह मायूं शेरशा सूरी से शिकस्त का कर सहरा में बैटक रहा था
04:19तब इसी कले के सोधा राजपूतों ने अपनी रिवायात निभाते हुए उसे पना दी थी
04:24और फिर वहीं पर मुगल सल्तनत के अजीम तरीन शेहनशा अकबर की पैदाईश हुई
04:28उसके बाद मसलसल बगावतों और हमलों का सामना करते हुए
04:32ये कला मुगतलिफ हुकमरानों के हाथों से होता हुआ
04:34बिलाखिर 1843 में बरतानवी सल्तनत के जेरे तसल्लत आ गया
04:38इन पत्थरों की मजबूती और इन उची फसीलों की हैबत का अंदाजा लगाना भी एक तज़रा पीछे मुड़कर देखें
04:45कितने ही रेत के तूफान, कितने ही सरकश आंधियां और कितने ही हुखार लशकर इस कले की दिवारों से टकरा
04:52कर वापस लौट गए
04:52दरसल ये महज एक इमारत नहीं है, ये इस खित्ते की पाइदारी का एक बिलकुल जिन्दा शाकार है
04:58इसने सद्यों तक ताकतवर हुकमरानों को पना दी है, तवील महासरे बरदाश की हैं
05:03और सच तो ये है, कि आज भी ये थरके सहरा में माजी की एक खामोश लेकिन नहायत शांदार गवाही
05:10दे रहा है
05:11चौते एसे में हम इस किले की दीवारों में दबी एक और आवास सुनेंगे
05:15उमर मारवी की दास्तान और इस किले में लोक विर्से की कौन्च
05:19देखिए, तारीक सिर्फ बाच्शाओं के जाहो जलाल, खोनी जंगों और तखतो ताज की सियासत का नाम नहीं होती
05:25इस किले की दीवारों में एक ऐसा इनसानी पहलू, एक ऐसा दर्द भी छुपा है, जो वहां की मट्टी में
05:30पूरी तरहा रचबस किया है
05:32ये मारवी की दास्तान है
05:34मारवी जो कि एक गरीब मगर इंतहाई खुदार मकामी धरी लड़की थी
05:38उसने इस इस इलाके के ताकतवर हकुमरान उमर की तरफ से पेश की गई शाही महल की तमाम आसाईशों को
05:44ठुकरा दिया
05:45उसने तख्त की मलका बनने के बजाए इनी तारीख दिवारों के पीछे बरसों की कैद को चुन लिया
05:50अपनी मट्टी से उसका ये इश्क, उसकी ये गुर्बानी, उसे आज भी इस पूरे खिते में वफा, हिम्मत और जमीन
05:57से जुड़े रहने की एक लाजवाल अलामत बनाती है
06:00ये सब तो तारीख के और आक थे, शानो शौकत, जवाल और महबत की दास्ताने
06:05लेकिन या एक बहुत बड़ा सवाल पैद होता है
06:07इस सख्त और कठन सहराई महाल में आज के दौर में इनसान कैसे जिन्दा रहते हैं
06:12आखिर वो क्या चीज़ है जो सूरज की आग बरसाती किरनों और पानी की शदीद कमी के बावजूद यहां जिन्दगी
06:18की दोर को तूटने नहीं देती
06:19तो आईए अपने आखरी और पांचवे हिस्से की तरफ बढ़ते हैं
06:22चिबडी एक सहराई मोजज़ा और सहराई थर में बका का राज
06:26बका का वही सवाल हमारी तवज़ा थर के सहरा की एक नहायत मतहर्रिक और जिन्दा वर्से की तरफ खिंचता है
06:33ये एक छोटी सी मकामी सबसी है जिससे चिबडी या चिबड कहां जाता है
06:37और यकीन मानिये, यह किसी मौज़स से कम नहीं
06:39हैरत की बात तो यह कि यह बिलकुल खालिस, खुद्रती और और्गैनिक फसल है
06:44इसे उगने के लिए किसी किसम की कीड़े मार अदवियात या केमिकल की जरूरत ही नहीं पड़ती
06:48जब कहट साली होती है, बारिश का नाम और निशान नहीं होता, तब भी यह मामूली सी नमी से रेच
06:53चीर कर बाहर आ जाती है
06:54मई और जून की इन जान लेवा गर्मियों में, जब जिसम कतरे कतरे पानी को तरसता है
06:58तो ये चोटी सी सबजी सहराई लोगों में डी हाइडरिशन को दूर करती है और निजामे हाजमा की कई संगीन
07:04बेमारियों से बचाती है
07:05सच में, ये फितरत का एक ऐसा तौफा है जो मुश्किल तरीन हालात में जिन्दगी की जमानत देता है
07:11मकामी लोगों की इस फसल के साथ महबत और लगाओ का अंदाजा इस पात से रगाएं
07:15उमर कोट के एक मकामी रहाईशी हैं, अशोग भाई
07:17वो नहायत दिल्चस्प अंदाज में मुस्कुराते हुए ये दावा करते हैं
07:21कि अगर कोई इस चिबडी का मज़ा चक ले और उसे पका कर खा लेना
07:25तो उसके लजीज जाइके के सामने वो बकरे का गोश भी पूरी तरह भूल जाएगा
07:29तो ये सिर्फ एक सबजी नहीं है, बलकि उनकी सकाफत का एक बड़ा ही जाइका दारिस्सा है
07:33अगर इसके मौसमों के चकर को देखा जाए तो ये वाके इनसानी हिकमत का बेहतरी नमूना है
07:38मई के महीने में जब सूरज आग वर सारा होता है तो मगामी लोग इसकी कटाई करते हैं
07:43पहले तो इस जुलसा देने वाली गरिमी में फौरी राहत और पानी की कमी पूरी करने के लिए इससे ताजा
07:48सलात के तौर पर खा लिया जाता है
07:49लेकिन असल कमाल तो उसके बार शुरू होता है
07:52सदियों पुरानी सहराई जाहनत का इस्तमाल करते हुए इसके बीज निकाल कर इसे कड़कती धूप में सुखाया जाता है
07:58और पिर इसका आचार डालिया जाता है
07:59इस तरह ये छोटी सी सबजी कहजदा और खुश सर्दियों के महीनों में पूरे साल के लिए खुराक का एक
08:05बिलकुल मुस्तकिल और काबल एतमाज जरिया बन जाती है
08:09गफलत का शिकार मटी में मिलते अगहम कोट की इन बिखरी हुई इंटों से लेकर
08:13किला उमर कोट की नकाबल तस्खीर देव हैकल दिवारों तक
08:16और फिर इस कठन रेट में उगने वाली इस एक छोटी सी जिन्दगी बचाने वाली सबजी तक
08:21आज हमने बका और जवाल के कई रंग देखे
08:24अब आखर में सोचने की बात ये है कि क्या हम इस खिते के विर्से को
08:28चाहे वो तारीख हो, सकाफत हो या यहां की माहौलियाद
08:31इसी शिद्दत और महबत से बचाएंगे जितना हम आज जिन्दा रहने के लिए उन पर इनिसार करते हैं
08:36या फिर हम उसे भी वक्त की उड़ती रेत में हामेशा के लिए गुम हो जाने देंगे
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