00:00जब हम गुरु शिष्य की जोड़ी की बात करते हैं तो सबसे उपर हमें खयाल आता है रामकृष्ण परमहंस और
00:06विवेकानन्द का आपको क्या लगता है विवेकानन्द इतनी आसानी से शिष्य बन गए थे पढ़िएगा सालों लगे थे मानने को
00:13नहीं तैयार थे और फिर �
00:14इसलिए जब माने तो पूरा माने हमारी हस्ती कोई आसान छोटी चीज थोड़ी है कि जल्दी से किसी को बोल
00:19दिया गुरू जी गुरू जी कर रहे हो मैं इसलिए एकदम भी अपने लिए पसंदी नहीं करता कोई गुरू जी
00:26बोले मैं हो सकता हूं गुरू पर तुम्हारा �
00:29जबरदस्ती का रिष्टा बना रहे हो तुम्हारा गुरू कहां से हो गया मैं आपको अच्छा लेगा एक दिन आप जा
00:33रहे हो जा रहे हो अचानक पीछे से कोई आता और बोलता है पपा यह तो इल्जाम जैसा हो गया
00:38ऐसे मुझे लगता है जब गुरू जी गुरू होना �
00:41बाब होने जैसा होते हैं क्यों गुरू जी बोल रहा है मैं कहीं किसी का गुरू नहीं हूँ भाई शिश्य
00:44को मर्यादा यह रखनी होती है कि आसानी से शिश्य न बने और गुरू को यह रखनी होती है कि
00:49आसानी से गुरू न बने मैं किसी का गुरू नहीं हूँ वह एक बह
00:52बहुत निजी बहुत पवित्र रिष्टा होता है ऐसे कोई थोड़ी इसक्या गुरू हो जाता है
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