00:02नमस्कार मैं शुवेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपाधक
00:10विद्या वाचसपती गुलाप उठारी जी का शरीर ही व्रम्हांड श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आलेख जि
00:29मैं शोडशकल जीवात्मा हूं देह मेरी क्षर पुरुष है मैं अव्यमन हूं महनमन जीवात्मा का मन है यहां मन कामना
00:39के साथ रिदय में उत्पन होता है यही महमाया का भी आश्रय इस्थल है महनमन का केंद्र ही अव्यमन है
00:47यहां संचित कर्म रहते हैं प्रारत अलग होक
00:51current
01:09community
01:19should
01:21प्रामयन सर्व भूतानी स्यंत्रा रूढ़ानी मायया।
01:25सुख्ष्म में मैं अक्चेला जिवात्मा हूँ।
01:28स्थूल में चारों और स्वजन और परिजनों का बड़ा संसार खड़ा है।
01:33इनके साथ मेरा आदान प्रदान भी स्थूल मन बुद्धी से होता है।
01:37अतह समवादों का सुख्ष्म इस्तर प्रकट ही नहीं हो पाता।
01:42क्या मा से बातचीत में यह याद आता है कि इसी ने मुझे जन्म दिया है।
01:47मेरी इस देह का निर्मान इसी माने अपनी देह से किया है।
01:51इसी के पेट में मैं नौदस महां बंद रहा हूँ।
01:55यही जीवन का बड़ा सत्य है।
01:57यही बात भाई बहनों से बातचीत पर लागू होती है।
02:00कहां याद रहता है कि इनको भी इसी माने पेट में रखा है,
02:05पोशित किया है और जन्म दिया है।
02:07इस घर में दोनों बाहर से आए हैं और आपस में जगर रहे हैं कि मानों यह हमारा है।
02:13जब अपना शरीर ही अपना नहीं मा का है,
02:16तब कोई भी दूसरी चीज अपनी कैसे हो सकती है।
02:20बड़ों को भी कहां याद रहता है अपने मूल अस्तित्व का।
02:24शायद ही किसी को यह भान रहता होगा कि हम तो मोह रहे हैं प्रकृति के हाथों में।
02:29मा-बाप शरीर देते हैं आत्मा आकर रहता है इसमें।
02:32यह भी माया का ही खेल हैं।
02:34माता पिता मिलते हैं अपने-पने कर्म फलों से।
02:38लक्षय उनका भी ब्रम्ब का विवर्ध ही होता है इकी तुर्भाग्य भीन्निविने होता है आने वाला आत्मा भी भाक्य लेगर
02:46जीव को लाने में माता-पिता की प्रास्तना उसी प्रकार के जीव को आकर्षित करती हैं जीव भी अपना निर्ने
02:55करके माखी कोख का चैन करता हैं महामाया की इसमें बड़ी भूणिका रहती हैं
03:01Yoni का निर्धारन कर्मों कе आधार्पन होता है, मानव Yoni में ही ब्रह्मांश अधिकांश्तः जाग्रत अवस्था में YE我也
03:15.
03:16Maya का इस्थान इतना गूर होता है कि उसकी भूमीगा का आभास तक नहीं हो पाता
03:22पुरुष को तो अत्यल्पसी समझ हो पाती है Maya की
03:26उसे परोक्ष भाषा भी नहीं आती है
03:28और नहीं शब्द के साथ भनी को ही पकड़ पाता है
03:32इस्त्री जहां अपरा के स्तर पर संबाद करती है
03:35वहीं एक पत्नी परा के धरातल पर भी जीती है
03:38इसी से अंतर ग्यान में भी पत्नी भारी पढ़ती है
03:42यह सुक्ष मधरातल ही उसका Maya भाव कहलाता है
03:46पूरी उम्र इस्त्री पुरुषों के मद्धे आदान प्रदान होता रहता है
03:50क्या यह सामाने सी बात है?
03:53इसमें कुछ तो प्रारब्ध से जुड़े विशय रहते हैं
03:56कुछ माया जाल का चक्र काम करता है
03:58कुछ जीवेच्छा होती है
04:00माया, पुरुष के भीतर और इस्त्री के इस थूल भाग में प्रकरती रूप में ही कार्य करती जान पड़ती है
04:07माया में करता भाव नहीं है
04:09क्रारब्ध में क्रिया प्रतिक्रिया होती है
04:12दोनों को कर्मफल भोगने का तथा मुक्त हो जाने का समान अधिकार होता है
04:18ये कर्म पशुवत भोग रूपु भी हो सकते हैं, जिनकी स्मितियां भी शेश नहीं रहती
04:24प्रारब्ध कर्म जीवातना से जुड़े होते हैं, शरीर से नहीं
04:28शरीर तो सदा माध्यम ही रहता है, जीव की इच्छा जिसे न रोका जा सके न बदला जा सके
04:34वही प्रारद की प्रतिनिधी है, इच्छा में क्रिया नहीं होती, प्रिया को रोका जा सकता है ताकि नए कर्म शुरू
04:42ही न हो, इसके लिए जागरूपता चाहिए, आरंभिक वर्षों में हम अनेक प्रकार के अनायास कर्मों को कर गुजरते हैं,
04:50जो प्रक्रति का ही कारे होत
05:04होती है, अनेक स्थूल्क वियां, इस अज्ञान के भटकाव से भी होती है, यहां अज्ञान एहंकार को स्फीत करता है,
05:12लड़के में भी और नए परिवेश की लड़की में भी, यहां एहंकार समान होता है, ऐसी लड़की का व्यहवार भी
05:19लड़के के समकक्षी ही होता है,
05:21One of my life is my mind, which is the moment, every time and every time.
05:29I have a my mind on my mind.
05:32Bonjour with my mind!
05:46Thank you very much.
06:28Thank you very much.
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