00:02नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादत
00:10विद्या वाचसपती गुलाब कुठारी जी का शरीर ही ब्रम्हान श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आली जिसक
00:27कर्म की द्वारा व्रिक्ष रूप में प्रतिफलित होती है, कामना की आकरती नहीं होती, इस्त्री ही पुरुष की कामना का
00:35निमित बनती है, सौम्या होने से रित रूप ही है, पुरुष का वरण करके उसे आवरित करती है, पुरुष के
00:41आगने भाव में आहुत होने चली �
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04:13अतह जैसे ही इस प्रकार का अवसर मिलता है तो अस्मृति जाग जाती है, उन्हा व्यक्ति निर्णय करके ही अपना
04:20स्वरू प्रकट करेगा.
04:21ऐसी ही इस्तिती विभिन इंद्रियों की कामनाओं की शेत्रों में बनेगी, प्रतेक इंद्रिय के अनेकानेक विशय होते हैं, किसी भी
04:29विशय की पुनरा वृत्ति ही राग पैदा करती है, यह राग मन से चिपक कर बार-बार विशय की कामना
04:36करता है.
04:40चाहे पुरुष शरीर में हो
04:57मूल में माया ही गतिमान होती है
05:00शुसूक्ष्म होने से इस पश्ट दिखाई नहीं पड़ती, उसे पुरुष की कमजोरी तूर से ही पता चल जाती है
05:06उसका इंगित सामने माया को स्पंदित कर देता है, वह प्रतीक्षा करती है
05:12जैसे मच्वारा जाल फैंट कर पतीक्षा करता है, उसे हार का डर नहीं होता, किन्तु हार जाने पर पुना आकरमन
05:20नहीं करती है
05:21ऐसा होता कम ही है, उसका संकल्प द्रड होता है, उसे स्ष्टी को अपने नियंतरण में रखना है
05:27पुरुष इस ब्रह्मे प्रसंद रहता है कि वह भोगता है, जबकि सच्चाई इसके ठीक विप्रीत होती है
05:33इस्टी की भाषा गुण होती है, दोनों धरातल पर एक साथ बात करती है
05:37शब्द ही पुरुष की पकड में आते हैं, वनी के साथ संकेत ही इस्टी के अभिनए की प्रभाव शीलता है
05:44इसमें भी एक भावनात्मक घहनता होती है, इसी के सहारे गर्भस्त संतान को संसकारित भी करती है
05:52इस्त्री संकोच धर्मा होती है, अतह, छिपाना, चोरी करना भी इसी में शामिल रहता है
05:58पिता के समक्ष संतान की ढाल बन जाती है उनकी रक्षा में
06:02छलनी की तरह चान चान कर जानकारी छोड़ती है ताकि विशे की गंभीरता को टाला जा सके
06:09पिता के स्वरूप को चानती है, पिता की प्रतिष्ठा बनाय रखना भी आवश्यक होता है
06:15नई पीढ़ी को सुक्ष्म का ग्यान अत्यल्प होता है, नशे की बढ़ती मार ने सुक्ष्म स्वरूप को विदाही कर दिया
06:22इस थूल देह का आदान प्रदान रह गया, प्रेम विभा के संकल्प भी देह के आगे नहीं जाते
06:28उधर पुरुश्वर्ग में सौम्यता का अभाव उसके संबंद को क्षणिक बना रहा है
06:33सौम्यता के अभाव में उसका प्रेमा चार अक्षीन हो गया, यह एक बड़ा परिवर्टन आता जा रहा है
06:40इस्त्री का विवर्ट का लक्षय भी शिथिल होता जा रहा है
06:44एक अन्य सिध्धान्त भी ध्यान देने योग्या है
06:46चातुर वर्ण्यम मयास रिष्टम गुण कर्म विभागशव
06:50यह चारो वर्ण और तीनो गुण भी प्रक्रती के साथ ही जुड़ते है
06:54इस्त्री रित रूप होने से उसके गुण कर्म पुरुष वाले ही हो जाएंगे
06:59विवापूर इस्त्री एवं उसके परिवार को भावी संबन्द की जानकारी ही नहीं होती
07:04लड़के का भविश्य तो इस पष्ट रहता है
07:07विवाप में इस्त्री जिस वर्ण के पुरुष में आहुत होती है
07:10वही उसका भी वर्ण हो जाता है
07:12वैसे ही संस्कारों से जुड़ जाती है
07:15आज तो स्वयम विवाप ही अप्रासंगिक होने लगे हैं
07:19एक कहावत है कि भार्या दास पुत्री जिसके पास रहते हैं उसी के हो जाते हैं
07:24अतहमा सरुप्रथम पुत्र को पिता की प्रतिकृती बनाने का प्रयास करती है
07:30वैसे तो पितावई जायते बुत्रह की शुती है ही
07:33फिर मा को एक भै नियती का भी होता है
07:38पती न रहे छोड़ दे तो उसका ध्यान कौन रखेगा
07:42यहाँ एक बड़ा तक्तिया दिखाई पड़ता है कि सुख में इस्तिती का जुकाव अप्रा प्रकृति की और अधिक रहता है
07:50किन्तूर दुख अथवा अभाव की इस्तिती में परा प्रकृतिया सुख में इस तर पर जीने लगती है
07:55शरीर रहते हुए भी इस धूल पटल पर नहीं होती
07:58इस इस्तिती को तो पूर्ण पूरुष भाव में ही रहने वाला पूर्ण पूरुष ही समझ सकेगा माया को पहचान सकेगा
08:06माया को समझने की आवशक्ता है
08:08जागरुकता की अवस्था में ही यह संभव है जहां माया को जीत सकते है
08:13चुकी धर्म सदा व्यक्तिगत होता है, माया, जूट, मिथ्या, अधर्म, आधारित होती है, दीपक भी होती है
08:20प्रकाश और अंधकार भी होती है
08:23चेतना एक इस्तर पर माया को भी आवधित रखती है
08:26एक चेतना अब्धी ज्ञान का कारण है
08:30अनासक्त भाव ही माया मुक्ती है, शत्रु के प्रतिभी संभाव हो जाता है
08:34माया की विशेष्टा है, जीव भाव का आवभान अपने सूख्ष में इस तर से करती है
08:40शरीर में अव्दरित होकर पशु कर्म के लिए ब्रह्माश के साथ पिता के अन्शु को भी आवरित करके शरीर में
08:47लाने के लिए यत्न करती है
08:49पुरुष से लेकर वल्ट समाज को बाढ़ती है
08:53परोग शिप्रिया के अनुसार माया पशु भाव विवर्त भाव में मौन रहती है
08:58नमस्कार
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