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  • 7 weeks ago
रीत रही मां की संवेदनशीलता

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00:28Shweta Tivari
00:57Shweta Tivari
01:27Shweta Tivari
01:56Shweta Tivari
02:26Shweta Tivari
02:32ुशुद्ध इस्त्री पूर्ण रूपेंचुद्ध इस्त्री थी, वह अपने आपको इस प्रकार तैयार करती थी कि जैसा भी पती होगा, उसके
02:40अनुसार स्वयम को धाल लेती थी, उसका अपना कोई अलग सपना नहीं होता था
02:45Good, good, good.
03:15Tha Neaghargaon mein Vedia hi tha
03:17Queerall mein eek Samudhai thaa Lada Guri
03:20Jo Gaon Gaon ja kar Bimari ko dhekta tha
03:22Punha ja kar sab ki dvaiyaan taayyaan tariyaar karta
03:25Aar un un Bimari Hoki chikitsha karta tha
03:28Aaj unhhi gramino ko
03:29Kiet Nasha ko, Rasainik khadon, synthetic rasaino
03:33Ne akaran hii Bimari kar diya
03:35Shudh og sada jivan ke baad bhi
03:37Anaj Phal dhudh ne Vigyan ke nama par
03:40Aar vikas ke nama par Aar ko vishakti kar diya
03:43मन भी विशाक्त और तन भी विशाक्त
03:46शिक्षा ने मनुश्य को अपने बारे में इतना अधिक जागरूप कर दिया
03:51कि उसके जीवन से दूसरे बाहर होते चले गए
03:54क्रसाधन, टीवी, फोन ने तो व्यक्ति को और समेट दिया
03:57इसी कारण व्यक्ति के चारों और दुख भी सिमट गया
04:01दो बड़े सुख कहलाया आज घर में
04:03एक रसोई से दूरी का वातावरन, नय व्यंजनों का जीवन में प्रवेश और रोगों का आक्रमन
04:09अन ब्रह्म है, किसको है इस तथ्य का ज्यान
04:13अन से मन भी बदला और काम नय भी
04:15कर्म के स्वरूद में बदलाव स्वाभावित था
04:18अब कर्म पुटशार्थ नहीं रहे गया
04:21किसी को मोक्ष नहीं चाहिए
04:22अन का जीवर में भी नया स्वाद आना चाहिए
04:26यही वासना संसार पैलता गया
04:28दूसरा निर्ने हुआ परिवार नियोजन
04:30इसका आधार भी मूल्य न रहेकर अर्थ हो गया
04:34अर्थ भी स्वाभ को ढूनने के काम आ रहा है
04:37जिस प्रकार उननत कुश्पो से सुगंध विदा हो गई
04:40उसी प्रकार स्वादू मानव भी कैक्तस हो गया
04:44स्वार्थ के आगें बाकी सब विस्मृत
04:46विस्मृती शिक्षा के अनुपात में बढ़ती जा रही है
04:49माबाब घर में अनावश्यक हो गए
04:51उनके स्थान पर बच्चों के नाम पर आया आ गई
04:55बड़े घरों में अन्न और मा का रिष्टा तूटा
04:58न मा खाना बनाती है नहीं खिलाती है
05:00दफ्तर में टिफिन, कैंटीन और शाम को बाहर
05:04भुजन से मा की दिव्यता बाहर हो गई
05:06जिस अन्न में जीव याच्चा करता है
05:09उसका स्वरू, संस्कृती और प्रक्रती के अनुरूप नहीं रहा
05:13अध्यात्म का विकास रुक गया
05:15शरीर ही बनकर रह गया मानव
05:17ये बड़ी असंतुष्टी की कारण बन गये शिक्षा ने
05:20शादी के बारे में मनु के गिसे पिटे दस्तावेज फाड़ फैके
05:25प्रक्रती ने स्वतंत्र चिंतन दिया है
05:27स्वयम को मर्जी से जीने का अधिकार दिया है
05:30तब हम अपना करियर क्यों नहीं बनाए
05:32समानता, सशक्तिकरण, अभिव्यक्ती की नई अवधारना में
05:36माता पिता के निर्णे लेने के अधिकार समाक्त कर डाले
05:40संपूर्ण विश्व में एक ही लहर चल पड़ी
05:43गरीब देशों ने तो शरीर को ही करियर बना लिया
05:49शरीर को भूख तो लगती हैं गोलियां खालो कब तक
05:52जो अंग भूख शांत करने में उपयोगी रहे
05:54माया ने उनको भी शरीर से विदा किया
05:57जो अरजन किया था वह भी चिक्सा में कम पड़ गया
06:01दोवी के कुते न घर के न घान के
06:04सुख छूम अंतर हो गया
06:06जिस अन्य ने शरीर का निर्मान किया वह मा का शरीर था
06:10उसी से पोशिप भी होना था
06:12लक्ष्मी ने आकर अपने ही निर्मान को ध्वस्त करना शुरू कर दिया
06:16बारिश में जैसे मिट्टी के घर बनाते हैं बिखेर देते हैं
06:20मैं ही खेलिया मैं ही बिजानिया
06:23नमस्कार
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