00:00नमस्कार आईए आज आपको सुनाते हैं राजस्तान पत्रिगा की प्रधान संपादक डॉक्टर गुलाव खुठारी का शरीर ही बंभांड श्रिंखना में पत्रिगायन में प्रकाशी तालिक जिसका शीशक है गर्भ से प्रकाश प्रकाश और अंधिकार साथ रहते हैं प्र
00:30प्रकाश बाभित्वी हो जाता है कारे ठहर जाता है प्रकाश रत संस्थाएं अंधकार में कारे नहीं कर सकती नहीं अंधकार में जीने वाले प्राणी दिन के प्रकाश में कारे करते हैं जैसे की उल्लू चंगादर असुर हमारा शरीर बंभान की प्रतिक रिती हैं इसमें
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02:43अश्वत्थ रूप है, यही सूख्ष, सूल रूप, उर्धुर्ध, कहत था, अधह विश्व बनता है, एक अव्यक्त भाव, दूसरा व्यक्त भाव, अव्यही उर्दय है, मन की प्रतिष्ठा का आधार है, रुद्प्रजापती को अगनी कहा है, इसके सिर और पैर नहीं होत
03:13ग्यारा, यह गुईय अगनी वामन कहलाता है, कह प्रजापती ही केंद्र के दोनों और फैलता है, रेखा और परिधी बनाता है, यही वामन का विराट रूप है, गुईय अगनी ही यग्य में आकर तीन अगनियों की रूप में जन्म लेता है, आवणिय, तक्षिनागनी औ
03:43हर योशा भाव की केंद्र में माया रहती है, धर्ती को भी हमने मा कहा है, पंचागनी के सिधानत का ये एक पड़ाव है, वर्शा की मूनों के साथ जीवात्मा पृच्वी के गर्भ में इस्थापित हो जाता है, उसकी प्रतिष्था वहां जाकर होती है, जहां प्रकाश न
04:13उसकी भूमिका को उस योनी में पूरी तरह समझती है
04:17धर्ती को भी पता है जिस ओशदी में अन्ड का दाना तयार होगा
04:21उसका कौन-कौन सा अंग किस-किस प्राणिक के वैश्वानर में जाएगा
04:26उसी प्रकार वह उस ओशद शरीर के अंग प्रत्यंगों में जीवात्मा के अंशों की प्रतिष्ठा करती है
04:33प्रित्वे के उस गर्भ में माया पूरी 84 लाख योनियों की रोजना पना रही है
04:38उसको यह भी पता है कि इस अंग का दाना कौन से एक शेत्र का प्राणी खाएगा बिक कर कहा जाएगा
04:45उन परिस्थितियों को ध्यान रखकर वह ब्रह्म के अंश का विभाजन करती है
04:50माया स्वयम अंधगार है और पिच्वी के कद्व में भी अंधगार है
04:54उसमें ब्रह्म के अंश का यह विभाजन क्या इश्वरय चमतकार नहीं है
04:59क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्थी मा यह जानती है
05:03कि उस औश्थी और वनसपती से किन-किन प्राणीयों की देह का निर्मान होगा
05:09ुठ्राणियों की आयू कितनी होगी और उनका स्वभाव क्या होगा।
05:13उधारन के लिए हम किसी फल को ले जिसे एक किसान जमीन में बोता है।
05:19एक उठली को भूने के लिए किसान जमीन को कितना गहरा खोजता है।
05:23so that the light of the body will arrive in this situation.
05:28The one who has now fallen, is the only life of the body.
05:34The three are the same as the body of the body.
05:38They don't come from the body very closely.
05:43Then they will not be the same as the body of the body.
05:48So there will be the same thing to know.
05:5222. There is same way.
06:0023. Next, this is a way to live the p debating room.
06:0324. This is the following way.
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06:21प्रवाहित होकर हर अंग की चिती को व्यवस्यत रखते हुए प्रवाहमान बनी रही पल का बीज से संबंध देह रूप में भी यहां इस परिष्ट हो जाता है जिस किस्म के आम की उठे थी उसी किस्म के नए आम उस पेड़ को प्राप्त होते हैं
06:43पर माया का कर्म तब तक पून नहीं होता है जब तक उस नए फल में मूल फल का रस गंद आधी सभी नहीं पहुच जाते हैं
06:54यह काम परा प्रक्रती का है हमारे शरीर का अंतिम धातू शुक्र है जब तक उसमें नया आम पैड़ा करने की क्षमता नहीं आती तब तक न आम पूरा होता है नहीं माया का कार्य पूरा होता है
07:08परा और अपरा प्रक्रती के कार्य आज के वैक्यानिक समझने का प्रयास कर रहे हैं का किसी मा तक आगे भी बढ़े हैं किन्तू ब्रंप का इस्थानांतरण बीज से लेकर पल में कैसे हो रहा है यह शुद्ध माया के मूल कर्म का हिस्सा है जहां किसी उपकरण की पमच अ�
07:38कर आगे बढ़ना ही स्रिष्टी की पूर्णता भी होगी स्रिष्टी की अभिव्यक्ति तो शर्या अपरा प्रक्रती ही है नपरा अभिव्यक्त कर पाती है नहीं माया ब्रह्म की उस कामना एको हम बहुत स्याम की पूर्ती होते हुए माया के कर्म को समझ सकते हैं
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