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  • 4 hours ago
ऊर्जा है माया

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00:02नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक
00:11विद्या वाचसपती गुलाब कुठारी जी का शरीर ही ब्रह्मान श्रिंखला में पत्रिकायन में प्रकाशित आले जिस
00:29सभी माया का बनता बिगड़ता धाचा है माया भी एक तत्व विशेष ही है जो ब्रह्म के लिए कामना रूप
00:36में कार्य करती है पुरुष के विस्तार में मदद करती है किन्तु स्वयं में उर्जा रूप में ही रहती है
00:43उसका कोई स्वरूप नहीं होता अतःव दिखाई �
00:55ભીરસેતારમે ના જ્તરાવ૥ીતાં પરાવ મારશરાવે કરાવતાવે પરાપરય જ્રારતરાવે વીસ્તગે ફીતાવ�
01:15वही अव्यक्त अंश हर एक प्राणी में भी उपलब्ध है और समान रूप से कार्य करते हैं।
01:21इनका सिस्थान परातपर है, व्यक्त अव्याइ से परे हैं, अतह अक्षर पुरुष के आगे हैं।
01:27हमारा कर्म क्षेत्र अक्षर के आगे नहीं जाता।
01:30जीवात्मा अक्षर रूप सूक्ष्म शरीर का अंश है, चूंकि पुरुष का इस्त्रेन भाग अधिकांश्त अपून पाया जाता है, अतह वह
01:39अपने माया भाव तक नहीं पहुँच पाता।
01:41इस्त्री स्वयम माया का ही अवतार है, अतह एक पून पुरुष ही, इस्त्री के माया भाव परोक्ष भाशा में एवं
01:50इंगित में समझ सकता है।
02:11इस्त्री मानविय समवेदना को ही कम करती है, पूरुष में इस्त्री अपना भविश्य देखती है, इससे भी आगे संतान सुख
02:18और संतान वेप्र भविश्य देखती है।
02:41यही एक कारण है कि इस्त्री को पूरुष के साथ रहना पड़ता है, फिर भी उसका माया भाव पूरुष की
02:47समझ में नहीं आता।
02:49कितना बड़ा सच है कि पूरुष की इस रिष्टी में माया उर्जा रूप है।
02:54बस बनती है, बिगड़ती है, स्वयम शरीर धारण नहीं करती।
02:58स्वयम का उसका कोई शरीर नहीं होता, पूर्जा की कोई आकरती नहीं होती।
03:02जित भाव न खेंद्र न परिधी बस व्याप्त रहती है।
03:06एक शरीर का रूप धारण करती है, दूसरा शरीर धारण करती है, तीसरा शरीर।
03:11ब्रह्म के भ्रमन के लिए नित नय स्वरूप धारण करती है, मिटती जाती है।
03:16अर्थात माया भमित करते हुए विभिन योनियों में भ्रमन कराती रहती है।
03:21ब्रम स्थाई भाव से भीतर प्रतिष्ठित रहता है, प्रत्यक योनी में बीज रूप वही रहता है। प्रिष्ण भी यही कह
03:28रहे हैं कि है अर्जुन यंत्र पर आरूर समस्त भूतों को इश्वर अपनी माया से घुमाता हुआ भूत मात्र के
03:37रिदय में इस्थित रहता है�
03:43ब्रामयन सर्व भूतानी यंत्रा रूरानी मायया। माया ही गती है, आगती है। इस थूल शरीरों में वही अपरा है, अहेंकृती
03:51है, प्रक्रती है, आगती है। इसी का निमित रूप परा प्रक्रती है, परा में भी कर्म नहीं है, अत्धह इसका
03:58सदा माया से सम्मंद रहत
04:01पराप्रक्रति भी प्राण रोप सोक्ष्म देह होती है। शरीर मिट्टी का घर है, बनता बिगरता रहता है। पंच महा भूतों
04:09के योग से बनता है, उन्ही में समा जाता है। सारी आकरतियां माया की होती हैं, किन्तु पुरुष के लिए
04:15बनाई जाती है। पुरुष उन आ
04:29जात्मा के आवन बनते हैं, दोनों शरीर के सार जुड़े हैं, राग द्वेश भी मन के धातु हैं, प्रोध बुद्धी
04:35रूपी एहंकार से जुड़ा है, काम माया का मोहिनी रूप है, पशु पक्षियों का काम जीवात्मा की कामना है, मनुष्य
04:43भी जब पशु भाव में
04:44होता है, तब वासना रूप कामना ही उसे आवरित्त करती है, संतती में भी पशु भाव की बहुलता रहती है,
04:52जब शरीर मनुष्य का ही होता है, विवहा मर्यादर के बाहर के संबंदों में ऐसा देखा जा सकता है, यहां
04:59इस तरीका ब्रम्हाइश पती के ब्रम्हाइश से �
05:02युक्त नहीं होता, ऐसे इस्थिती में दूसरा पक्ष यहबली बल्वान हो जाता है कि मा के द्वाराद जीवात्मा को गर्मकाल
05:09में संसकारित भी नहीं किया जाता, तब ना तो जीवात्मा से ब्रम्हाइश जुड़ पाता है, नहीं जीव संसकारित हो पाता
05:17है, शुद्�
05:30पक्षिन का पूर्व भाग आगनेय है, वामांग अत्वा पश्चिमी भागी ही माया संसार है, यहां इस्त्री और पुरुष दोनों स्वतंत्र
05:38रूप से मुख्यतह एकल भाव में ही रहते जान पड़ते हैं, जुगल तत्व भी जीवात्मा से आगे नहीं जुड़ पाते
05:45बध्या पूर्व में भी मंत्रो चार ठहर सा गया है, तह यह भी भोग योनिया बनकर रह गए हैं, मूल
05:52में ब्रह्मुबी निराकार है, रित रूप ही है, माया के कारण उसमें पुर्भाव आ गया, सत्य रूप में अव्वय बनकर
05:59पुरुष रूप हो गया, फिर भी ब्रह
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06:13प्राणा काशी, वायू, तेज, जलरूप होता हुआ, पृत्वी रूप में घंता धारन कर लेता है।
06:20इसी प्रकार आप्य वायव्य और स्वाम्य स्रिष्टी का निर्मान होता है।
06:25प्राणा रूप जीवात्मा प्राणों के स्पंधन से ही पोशित होता है।
06:28गीता में कृष्ण कहते हैं कि तुम लोग इस यग्य द्वारा देवताओं की उन्नती करो और वे देवतागन तुम्हारी उन्नती
06:36करें।
06:37इस प्रकार परस्पर उन्नती करते हुए परम श्रेव को तुम प्राप्ण होंगे।
06:42देवान भावयता नेन ते देवा भावयंतु वह परस्परम भावयंतु श्रेह परम अवाप्सित देवता और प्राण शब्द परियाय वाची हैं।
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07:012 Jeevatma's Pratishthita Rambhaanjh ke Samparq
07:15Maya Roop Istri Rambh Viverdh ko Lakshya Me Rakhkar Hii Puruške Saath Rehati Hai
07:19Maya Roop Istri Rambh Viverdh ko Lakshya Me Rakhkar Hii Puruške Saath Rehati Hai
07:20Ataha, Pati-Patni Ka Sambandh Pranatmak Hii Hota Hai, Dehatmak Nahi Hota
07:25Viverdh ke Liyye Maya Hii Puruš Man Mei Kaamna Bantti Hai
07:29Prerit Kerti Hai, Swayam Jeevatma Se Aage, Aapne Maya Bhavu Se Jundh Jati Hai
07:35Rambhaanjh ko Akashit Kerti Hai, Puruš Dehake Sabhi Anggansh ko Bhi Ekatr Kerti Hai
07:41Puruš Shariir ke Pitaranjshon ko, Angganshon ko, Rambhaanjh ko Lekar Pumbhruun Me Pravish Kerti Hai
07:47Maatrishwa Vayu Is Pumbhruun ko Shukraanu Ke Rupame Sthanantrit Kerti Hai Shonitagni Me
07:53Abhiya Sara Padarth Bhang, Swayam Maya Aapne Shariq Me Le Ati Hai, Aaghi Ka Sara Niyantran Maya
08:00Pura Aapraa Mil Kerti Bunaayi Rakti Hai, Namaskar
08:04Pura Aapra Aapra
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