00:00सब को माफ करते हुए, आप सब से माफी मखते हुए, आप जब दिली के ग्रीन पार्ग शम्शान घाट पर
00:09बुद्वार की वो सुभह किसी आम सुभह जैसी बिल्कुल नहीं थी, वहां आवाओं में एक भारी पन था, सन्नाटे में
00:1513 साल की लंबी खामोशी चीखें दफन थी
00:1931 साल के हरिश राणा का पार्थिव शरीट जब शम्शान घाट लाया गया तो वहां मौजूद हर शक्स की आँखें
00:25नम थी, लेकिन उन आकों में एक अजीब सा सुकून भी नज़रा रहा था, आज एक रूस पिंजरे से आजाद
00:32हो गई, जिसमें वो पिछले तेरह वर्ष
00:35हरिश के पिता अशोकराणा ने जब अपने बेटे को आखिरी बार देखा तो उनके पैर काप रही थे, लेकिन उन्होंने
00:41खुद को संभाला, हाथ जोड़कर वहां मौजूद लोगों से कहा, कोई रोना मत, देरा बेटा अब जाकर शांती से सुएगा,
00:48उन्होंने भरी आ�
01:00हाथों से मुखह अगनी दी, जैसे ही अगनी की लप्टों ने हरिश के शरीर को घेरा वहां मौजूद उसकी बहन
01:06और अन्या परिचन सब्र तूटता देख पाए, उनका सब्र तूटा फूट फूट कर रोने लगे, बहन का रो रोकर बुरा
01:14हाल हुआ, उसने पने भाई को �
01:16जवानी के उन दिनों में खोया, जब वो चंडिगड के पंजाब युनिवरसिटी में बीटिक की पढ़ाई कर रहा था, और
01:22बड़े-बड़े सपनी देखा करता था, फिर एक काली तारीक आई, 2013 में हॉस्टल की चौथी मन्जल से गिर कर
01:29हरिश की पूरी दुनिया सिमट ग
01:41आज जब अंतिम विदाई का दिन था, तब उसकी आखों में भाई को खूने का दुख तो था ही, इसके
01:47साथ ही भाई के जाने का संतोश था, इस बात का संतोश कि अब उसका भाई उस असहन या दर्द
01:54से मुक्त हो गया, जिसे वो ना बोल कर बता सकता था, और ना ही सह पा �
01:59रहा था, हरिश का जाना के वले एक मौत नहीं थी, बलकि ये छे लोगों के लिए जीवन का नया
02:05सवेरा भी था, दिले एम्स के डॉक्टरों के अनुसार परिवार ने बड़े दिल का परिचर देते हुए हरिश के फेफडे,
02:11दोनों किड्री और कॉर्णिया दान कर दिये, �
02:14जिस हरिश ने अपनी जिन्दगी के तेरह साल एक अंधीरी कोटरी में और एक बिस्तर पर गुजारे अव वही, छे
02:21अलग लग जिन्दगियों के जरीए इस दुनिया को देखेगा और सांस लेगा, ये एक पिता और परिवार का सबसे वहान
02:28निर्णय था, जिस बेटे की ज
02:31जिन्दगी तो खत्म हो गई, लेकिन बेटे ने जाते जाते अपने अंगदान करना जरूरी समझा, इससे कई लोगों को नई
02:38जिन्दगी मिली, जिस बेटे ने खुद इतनी पीड़ा सही वो जाते जाते, दूसरों का जीवन उजाले से भर गया और
02:45अपने आप में एक प्
03:00ला बना था, यह उस परिवार की जीत थी, जो कि अपने लाटले को हर दिन तिल-तिल कर मरते
03:06देख, आर्थिक और मांसिक रूप से तूट चुका था, 16 मार्च को जब खाने की नली हटाई गई, तब सहीं
03:12परिवार एक अनकहे इंतिजार में था, 24 मार्च को हरीश ने आखिर
03:17सांसली और बुद्वार को वो पंच तत्वों में वीलीन हो गया, शमशान की राक में तबदील होते देख, शरीर के
03:24पीछे अब केवल यादे पची है, और वो बहादूरी भरी मिसाल जिसमें एक परिवार ने अपने जिगर के टुकडे को
03:30सम्मान के साथ मौत देने का कठि
03:46और बॉक्स में अपने टेप पड़ी जरूर कीजेगा, मेरा नाम है मुकुंद, बने रहे वन इंडिया के साथ, शुक्रिया
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