00:00एक लंबे समय पहले मथुरा नामक एक गाव में आदित्य वर्मा नामक एक जमन्दा रहता था।
00:07वो आत्मी बहुत ही अमीर था।
00:11उसी कारण उस गाव में सबी उसको एक बड़े बुजुर्ब का इज़त देते थे।
00:17किसी को कोई भी मदद की जरूरत होती थी वो उन ही के पास जाते थी।
00:21और इसलिए आदित्य वर्मा भी उन सब की मुसीबतों को बहुत सब्र से सुनता था और उनका हल भी निकालता था।
00:29इतना ही नहीं, अगर किसी को पैसों के भी जरूरत होती थी, वो हमेशा नाग बोले बिना देता था।
00:35इसी कारण उसका नाम गाव में बहुत रोशन हुआ।
00:38गाव में सबका इज़त पाने वाला आदित्यवर्मा अपनी बीवी कुसमा देवी का कभी नहीं कमा पाया।
00:46उसे हमेशा यहीं लगता था कि उनके सारे पैसों को यह ऐसे ही गवा रहा है।
00:51इन पती-पत्नी का एक बेटा भी था जिसका नाम धर्मराच था।
00:56उसके नाम के अनुसर और उसके पिता के तरही वो भी सबकी मदद करता था।
01:02उसके पिता के व्यापार और खेती का काम ये खुद संबालता था।
01:06अपने पिता को काम कहे बिना वो सारी महनत अकेले करता था।
01:10धर्मराजों को धनलक्ष्मी नामक एक लड़की से दस साल पहले शादी करवाया था आदित्या वर्माने लेकिन कुस्मा देवी को हमेशा आज तक यही गुसा था कि उसने अपने बेटी का शादी एक ऐसी लड़की से करवाया जिसके पास एक फूटी कौडी भी नहीं थी व
01:40एक और शादी कर लेकिन क्यूंकि धर्मराज को वो बिलकुल अच्छा नहीं लगता था वो ये विशे को अंदेखा और अंसुना कर देता था यह सब जानकर धनलक्ष्मी अपने आप में बहुत रोती थी ऐसे कुछ दिन बीच जाते हैं एक दिन चिप सभी मिलकर खाना खा
02:10करती है मुझे माफ कर दीजे मा खुदा को गवा मानकर मैंने इस से शादी किया है इसको भूलकर मैं किसी और से शादी नहीं कर पाऊंगा तब कुसुमा देवी आदित्य वर्मा की और देखते हुए सुनिए आपको क्या कहना है इस पे आपके बेटे को आप खुद समझा�
02:40मा ये दोनों तो एक दूसरे के साथ बहुत खुश है बाकी भगवान की लिला उनका ही लिखा होगा ऐसे कहते हैं ये वंश यही नहीं रुकेगी अरे गाव में सब के सामने मैं अपना मू नहीं दिखा पा रही हूँ जमंदार के घर में क्या कमी है वो ऐसे बहु को क्यों �
03:10धर्मराजू गुस्से में उठता है और मा अगर हमारे वाजे से आपको ये सब सुना पड़ रहा है तो मैं और मेरी बीवी इस घर से और इस गाउं से ही बाहर चले जाएंगे
03:21मुझे माव किजे पापा ये कहकर वो तुरंत अपने बीवी धनलक्ष्मी को लेकर उस घर से और उस गाउं से चले जाता है ऐसे घर चोड़कर धर्मराजू और धनलक्ष्मी वही पास में मौजूर रंगापुरम नमक गाउं में वहाँ एक खाने की शाला चलाते हुए उन
03:51ऐसे ही एक दिन जब वो दोनों लकड़ी लाने जंगल जाते हैं वहाँ लकड़ी काड़ते हुए धर्मराजू की महनत दिख धनलक्ष्मी ऐसे कहती है
04:01सुनिये आपके मा के कहे क्या अनुसार अगर आप एक और शादी कर लेतें कम से कम आपको ऐसे महनत तो करना नहीं पड़ता ऐसे कहती है दुख में
04:11जब मैंने तुमसे शादी किया था मैंने ये सोच कर तो नहीं किया था कि तुम मुझे बच्चे दोगे तबी मैं तुम्हारे साथ रहूँगा और ऐसा नहीं हुआ तो दूसरी शादी कर लोगा
04:22वो मेरा धर्म नहीं है धनलक्ष्मी, मैं कभी धर्म के खिलाफ नहीं चाता, लेकिन हमारे से घर छोड़के आने के कारण आपकी माँ उधर बहुत बुरा मान रही होगी ना, और वैसे उनकी ये चाहने में तो न्याय है ना, जैसे मेरे पिता ने कहा है, ये सब भगवान का ल
04:52काम करो, ऐसे कहता है, ऐसे वो दुनों बात करते करते, देखते हैं कि वहाँ एक गाय घास खाते हुए उनके पास आती है, उसे देख धनलक्ष्मी, सुनिये, इतनी सुनसान जंगल में ये गाय कहां से आई है, ऐसे पूछती है, शायद अपने भीर से अलग होकर आ गई है,
05:22तुम्हारी मर्जी, ये कहकर वो उस गाय के पास जाकर उसे देखते हैं, इसका पूछ बला तेड़ी क्यों है, जैसे कोई सुवर का हो, ऐसे कहता है, अब मुझे क्या पता, वैसे भी सारे जानवर एक ही तरह थोड़ी होंगे, चलिए ना बहुत देर हो चुकी है, ये कहकर
05:52उसको घास और पानी देते हैं, ये देख गाय बहुत खिश होता है, और इसलिए वो अपने पूछ को खोल कर वही मौझोद लकडियों को छूती है, और बस तुरंत वो सब सोनी में बदल जाता है, अपनी आंखों के सामने ये सब देख, पती-पतनी दोनों आश्चिर रच
06:22उस सोने से उनको जो भी पैसे मिले, वो दोनों उसमें से एक भी रुपए ना लेकर, उन सारे पैसों को अपने खाने की शाला में उप्योग करते हैं, और भूकों को खिलाने के लिए, और ये सब भी मुफ्त में करते थे, निस्वार्थी होकर, जो भी पैसे उनको मिले, व
06:52परन जब भी उन दोनों के पास पैसे खतम हो जाते थे ये जादूई गाए उनके घर में मौजूद कोई भी सामान को छूती थी और बस वो सामान सोने में बदल जाता था ये देख धर्मराजों और दनलक्ष्मी एक दूसरे से ऐसे कहते हैं
07:10हमारे तो बच्चे भी नहीं है और इतना पैसा भी तो है तो जिनको भी कोई पैसों की या मदद की जरूरत हो उनके लिए इस धन का हम उप्योग करेंगे
07:20हाँ जी हम यही करेंगे और इतना ही नहीं इस खाने की शाला में जो भी भूका आएगा उसको हमेशा हम मुफ्त में खाना खिलाएंगे वो भी पेट भर
07:32ऐसे धर्मराज और धनलक्ष्मी उसी गाव में नहीं बल्कि आसपास के सारे गाव में अन्नपूर्णा नामक जोड़ी का नाम कमाते हैं
07:42देखा दनलक्ष्मी अगर हम घर छोड़ कर यहां नहीं आते तो ये जादूई गाए हमें कभी नहीं मिलता और उसी के साथ इतना अच्छा नाम भी अब इसी को भाग ये कहते हैं
07:57हाँ जी बचे ना रहने की बाधा इन सब के प्यार के सामने तो खुछ नहीं है
08:04हाँ दनलक्ष्मी तूसरों की मदद करने में जो खुशी मिलती है उसके सामने ये सुन्दर्ता अमीर्ता ये सब कोई माइने नहीं रखता
08:16ऐसे उन दोनों को इतनी अच्छी नाम देने वाली काम धेनू का वो बहुत अच्छा ख्याल रखते हैं प्यार से और इज़त से उसकी देखबाल करते हैं
08:27नैतिक निस्वार्थियों को धर्म कोई भी रूप में बचाते ही रहता है
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