00:10खुशाम दीद
00:10आज हम पाकिस्तान की एक ऐसे हिस्से का जाइजा लेने वाले हैं जो आम तोर पर दुनिया की नजरों से
00:16ओज़ल रहता है
00:16ये है जिला सांगः एक ऐसी अनोखी जगा जहां बिलकुल मुक्तलिफ मनाजर और तसदाद एक ही खिते में आकर आपस
00:24में मिल जाते हैं
00:25ऐसी कौन सी जगा हो सकती है जहां एक तरफ दूर दूर तक पहले सफैद सहरा हो
00:30दूसी तरफ जजीरों के बीचों बीच सदियों पुरानी अजीम हवीलियां खड़ी हो
00:34और साथ ही आग पर भुनी हुई लजीज तरीन रिवायती खुराग भी दस्तियाब हो
00:38सुनने में किसी तखयोलाती कहानी जैसा लगता है
00:41और यही चीज आगे आने वाले हकाइक के लिए एक जबरदस तजस्स पैदा करती है
00:46लेकिन ये कोई कहानी नहीं है
00:47जवाब है सिंद का जिला सांगहर
00:50ये इस बात का सबूत है कि किस तरह ये अकेला खिता सफर करने वालों के लिए
00:55हवास बाखता और तारीखी हैरानियों का एक मुकमल मजमुवा अपने अंदर समोई हुए है
00:59तो चलिए आज के इस सफर में हम इन चार एहम नुकात पर बात करते हैं
01:05पहला सांगहर की तरफ जाने वाले रस्ते
01:07दूसरा सहरा की हैरत अंगेज जीले
01:10तीसरा माजी की बाजगर्ष्ट
01:13और आखिर में यहां का एक लाजवाब पक्वान
01:16पहला हिस्सा दे रोड्स टू संगहर
01:19आईए देखते हैं कि इस आलाखे तक पहुंचने का रास्ता कैसा है
01:23माजी में यहां के रास्ते इतने खराब और तूट-फूट का शिकार थे
01:27कि लोग अपनी गाड़िया लाने से हिचके चाते थे
01:29लेकिन अब मनज़र बिलकुल बदल चुका है
01:31हालिया हुकूमती मनसूमों की बदौलत
01:34जिन में मुकामी सियास्तदान एमने शाजिया मरी की
01:36मनजूर करदा स्कीम्स भी शामिल है
01:38अब यहां चमचमाती और हमवार सडके बन चुकी है
01:41यहां सफर करना अब इंतहाई आसान और महफूज हो गया है
01:45और इन नई सडकों पर सफर करते वे जो मनजर बनता है न वो वाकी कमाल है
01:49इक खुशक सहरा की तरफ जाते हुए रास्ते में हेरत अंगीज तोर पर सरसब जरह ये लाके आते हैं
01:55कपास के खेट, गन्ने की लंबी फसलें और आम के वसी बागाद इस सफर को इंतहाई खुशकवार और ताजगी बख्ष
02:02बना देते हैं
02:03दूसरा हिस्सा लेक्स ओफ दे डेजर्ट
02:05आईए इन रास्तों से आगे निकल कर अच्छो थर के राजों से परदा उठाते हैं
02:10जब इन पोखता सडकों को छोड़कर रास्ता आच्छो थर की तरफ मुड़ता है तो एक नया तजस्स चनब लेता है
02:16इस सख्त और खुशक रेतीली जमीन के तीन से चार किलोमेटर कहराई में अगर क्या चुपा हो सकता है
02:22जहां पहुंचने के लिए मखसूस 4x4 जीबे बुक करनी परती है
02:26वहां चुपी है बोतर जील
02:27सफेद सहरा की बीचूं बीच मीठे पानी का ये चश्मा किसी हैरान कुन मौजज़े से कम नहीं
02:33जो 7 किलोमेटर लंबा और 1.5 किलोमेटर चौड़ा है
02:36एक ऐसी जील जो फूलते हुए कमल के फूलों से लदी हुई हो
02:41उसका तसवूरी कितना दिलकश है
02:43सर्दियों के मौसम में चलने वाली थंडी हवा
02:45और यहां हिज़त करके आने वाले परिंदों का वसी मनजर
02:49इस जगा को एक मुकमल जन्नत का रूप दे देता है
02:52दिलचस्प बात ये है कि ये जील अकेली नहीं है
02:55बलकि ग्रेटर थर नैशनल पार्क के आबी निजाम का एहम हिस्सा है
02:58होतासल में ये है कि चोटियारी डैम
03:01जमराओ के नाल से आने वाले सेलाबी पानी को जमा करता है
03:04जो बाद में फैल कर मुक्तलिफ मौसमी जीलों का एक वसी नेटवर्क बनाता है
03:08इसी निजाम में माखी रिवर भी शामिल है
03:10जिसका नाम यहां कसरत से पाए जाने वाली शेहत की मक्यों की वज़ा से बढ़ा है
03:14है ना है रात अंगेज
03:18अब रुख करते हैं सांगर की गहराई में छुपी कदीन तारीख की तरफ
03:22यहां कुदरती मनाजर के साथ साथ कदीन तारीख का एक मुकमल खाकावी सामने आता है
03:28कुबा मीर्स शादाद के कबरिस्तान में 1693 में बनने वाला मिया नासर मुहमद मीर फताली का मकबरा हो
03:34या 1734 का मिया नासर मुहमद मीर शादाद का मकबरा
03:38इसके इलावा 19 सेंचरी के तालपूर मीर्स की कबरें भी यहां मौजूद है
03:42इन कबरों पर पत्थर की बारीक तराशी और फ्रेसको की रंगीन नकाशी उस दौर के अजीम फन का बहतरी नमुना
03:50है।
03:51फिर आता है 1936, ये वो साल था जब यहां मौजूद अजीम हवेलियां वीरान हो गई।
03:56इन ही वीरान हवेलियों को मकामी जबान में मारिस कहा जाता है।
04:00चोटियारी डैम के जजीरों पर जुनेजो बरादरान की बनबाई हुई ये तीन मंजिला हवेलियां अपने अंदर एक अचीब सी इसरारियत
04:07रखती हैं।
04:08इनकी सबसे बड़ी खासियत इनकी तीन से चार फुट मोटी मिटी और गारे की दीवारें थी जो मौसमी शिदत को
04:15रोकती थी।
04:16जब जदीद सड़के नहीं थी तो शाम के वक्त इनी जील के किनारों पर महफिले सचती थी।
04:21अब खंडरात होने के बावजूद इनका जादू काइम है।
04:24चौथा और आखरी हिस्सा, A Culinary Masterpiece
04:28आईए चक्कर देखते हैं यहां का एक अजीम पकवान।
04:32जैसी सांगर शहर में शाम ढलती है, एक मशूर मकामी पकवान तयार किया जाता है।
04:37पूरे दो घंटे लगते हैं इसमें, ये वक्त असल में उस सबर और लगन को जाहर करता है जो इस
04:43डिश की बुनियाद है।
04:44सर्दियों की ठंडी रात हो, सामने कुंडी हुई आग जल रही हो और आहिस्ता आहिस्ता भुनती हुई एक वस्यो अरीज
04:50मचली, क्या ही मनजर बनता है।
04:53ये अब्दल जबार मला के स्टॉल का माहौल है, जहां स्लो रोस्टिंग का ये बेमिसाल तरीका अपनाया जाता है।
04:59इस मुन्फरज सजी को बनाने के मराहिल इंतहाई दिलचस्प हैं।
05:02पहला कदम नर्म और ताजा मीठे पानी की रोहु मचली का इंतखाब किया जाता है।
05:07दूसरा कदम इस पर मुकामी खुश्क मसाले जैसे धनिया, जीरा और काली मिर्च लगाए जाते हैं।
05:13यहां सबसे वाज़ और हिरान कुन बात यह है कि इसमें तेल या पानी का इस्तमाल बिल्कुल सिफर है।
05:18तीसरा कदम मचली को लकडी की सीखों पर लगाकर आग के इर्दकिर्द आहिस्ता आहिस्ता भुनना।
05:23नतीजे में जो बगेर तेल का नरम पकवान मिलता है, उसकी क्रीमा तकरीबन साड़ी चार डॉलर फी किलो होती है,
05:29जिसे एक फर्द बासानी शौक से खा सकता है।
05:32इस लाजवाब जाइके के बारे में खुद अब्दुर जबार मला का कहना है कि अल्ला ने हमारे हाथों में जाइका
05:38रखा है, लोग इसे खाते हैं और बार बार वापस आते हैं, इन्होंने ये अनोखा हुनर अपने उस्तादों से सीखा
05:44था।
05:45इनकी सज्जी की शहरत का अंदाजा इस बात से बखुबी लगाया जा सकता है कि मकामी रुहानी पेशवाओं से लेकर
05:50आज के दौर के अजीम ट्रावल व्लॉगर्स तक हर कोई इस दुकान का रुख जरूर करता है।
06:15पहतरीन इम्तजाज मौजूद है। इस जाइजे से ये सबक मिलता है कि आम रास्तों से हटकर जो मंजले होती हैं
06:20वो हमेशा नई तजरुबात से भरी होती है। तो जब भी अगली बार सफर का इरादा बने ऐसे छुपे हुए
06:26खजानों को खोजना एक यादकार तच्वब
06:28साबित हो सकता है।