00:10आईए आज हम चलते हैं सिंद की एक ऐसे शहर की तरफ जिसकी हर पुरानी गली और हर पुरानी इंट
00:16के पास सुनाने के लिए सदियों पुरानी एक कहानी है
00:18ये शिकारपूर है एक ऐसा शहर जो किसी जमाने में आलमी तेजारत के चोराहे पर एक चगमगातावा मरकज हुआ करता
00:26था
00:26अच्छा तो चलिए इस कहानी में जरा गहराई तक जाते हैं
00:30क्या शिकारपूर सिर्फ पुराने और कदीम खंडरात का नाम है या ये एक जिन्दा तारीखी दास्तान है जो आज भी
00:36सांस ले रही है
00:37ये जानना वाकी बहुत दिल्चस्प है
00:39ये शहर दर असल एक ऐसी जिन्दा दस्तावेज है जहां माजी और हाल पिलकुल एक साथ कदम से कदम मिलाकर
00:46चलते हैं
00:47आईए मिलकर इस राज से परदा उठाते हैं
00:49तो शुरू करते हैं इस जाइजे के पहले हिस्से से
00:52सिंद का पैरिस जो कभी आलमी तिजारत का एक अजीम मरकज था
00:57अगर हम तारीख के और आग पल्टें तो पता चलता है कि शिकारपूर अपनी बेपना दौलत की वज़र से किस
01:02तरह औरूज पर पहुंचा
01:03जरा इस टाइम लाइन पर गोर कीजे
01:061617 में एक शिकारगा के तोर पर शुरू होने वाला ये इलाका देखते ही देखते एक अजीम बैनलाक्वामी तिजारती मरकज
01:12में तबदील हो गया
01:13फिर 1780 की दहाई में मशूर ढख बजार दामीर हुआ और 1935 में वो अजीम क्लॉक टावर
01:20लेकिन 1947 का साल एक ऐसा दर्दनाक मोर साबित हुआ जिसने इस शहर की पूरी समाजी और तिजारती साख्त को
01:27हमीशा के लिए बदल कर रख दिया
01:29अब जरा इस पात पर ध्यान दे अठारवी और 19वी सदी में बुखारा या समरकंद का लंबा सफर करने वाले
01:35ताजरों को अपने साथ कैश ले जाने की जरूरत ही नहीं होती थी
01:38हिरानगी की बात है न वो एक इंतहाई काबले एतमाद हुंडी निजाम इस्तमाल करते थे
01:43मतलब सिर्फ मकामी ताजरों की मोहर लगी रसीदे चलती थी
01:47ये ताजर दरसल अपने दौर के ग्लोबल क्यापिटलिस्स थे
01:51जदीद बैंकिंग का जो तसवर आज हम देखते हैं वो यहां सदियों पहले बड़े
01:55कामियाब अंदाज में चल रहा था आगे बढ़ते हैं दूसरे हिस्से की तरफ लकडी इंट और तिजारत यानि
02:01यहां के हैरत अंगेज तामिराती शाहकार जब किसी शहर में ऐसी
02:21इचली का निसाम और उनके अपने हाथ से बनेवे सिक्के चलते थे यही वो चीज़ें जिनकी वज़े से बिलकुल ठीक
02:26मश्रिक का पैरिस कहा जाता था
02:28और यह बात बिलकुल वाज़ हो जाती है जब हम प्रोफेसर अनीला नईम के इन अलफाज पर गोर करते हैं
02:33उन्होंने बताया कि इन हवेलियों में इस्तमाल होने वाली कश्मीरी दियार और सागवान की लकड़ी की पेचीदा बालकनिया सिर्फ सजावट
02:40के लिए नहीं थी
02:40उन पर की गई नकाशी दरसल एक कैनवस थी जो वहां की सकाफती पहचान, मुतनवो तशखुस और मजभी हम आहंगी
02:48के खुबसूरत मिलाब को जाहर करती थी
02:50तीसरा हिस्सा अकायत का गुल दस्ता और उनका आपस में मिलजल कर रहना
02:55उन लोगों का खिकर करना तो इंतहाई एहम है जिन्होंने मिलकर इस शहर को तामीर किया था
03:00अगर हम 18 सदी के तारीखी जोगमाता मंदर जाएं तो वहां आज भी हटवांकी रसमल खत देखा जा सकता है
03:07ये एक मखसूस क्रिप्ट था जो हिंदू ताजर अपनी तिजारती खतो के ताबत के लिए इस्तमाल करते थे
03:11ये चोटी सी तहरीर दरसल उस हिंदू ताजर तबके के अस्रो रसूख और शहर की तरकी में उनके किरदार की
03:18एक पूरी कहानी सुनाती है
03:19ये उस हम आहंग और पुर अमन माशरे की एक जलग है जो 1947 की तक्सीम से पहले यहां आबाद
03:26था
03:26जरा यहां देखिए ये तमाम तारीखी मकामात इस बात की जीती जागती गवा हैं कि किस तरह मुखतलिफ मजाहें और
03:33सिकाफतें एकी जगा कंधे से कंधा मिला कर खड़ी थी
03:36गदीम हिंदू मंदिर, रुहानी दरगाहें, तारीखी मसाजिद और बरतानवी दौर का क्लॉक टावर
03:42यह सब एक साथ मिलकर यह साबित करते हैं कि शिकारपूर मुखतलिफ कम्यूनिटीज की खुबसूरत मिलाब से बुना गया था
03:49चौथा हिस्सा, पक्वान की रिवायात, वो जाइके जो आज भी जिन्दा है
03:54यहां हम एक ऐसी जिन्दा और जावेद मीरास की बात करेंगे, जो आज भी अपनी पूरी आब उताब के साथ
03:59महफूज है
04:00और वो है यहां का लाजवाब खाना, शिकारपुरी आचार की तैयारी किसी आर्ट से कम नहीं, जरा इन अज़्जा को
04:06देखें
04:06दस किलो आम, चने, लेसन और सबसे खास चीज, कमल की जड़, जिसे मकामी जबान में बीह कहते हैं
04:14इन सब को हातों से बड़े-बड़े बरतनों में मिलाया जाता है
04:17यह भी ही है जो इस अचार को एक मुनफरिद क्रंच और जाइका देती है
04:21और आज भी यह पूरी दुनिया में एक्सपोर्ट होता है
04:25एक सौचालीस यह वो सालों की तादाद है जबसे दीवान की कुल्फी फालूदा मुसलसल फरुख्त हो रहा है
04:31नाराइन दास ने कियाम पाकिस्तान से बहुत पहले से शुरू किया था
04:35और सोचने की बात यह है कि 140 साल बाद भी यह खालिस और बगएर मिलावट की मीठी डिश अपनी
04:41उसी शानदार रिवायती तरकीब के साथ लोगों के दिलों पर राज कर रही है
04:45पांचवा और आखरी हिस्सा
04:48मांध पढ़ती शान और इस अजीम विरसे का तहफुज
04:51लजीज खानों की इस चमकती सिकाफ़त के वरक्स अगर हम शहर की मौजूदा हालत देखें तो हकीकत थोड़ी तलख है
04:581947 की तकसीम एक ऐसा तारीखी मोर था जिसनी हिंदू ताजर तपके की बड़ी हिजरत को जनम दिया
05:04जब असली खानदान यहां से चले गए तो ये अजीम शान हवेलियां ऐसे नए मालकान के पास आ गएं जिनके
05:10पास इंकी देखवाल के वसाइल नहीं थे
05:12और यूँ शेहर की इस खुबसूरत तर्ज तामीर की रूख एक तरह से कमजोर पड़ गई और वक्त के साथ
05:18-साथ पुरानी चीजें बेचने वालों का निशाना बनने लगी
05:20तो एहम नुक्ता यहां यह है कि आज जब कोई तारीखी ढख बाजार की उन पुरानी गल्यों से कुजरता है
05:27तो मुकामी ताजर नजीर अहमत कुरेशी के अलफाज बिल्कुल सच महसूस होते हैं
05:31वो कहते हैं कि ऐसा लगता है जैसे कोई खुआब हो गोया हम किसी दूसरी दुनिया में खतम रख रहे
05:36हैं
05:36एक गुजरे हुए शानदार माजी की कौन्ज और इन लक्री की चछतों तले रेशम की वो पुरानी महग आज भी
05:42महसूस की जा सकती है
05:43एक अजीब सी उदासी है सहसास में
05:46इस चाइज़े के इखताम पर ये सवाल जहन में जरूर उभरता है कि हम और हमारा मौशरा उन लोगों की
05:53यादों और उन बाकी रह जाने वाली खस्ता हाल इमारतों को बेहतर तरीके से कैसे महफूस कर सकते हैं
05:59ये सिर्फ पुरानी इंटे नहीं है ये हमारी एक मुश्तरका तारीख है इस जिन्दा तारीख को हमेशा के लिए मिटने
06:05से पहले बचाने की कितनी अशच जरूरत है ये एक ऐसी सोच है जो हम सब को अपने साथ लेके
06:11जानी चाहिए जरा सोचिए का जरूर
06:30झाल