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شکارپور — سندھ کا وہ تاریخی شہر جسے کبھی "پیرس آف دی ایسٹ" کہا جاتا تھا۔ ❤️

اس خصوصی دستاویزی فلم میں ہم آپ کو شکارپور کے قدیم اور تاریخی ورثے کی سیر کرواتے ہیں، جہاں ڈھک بازار، لکھی در، ہزاری در، شاہی بازار، پرانی حویلیاں، تاریخی ہندو مندر، مساجد اور پرانے شہر کی تنگ و خوبصورت گلیاں آج بھی اپنے شاندار ماضی کی داستان سناتی ہیں۔

شکارپور کبھی تجارت کا ایک اہم مرکز تھا اور یہاں مختلف تہذیبوں، مذاہب اور ثقافتوں نے مل کر ایک منفرد شہری ورثہ تشکیل دیا۔ قدیم حویلیوں کا خوبصورت لکڑی کا کام، نقش و نگار اور روایتی طرزِ تعمیر اس شہر کی شناخت کا اہم حصہ ہیں۔

اس فلم میں شکارپور کے مشہور اچار، مٹھائیاں، خدمت نمکین اور روایتی فوڈ کلچر کا بھی ذکر کیا گیا ہے، جو آج بھی شہر کی ثقافتی پہچان کو زندہ رکھے ہوئے ہیں۔

یہ ڈاکیومنٹری خاص طور پر ان لوگوں کے لیے بھی ہے جن کے والدین، دادا دادی یا بزرگوں کا تعلق شکارپور سے رہا ہے اور جو آج بھی اپنے آبائی شہر کو یادوں میں محسوس کرتے ہیں۔

اگر آپ کا تعلق شکارپور سے ہے تو یہ ویڈیو آپ کے لیے یادوں، تاریخ اور ثقافت کا ایک خوبصورت سفر ہے۔

📍 شکارپور، سندھ، پاکستان
🎥 Apna TV New York

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00:10आईए आज हम चलते हैं सिंद की एक ऐसे शहर की तरफ जिसकी हर पुरानी गली और हर पुरानी इंट
00:16के पास सुनाने के लिए सदियों पुरानी एक कहानी है
00:18ये शिकारपूर है एक ऐसा शहर जो किसी जमाने में आलमी तेजारत के चोराहे पर एक चगमगातावा मरकज हुआ करता
00:26था
00:26अच्छा तो चलिए इस कहानी में जरा गहराई तक जाते हैं
00:30क्या शिकारपूर सिर्फ पुराने और कदीम खंडरात का नाम है या ये एक जिन्दा तारीखी दास्तान है जो आज भी
00:36सांस ले रही है
00:37ये जानना वाकी बहुत दिल्चस्प है
00:39ये शहर दर असल एक ऐसी जिन्दा दस्तावेज है जहां माजी और हाल पिलकुल एक साथ कदम से कदम मिलाकर
00:46चलते हैं
00:47आईए मिलकर इस राज से परदा उठाते हैं
00:49तो शुरू करते हैं इस जाइजे के पहले हिस्से से
00:52सिंद का पैरिस जो कभी आलमी तिजारत का एक अजीम मरकज था
00:57अगर हम तारीख के और आग पल्टें तो पता चलता है कि शिकारपूर अपनी बेपना दौलत की वज़र से किस
01:02तरह औरूज पर पहुंचा
01:03जरा इस टाइम लाइन पर गोर कीजे
01:061617 में एक शिकारगा के तोर पर शुरू होने वाला ये इलाका देखते ही देखते एक अजीम बैनलाक्वामी तिजारती मरकज
01:12में तबदील हो गया
01:13फिर 1780 की दहाई में मशूर ढख बजार दामीर हुआ और 1935 में वो अजीम क्लॉक टावर
01:20लेकिन 1947 का साल एक ऐसा दर्दनाक मोर साबित हुआ जिसने इस शहर की पूरी समाजी और तिजारती साख्त को
01:27हमीशा के लिए बदल कर रख दिया
01:29अब जरा इस पात पर ध्यान दे अठारवी और 19वी सदी में बुखारा या समरकंद का लंबा सफर करने वाले
01:35ताजरों को अपने साथ कैश ले जाने की जरूरत ही नहीं होती थी
01:38हिरानगी की बात है न वो एक इंतहाई काबले एतमाद हुंडी निजाम इस्तमाल करते थे
01:43मतलब सिर्फ मकामी ताजरों की मोहर लगी रसीदे चलती थी
01:47ये ताजर दरसल अपने दौर के ग्लोबल क्यापिटलिस्स थे
01:51जदीद बैंकिंग का जो तसवर आज हम देखते हैं वो यहां सदियों पहले बड़े
01:55कामियाब अंदाज में चल रहा था आगे बढ़ते हैं दूसरे हिस्से की तरफ लकडी इंट और तिजारत यानि
02:01यहां के हैरत अंगेज तामिराती शाहकार जब किसी शहर में ऐसी
02:21इचली का निसाम और उनके अपने हाथ से बनेवे सिक्के चलते थे यही वो चीज़ें जिनकी वज़े से बिलकुल ठीक
02:26मश्रिक का पैरिस कहा जाता था
02:28और यह बात बिलकुल वाज़ हो जाती है जब हम प्रोफेसर अनीला नईम के इन अलफाज पर गोर करते हैं
02:33उन्होंने बताया कि इन हवेलियों में इस्तमाल होने वाली कश्मीरी दियार और सागवान की लकड़ी की पेचीदा बालकनिया सिर्फ सजावट
02:40के लिए नहीं थी
02:40उन पर की गई नकाशी दरसल एक कैनवस थी जो वहां की सकाफती पहचान, मुतनवो तशखुस और मजभी हम आहंगी
02:48के खुबसूरत मिलाब को जाहर करती थी
02:50तीसरा हिस्सा अकायत का गुल दस्ता और उनका आपस में मिलजल कर रहना
02:55उन लोगों का खिकर करना तो इंतहाई एहम है जिन्होंने मिलकर इस शहर को तामीर किया था
03:00अगर हम 18 सदी के तारीखी जोगमाता मंदर जाएं तो वहां आज भी हटवांकी रसमल खत देखा जा सकता है
03:07ये एक मखसूस क्रिप्ट था जो हिंदू ताजर अपनी तिजारती खतो के ताबत के लिए इस्तमाल करते थे
03:11ये चोटी सी तहरीर दरसल उस हिंदू ताजर तबके के अस्रो रसूख और शहर की तरकी में उनके किरदार की
03:18एक पूरी कहानी सुनाती है
03:19ये उस हम आहंग और पुर अमन माशरे की एक जलग है जो 1947 की तक्सीम से पहले यहां आबाद
03:26था
03:26जरा यहां देखिए ये तमाम तारीखी मकामात इस बात की जीती जागती गवा हैं कि किस तरह मुखतलिफ मजाहें और
03:33सिकाफतें एकी जगा कंधे से कंधा मिला कर खड़ी थी
03:36गदीम हिंदू मंदिर, रुहानी दरगाहें, तारीखी मसाजिद और बरतानवी दौर का क्लॉक टावर
03:42यह सब एक साथ मिलकर यह साबित करते हैं कि शिकारपूर मुखतलिफ कम्यूनिटीज की खुबसूरत मिलाब से बुना गया था
03:49चौथा हिस्सा, पक्वान की रिवायात, वो जाइके जो आज भी जिन्दा है
03:54यहां हम एक ऐसी जिन्दा और जावेद मीरास की बात करेंगे, जो आज भी अपनी पूरी आब उताब के साथ
03:59महफूज है
04:00और वो है यहां का लाजवाब खाना, शिकारपुरी आचार की तैयारी किसी आर्ट से कम नहीं, जरा इन अज़्जा को
04:06देखें
04:06दस किलो आम, चने, लेसन और सबसे खास चीज, कमल की जड़, जिसे मकामी जबान में बीह कहते हैं
04:14इन सब को हातों से बड़े-बड़े बरतनों में मिलाया जाता है
04:17यह भी ही है जो इस अचार को एक मुनफरिद क्रंच और जाइका देती है
04:21और आज भी यह पूरी दुनिया में एक्सपोर्ट होता है
04:25एक सौचालीस यह वो सालों की तादाद है जबसे दीवान की कुल्फी फालूदा मुसलसल फरुख्त हो रहा है
04:31नाराइन दास ने कियाम पाकिस्तान से बहुत पहले से शुरू किया था
04:35और सोचने की बात यह है कि 140 साल बाद भी यह खालिस और बगएर मिलावट की मीठी डिश अपनी
04:41उसी शानदार रिवायती तरकीब के साथ लोगों के दिलों पर राज कर रही है
04:45पांचवा और आखरी हिस्सा
04:48मांध पढ़ती शान और इस अजीम विरसे का तहफुज
04:51लजीज खानों की इस चमकती सिकाफ़त के वरक्स अगर हम शहर की मौजूदा हालत देखें तो हकीकत थोड़ी तलख है
04:581947 की तकसीम एक ऐसा तारीखी मोर था जिसनी हिंदू ताजर तपके की बड़ी हिजरत को जनम दिया
05:04जब असली खानदान यहां से चले गए तो ये अजीम शान हवेलियां ऐसे नए मालकान के पास आ गएं जिनके
05:10पास इंकी देखवाल के वसाइल नहीं थे
05:12और यूँ शेहर की इस खुबसूरत तर्ज तामीर की रूख एक तरह से कमजोर पड़ गई और वक्त के साथ
05:18-साथ पुरानी चीजें बेचने वालों का निशाना बनने लगी
05:20तो एहम नुक्ता यहां यह है कि आज जब कोई तारीखी ढख बाजार की उन पुरानी गल्यों से कुजरता है
05:27तो मुकामी ताजर नजीर अहमत कुरेशी के अलफाज बिल्कुल सच महसूस होते हैं
05:31वो कहते हैं कि ऐसा लगता है जैसे कोई खुआब हो गोया हम किसी दूसरी दुनिया में खतम रख रहे
05:36हैं
05:36एक गुजरे हुए शानदार माजी की कौन्ज और इन लक्री की चछतों तले रेशम की वो पुरानी महग आज भी
05:42महसूस की जा सकती है
05:43एक अजीब सी उदासी है सहसास में
05:46इस चाइज़े के इखताम पर ये सवाल जहन में जरूर उभरता है कि हम और हमारा मौशरा उन लोगों की
05:53यादों और उन बाकी रह जाने वाली खस्ता हाल इमारतों को बेहतर तरीके से कैसे महफूस कर सकते हैं
05:59ये सिर्फ पुरानी इंटे नहीं है ये हमारी एक मुश्तरका तारीख है इस जिन्दा तारीख को हमेशा के लिए मिटने
06:05से पहले बचाने की कितनी अशच जरूरत है ये एक ऐसी सोच है जो हम सब को अपने साथ लेके
06:11जानी चाहिए जरा सोचिए का जरूर
06:30झाल

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