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01:01यानि जिदीद तालीम और जहनों की आवियारी से.
01:04अगर हम आज के नवाब शाँ पर नजर दोड़ाएं तो ये आला तालीम का एक जबरदस गड़ बन चुका है.
01:09यहाँ बैचलर्स के पचपन और डिप्लोमा के ग्यारा प्रोग्राम्स तो हैं ही,
01:12लेकिन हैरे तंगे इस बात यह है कि मास्टर्स लेवल के 125 कोसिस करवा जा रहे हैं।
01:17यानि यहाँ का तालीमी रुजान सिर्फ बनियाद ये डिग्रियों तक महदूत नहीं बलके तहकीक और एडवांस टड़ीज पर कमाल का
01:22फोकस किया जा रहा है।
01:24और इस इल्मी इनकलाब में सबसे बड़ा हाथ पबलिक सेक्टर यानि सरकारी जामियाद का है।
01:54इस इलाके की आब होवा काफी सख्त और खुश्क है।
01:57यहां की गर्मिया लगबग साथ महीने तक चलती हैं और बारिशें बराए नामी होती है।
02:01मगर दिल्चस्प बात ये है कि इसी खुश्क और सख्त मौसम ने एक बहुत बड़ा काम किया है।
02:06उसने सदियों पुरानी तारीख को इस मिटी के अंदर बिलकुल महفوظ रखा है।
02:11इंतजामी लिहाद से भी सिलाके की तारीख बड़ी हंगामा खेज रही है।
02:141843 में चार्ल्ज नेपियर ने सिंद को तक्सीम किया।
02:18फिर 1912 में बरतानवी दोरे हुकूमत में नवाब शा को एक बाकाइदा जिले का दर्जा मिला।
02:23पाकिस्तान बनने के बाद 1954 में सांगरिस से अलग हुआ और फिर 1999 में नोशेरो फेरोज को भी सेलेदा कर
02:30दिया गया।
02:31यानि नक्षे पर लकीरें मसलसल बदलती रही है।
02:34अब हम अपने इस तज्जिय का रुख मूरते हैं उस जानिब जो वागई रॉंग टे खड़े कर देने वाला है
02:38यानि कदीम माजी की दरियाफ्ट खास्तोर पर कासिम कैरियो और गुजरी आर्कियोलोजिकल साइट।
02:45जहन में ये सवाल जरूर उबरता है कि इन शानदार कैंपिसेज और लहलाहाते खेतों के बिलकुल नीचे काई फुट गहराई
02:51में आखिर क्या चुपा है। कोई ऐसा राज जो सदियों से इनसानों की नजरों से ओजल था।
02:56इस हवाले से एक हालिया तहकीक सामने आई है जिसने सब को हैरान कर दिया है।
03:26कि ये महज मटी का धेर नहीं बलके पकी हुई और तराशी के इंटों से बना एक कदीम बुच्स दूपा
03:32है।
03:32और ये कोई सौदो सो साल पुराना नहीं बलके पहली सदी कबल मसी यानि फर्स सेंच्री बीसी का है।
03:38अब चलते हैं उन सुबोतों की तरफ जो इस मटी से बरामद हुएं यानि नवादरात का तज्जिया।
03:44यहां से मिलने वाले मटी के बर्तनों पर एक कमाल की तेकनिक इस्तमाल हुई है जिसे अपलिक डिजाइन कहते हैं।
03:50यह महस कोई सजावट नहीं थी।
03:51कदीम लोग बर्तन के उपर मटी की एक इजाफी तेह लगा देते थे।
03:54ताकि जब इसे आग पर रखा जाए तो वो शदीद गर्मी से चटक ना जाए।
03:58यह उन लोगों की शांदार अमली जहानत का मूँ बोलता सुबूत है कि वो अपने रोज मरा के मसाइल कैसे
04:03हल करते थे।
04:04इसी तना एक और डिजाइन जो यहां से मिला वो है चेकर डिजाइन।
04:08यह बर्तनों पर खाने या ग्रिट बनाने का एक अंदास है।
04:10बिल्कुल एक बसाद की तरह जिसमें एक खाना भरा हुआ और एक खाली होता है।
04:15यह सिर्फ एक नक्षो निगार नहीं है बलके एक ऐसा तारीखी निशान है जिसके ताने बाने मैसोपोटेमिया से लेकर वादिय
04:20सिंध की तहजीब तक जुड़े हुए।
04:21अगर हम इन नवादरात का मवाजना करें तो हमें एक तरफ वो एपलिक तहचड़े बरतन अज़र आते हैं जो किचन
04:27के सकत इस्तमाल के लिए बनाए गए थे और दूसरी तरफ वो बरतन हैं जिन पर नहायत नफासत से फूल
04:33और निशानात कुंदा किये गए हैं।
04:35ये फर्क हमें बताता है कि वो लोग सिर्फ जरूरत के तहत नहीं जीते थे बलके उनके अंदर एक जबरदस्ट
04:40जमालियाती हिस और हुनर भी मौजूद था।
05:05आईए अब इस पूरी कहानी को समीटते हैं और देखते हैं कि वक्त के आईने में ये शहर कैसे मुसलसल
05:11इर्तका के मराहिल तैय करता रहा है।
05:13ये तकाबल वाकि दंग कर देने वाला है। जरा तसफ़ूर करें।
05:16पहली सदी कबल मसी में ये जगा हिंदू और बुद्ध सकाफत, मजभी रसूमात और तिजारत का एक बड़ा मरकज थी।
05:22और आज 21 सदी 20 में ये वही खिताया जो जदीद आला तालीम और साइनसी तैकी के एक मतहरिक मरकज
05:28के तोर पर उभर रहा है।
05:30दो हजार साल से जादा का अरसा गुजर गया लेकिन नवाफशा में इनसानी तरक्की, इल्म और सीखने का अमल आज
05:36भी उसी तरह जारी हो सारी है।
05:38तो इस सब के बाद एक गहरा सवाल हमारे जैनों में रह जाता है।
05:41हमाज जिन जदीद और चमकते दमकते शहरों में बसते हैं।
05:44क्या पता उनकी सडकों और इमारतों के बिलकुल नीचे तारीकी में मजीद कितने ऐसे कदीम रास चुपे हों जो खोजे
05:50जाने के मुंतजर है।
05:51ये वाकिए एक ऐसा ख्याल है जो हमें सोचने पर मजबूर कर देता है।
05:54इस वज़ादी तेजिये में हमारे साथ जुड़े रहने का बहुत शक्रिया।