00:01नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक,
00:10विद्या वाचस्पती गुलाप उठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलिक, जिसका शीर्षक है बच्चों के भवि�
00:18परिवार समाज की सबसे छोटी किंतु सबसे मजबूत इकाई है, संतान परिवार की सबसे कोमल कड़ी है, जन्म के साथ
00:27ही वह मा की गोद, पिता का सहारा, दादा दादी का अनुभव, वह भाई भहनों का साथ पाता है, परिवार
00:35वह स्थान है, जहां केवल शरीर का जन्म �
00:37नहीं होता, बल्कि उसका व्यक्तित्व जन्म लेता है, परिवार की गोद में ही वह प्रेम, विश्वास, त्याग, अनुशासन और मानवता
00:45का पहला पाठ पड़ता है, इसलिए परिवार को समय देना केवल हमारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीडियों के प्र
01:06परिवार का सनेह, सुरक्षा वर संसकार जरूरी है, स्वस्थ वर सकारात्मक पारिवारिक वातावरन से उसका शारिरिक, मानसिक वर भावनात्मक विकास
01:16संतुलित रूप में होता है, वर्तमान जीवन शैली में परिवार वर समाज की परिभाशा बदल गई है, समय का अभा
01:37।
01:39वर्तमान शिक्षा पद्धती ने आत्मा को जानने का द्वार बंद कर दिया, केबल बुद्धी को विक्सित कर दिया, बुद्धी में
01:47सम्वेदना नहीं होती, हम भौतिक्ता की अंधी दोड में शामिल हो गए, जहां पैसा है, सुविधाय हैं, पर आपसी इसने
01:55हैं वह विश
02:08उपलब्ध कराने तक रह गया, किन्तु क्या कभी सोचा है कि इसका परिणाम कितना भयाव हो रहा है, हम जिस
02:16भविश्य की कल्बना कर रहे हैं, क्या वह सच में सुनहेरा होगा, हनुशासन समय की पाबंदी और सत्य भाशन करना
02:24एक अच्छे इंसान के गुर है, आज हम समय क
02:28कीमत को भुला चुके हैं, धन, यश, पद सब कमाया जा सकता है, किन्तु बीता हुआ समय लोट कर नहीं
02:36आता, परिवार के साथ पिताया समय वस्तुतह संसकार का वाहक है, विश्वास और अपनापन है, बच्चों को और भुजुर्गों के
02:47साथ समय बिताना जीवन की असली
02:49संपत्ती है, यदि माता पिता स्वयम के समय के प्रती अनुशासित होंगे, अपने वचन का पालन करेंगे और सत्य को
02:58महत्व देंगे, तो बच्चे भी इन ही मूल्यों को सहज रूप में ग्रहन करेंगे, उन्हें उपदेश देने से अधिक प्रभावी
03:05है कि स्वयम अपने
03:07आचरन से उनके सामने उदाहरन प्रस्तूत करें, परिवार में बुजरुगों की भूमी का अत्यंत महत्व कून है, दादा दादी और
03:16नानानी केवल परिवार के वरिष्ठ सदस्य नहीं होते बलकि वे अनुभव और परंपरा के जीवन तस्रोत होते हैं, उनके जीवन
03:24के �
03:25अनुभव बच्चों को संघर्ष, धेर्य, त्याग और रिष्टों की महत्ता समझाते हैं, संयुक्त परिवार घड़ते जाने की कारण बच्चों को
03:34इन अनुभवों से स्वाभाविक रूप से जुड़ने के अवसर भी कम हुए हैं, आज की भाग दौर भरी जिंदगी मे
03:41परिवार और बच्चे के बीच दूरी बढ़ रही हैं, इस रिष्टे को मजबूत बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यक्ता हैं,
03:49इसके लिए जरूरी है कि हम स्वयम बच्चों के सामने एक अच्छा उधारन बनें, ऐसे में परिवारों को चाहिए कि
03:59वे पीडियों के ब
04:11उनसे समबाद करें, उन्हें घर के बुजर्गों की देखभाल में हिस्सा बनाएं, पारिवारिक परंपराओं, जोहारों, पूजा आदी से जोड़ें, घर
04:21के निर्नयों में भी उन्हें शामिल करें, जब माता पिता बच्चे की बातें ध्यान से सुनते हैं, उनकी भावन
04:41हैं, लेकिन उसके साथ पावनात्मक सम्रिध्धी भी उतनी ही आवश्यक हैं, घर बड़ा होने से परिवार बड़ा नहीं होता, परिवार
04:50बड़ा तब होता हैं, जब उसमें प्रेम, विश्वास, सम्मान और समवेदना बड़ी हो, परिवार में संसकार किवल धालमिकिया �
04:58पारंपरिक्रिती रिवाजों का नाम नहीं है।
05:00किसी जरुरत मंद की सहायता करना,
05:03बढ़ों का सम्मान करना,
05:05छोटों से प्रेम करना,
05:07प्रकृति के प्रति संवेदन शील होना,
05:09महनत करना, इमानदार रहना,
05:11गलती स्वीकार करना और दूसरों की भावना को समझना भी संसकार है।
05:17फिर संसकारों का वास्तविक मुल्य तब दिखाई देता है,
05:22जब व्यक्ति अकेला हो और फिर भी सही रास्ते का चुनाव करे।
05:26नई पीढ़ी को परिवार और समाज से जोड़ना।
05:29इसलिए जरूरी हैं ताकि वह जिम्मेदार नागरिक और संबेदंशील समाज का हिस्सा बने।
05:36उठ्स में मानवता के भाव विक्सित हों, जुड़ाव तूटेगा,
05:40तो परिवार और समाज दोनों कमजोर हुएं, जुड़ाव बना रहें, तो अच्छे इंसानों से समाज भी जीवनत रहेगा।
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