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  • 11 minutes ago
पत्नी: स्थूल व सूक्ष्म की कला

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00:01नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिनन्दन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादत,
00:10विद्या वाचस्पती गुलाब पुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेक, जिसका शीर्शक है पत्नी इस्थू
00:29एक रिष्टे में जीती है, मा, बहन, पत्नी, बहु, आदी अनेक भूमिगाओं को जीने में वह अपने संपूर्ण माई क्षिक्तियों
00:38का प्रयोग करती है, ताकि हर रिष्टे की गरीमा भी बनी रहे और जीवन में व्यवस्था भी रहे, यही इस्थ्री
00:45की दिव्यता है,
00:46जिसमें वहस रिष्टी के संचालन को उचित रूप प्रदान करती है, इस्थ्री की यह भूमिका माया भाव तक सीमित न
00:56रहकर परा और अपरा प्रकृतियों के माध्यम से व्यक्त होती है, अपरा जहां बहरी पहचान, शरीर, मन और एहंकार से
01:03जुड़ी होती है, वही पर
01:05भीतरी जेतना के धरातल से जुड़ी है, जहां विभिन रिष्टे स्वास्वरूप का अंग नहीं बल्की धर्म स्वरूप है, रिष्टों में
01:14मैं को ढूड़ना ही माया का बंधन है, परा में जीना अर्थात मैं को रिष्टों से परे रखना ही माया
01:21से मुक्ती है, अपरा �
01:30ुप्रावपरा दोनों भावों के एक साथ जीवन जीने का सामर्चय है।
01:53इस्त्री के जीवन के विविद पक्षों की संपूर्ण गतिविध्यों का आकलन करें तो वह पिता के घर में मूल रूप
02:00से अपरा भाव में जीती हैं जहां शरीर प्रधान हैं किन्तु उसका परा सूख्ष में भाग भी जागरत रहता है।
02:07अभिज्यान शाकुंतलम में शाकुंतला का चरित्र तीनों भावों से समन्विच चित्रत किया गया है।
02:13कन्या आवस्था में शाकुंतला में बड़ा भाव ही अधिक हैं क्योंकि उसका लालन पालन व्रिशी आश्रम में होता है।
02:20वेद, शास्त्र, कला और संगीत में पारंगत शाकुंतला का प्रक्रती प्रेम अध्वितिय है।
02:27वह समस्त स्रिष्टी में एकत्व का दर्शन करती है और तद अनुरूप ही आचरन करती है।
02:33व्रिश्वनस्पति सभी के साथ उसका सहोधर सास्नेहन इसकी पुष्टी करता है।
02:38व्रिग चौना उसके पुत्र के समान अनन्य स्नेहन का पात्र है।
02:42अपरा भाव अर्थात शरीर जीवी होना इस्त्री का अपना स्वभाव है।
02:47उसके श्रिंगार इंगित आधी अपरा भाव को सुचित करते हैं जहां वह सद्ध्य प्रसूत फुष्पों को ना करना भरन ना
02:56बनाकर गिरे गोए फुष्पों से अलंकरन करती है।
03:00दुष्यंत के सामने आने पर इंगित आधी के मार्ध्यम से उसके प्रती अनुरक्त भाव को ग्यापित करती है।
03:30जहां दुष्यंत तपोवन में अपनी बाईं हुजाके इस पुरण से यह अनुमान लगा लेते हैं कि यहां मेरे वरन करने
03:38योग्य कोई कन्या है।
03:39तभी शकुंतला की सख्यों से ज्याद होता है कि यह रिश्य कन्या नहीं बल्कि छत्रिय कन्या है।
03:46और आप उसका वरन कर सकते हैं।
03:48गंधर्व, विभा और उसका गर्व धरन करना भी माया का ही कार्य है क्योंकि चक्रवर्ती सम्राठ भरत का जर्म होना
03:56था।
03:57दुश्यंत का शाप के वशी भूत विस्मरन और पुर्णा उसका पुनर्मिलन सभी घटनाय माया की पूर्वन योजित योजना थी।
04:05जिसकी क्रियानवती का हेतु इस्त्री रूप में शकुंतला बनी।
04:09दुश्यंत का वनगमन भी उसके परा अपरा दोनों भावों को एक साथ जीने का सूचक है।
04:15परा भाव में अपने प्रतिशोद की पूर्ती हो सके।
04:18पांडवों, कौर्मों के प्रति अपने व्यमनस्यों को हमेशा याद रखे ही उसका मनतव्य था।
04:25अथह उसने वनगमन का निष्टे किया।
04:28अपरा भाव में उसका पतियों के प्रतिकर्तव्य भाव भी था।
04:32जिसमें उनके साथ मोक्ष मारगी होना था।
04:35द्रॉपदी ने एक साथ दोनों भावों की परिमिती को साभा।
04:39एक स्त्री की रूप में जगत में सती कहलाई।
04:42इस्त्री अपने जीवन में आने वाही किसी भी परिस्टी में विचलित नहीं होती।
04:47तो उसकी अपनी आंतरिक चेतना, पोशन, स्रिजन, आदि शक्तियां ही सबकी परिस्टियों में जीवन को दिशा देती है।
04:54परिवार्व समाज इस्त्री की शक्तियों के अनुरूप उसको सम्मान देता है, तब रिष्टों में समर्पन, प्रितरगेता और संतुलन स्वतह स्ताफित
05:04हो जाता है।
05:05नमस्कार।

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