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  • 2 days ago
विवाह की गांठ : मुक्ति के लिए

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00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवादी आप सभी का अभिनंदन परती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राधिस्थान पत्रिगा के प्रधान संपादक,
00:12विद्या वाचसपती गुलाब कुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलेग, जिसका शिर्षक है विभा की गा�
00:20मुक्ती के लिए है, समय के साथ सभीता बदलती है, किन्तु संस्कृती नहीं बदलती, आजकल का विभा वर्षगाट कारिक्रम सभीता
00:29का ही उधारन है, संस्कृती का नहीं, सही अर्थों में तो सभीता से अधिक नकल का उधारन माना जाएगा, भारतिय
00:36संस्कृती में वि�
00:57
00:59दूसरा, आज का विक्सित और शिक्षित जीवन बुद्धी के नियंत्रण में संचालित होता है। जहां गर्मी है, एहंकार है, आक्रामकता
01:07है। जीवन का वंधन मन के धरातल पर मिठाज, संबान, संमेदना, प्रेम जैसे गुणों से चलता है। ये गुण बुद्धी
01:15में ह
01:16तब कहां धहर्य और कहां सहन शिलता। तू तेरा, मैं मेरा। बुद्धी सोच को व्यक्तिवादी बना देती है, तब ये
01:25प्यक्ति जीवन को अपने संधर्व में ही जीता है। दर्शक की तरह बात करता है, सही और गलत। बुद्धी भीतर
01:32नहीं जा पाती, मन की बात मन को
01:34चू लेती है, उसमें अपनापन महसूस नहीं होता है। व्यक्ति सुनना चाहता है, सुनाना भी चाहता है। बुद्धी जीवी के
01:44एहंकार को ठेस लगती रहती है। प्रतिक्रिया तुरंत कर डालता है, मिठास होती ही नहीं। संबाद आगे बढ़ता ही नहीं,
01:52आपका आ�
01:53कोई बन ही नहीं सकता, जिसमें आप अपना चहरा देख सको। बुद्धिमान व्यक्ति सदा शंकालू होता है, वह स्वयम को
02:01ही सही मानने के लिए तर्क करता है। प्रारद को तो मानता ही नहीं। प्रकृती ने हमें अपने कर्म फलों
02:08को भूगने के लिए ही पैदा किया है
02:10इस बात को अपने चिंतन के विपरीत कोई नहीं मानता। अनेक अचिंत्य परिस्थितियां लोग अवसर आते रहते हैं। तर्क उतर्क
02:19के मार्ध्यम से मानों मनों में भेद पैदा करते जाते हैं। इनको दूर न करना संबाद में बाधक बन जाता
02:27है। भेद बढ़ते भी
02:29जा सकते हैं। व्यक्ति वार्थ से उपर उठें बिना दूसरी और के कारण समझ नहीं पाते। व्यक्ति एक दूसरे के
02:36प्रती पूर्वाग्रही हो जाते हैं। शिक्षा ने इस एकल अवधारना को ही बढ़ावा दिया है। इसके चलते दो पीडियां साथ
02:44नहीं रह पाते
02:45परिवार साथ रहकर भी साथ नहीं रह पाते। मौन रूप से संकोज बना रहता है। भारतिय दर्शन आश्रम वेवस्था पर
02:53आश्रित हैं। इससे पुर्शार्थ रूप लक्षिय साधा जा पा है। मैं अपने जीवन का पानप्रस्थ पूरा कर चुका हूँ। सन्यास
03:01
03:01आश्रम में जी रहा हूँ। सभ्यता का तकाजा है विवा की पचासवी वर्शगास मनाने का। यह तो वहस्थ आश्रम का
03:09संकेश है। इसका अर्थ क्या है। जिस समाज में व्यक्ति मरते दम तक दामपत्य भाव में ही रहता है। वहां
03:16है ऐसी परंपरा रह सकती है। अर्
03:22अर्म नम्मोश अपना प्रोशाद आप रखो अपने पास। धर्म हीनता आत्मा को प्रतिष्ठित कैसे करे। हम तो शरीर नहीं आत्मा
03:30है। शिक्षा ने आत्मा को भुला दिया, जीवन से दूर कर दिया, फिर कुछ भी मनाव क्या पर्व पढ़ता है।
03:37मानव की भाती तो
03:52सोख्ष्व जीवन से अलग कर दिया, शिक्षित माता पिता की भुमी का महत्रपून हो गई, विशेश का पिता ने मशाल
03:59हाम जीए। अधिकाश तलाग इसी वातावरण में फली भूत हो रहे हैं। विशम परिस्थितियों में पिता अपने पुत्री को लोट
04:09आने की सलहा �
04:10अपने शिक्षा के बलपन जी लेगी। पती का घर ही पतनी का भी घर होता है, स्वामी पती और पतनी
04:17स्वामी नी। आज वही घर एक स्थूल इकाई और पराया घर कहलाने लग गया। जैसे कंपनी खोटे माल को वापिस
04:25मांग मंगा लेती है। विवहा में मंत्रों से क्या
04:28आदान कदान होता है, कोई नहीं जानता, इस्त्री संबन की सारे कानून, सारे अभियान उसे शरीर से जादा कुछ नहीं
04:35मानते। एक के साथ पट्री नहीं बैठी, दूसरे तिस्री के साथ बैठ जाएगी। भारती इस्त्री विवहा के बार पती में
04:43समा जाती है, दो बं�
04:55जात्मा के साथ शरीर के माध्यम से जीना है, पीहर का सास उसे स्वामी नहीं बनने देगा, नहीं वह पती
05:02के सपनों को एकाकार हो पाएगी। दोनों घरों के साथ निर्वहा कर सकते हो, बहचार नहीं बना सकती। पीहर में
05:11इस थूल शरीर गह सकता है, ससुराल के संबंद स
05:14foreign
05:48Namaskar
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