00:03नमस्कार, मैं श्वेता तिवारी आप सभी का अभिरंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक,
00:13विद्या वाचस्पति कुलाप कुठारी जी का परिवार में प्रकाशित आलिक, जिसका शेशक है इच्छा कर्म श्रिं�
00:24कामना पैदा नहीं की जा सकती, स्वत्ह फोर्ती रहती है, मन के वातावरन के अनुसार ही पैदा होती है, प्रारद
00:33भूगने के लिए भी प्राकरतिक रूप में उठती रहती है, व्यक्ति के आवेश आवेग आदी से भी दिशा बदलती है,
00:41किस योग से व्यक्ति की कामना �
00:43जुई है, वह भी महत्वकून है, गीता में प्रिश्न ने हर स्वभाव के व्यक्ति के लिए किसी ना किसी योग
00:50का उपदेश दिया है, सारे उपक्रम मिलकर जो स्पंदन हमारे श्वास प्रश्वास में कारे करते हैं, उनी से कामना का
00:58प्रारूप तयार होता है, माया के प्
01:13व्यक्ति अपनी कामनाओं को पूर्ण करता हुआ, शांती में इस्थापित हो सकेगा, यही जीवन का लक्षिय होता है, एक कामना
01:21होती है एहंकार वश, अपेक्षा की कारण एशनाओं से लधी हुई, इस कामना के लिए भी व्यक्ति को अपने प्रयास
01:29लक्षित करने पड�
01:34धारण अधिक होते हैं, कामना तो व्यक्ति बड़ी बड़ी कर सकता है, किन्तु उन्हें पूरी करने की अपनी क्षमता का
01:41भी आकलन नहीं करता, एशनाओं में तो प्रालप्थ भी कारे करता है, लोकेशना, पुत्रेशना, आदि भाग्य से ही पूरी होती
01:50है, इनका अभा�
01:54बंधन मुक्त होने की भी होती है, आत्मा अनिक प्रकार के आवरणों से ढगा रहता है, बंधा रहता है, इस
02:02कारण ही फल भूगने के लिए भिन्न भिन्न योनियों में जन्म लेता रहता है, कामना से शरीर का पोशन भी
02:11होता है, कामना का जो स्वरूप्त वासना या भावन
02:32ुष्वास प्रश्वास के स्पंदन भी पूरे शरीर में उसी प्रकार का बातावरन बनाएंगे
02:38अंतस रावी ग्रंतियों के रसायन भी वैसे ही होंगे उसी प्रकार के शरीर की धातों का निर्मान होगा
02:46कामना का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि आपके मन का पोशन किस प्रकार के अन से होता
02:53है
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