00:00जब भी तारीख की बात होती है, तो आम तोर पर जंगों और बादशाओं का ही जिकर मिलता है.
00:05लेकिन आज के इस जाइजे में, हम कदीम तारीख और फने तामीर को बिलकुल एक नए जाविये से देखेंगे, एक
00:11जदीद कैमरे के लेंज से.
00:14लहौर, जिसकी बुन्यादे सदियों पुरानी है, वो कोई आम शहर ये सिर्फ इंटों और पत्त्रों का मजमुआ नहीं है.
00:20ये तो एक ऐसी दास्तान है, जिसके हर बाब को इसके शानदार फने तामीर ने बहुत खुबसूरती से अपने अंदर
00:28महفوظ कर रखा है.
00:28अब जरा एक प्रोफेशनल वेडिंग फोटोगरफर, एमा की ये बहतरीन बात सुनिये.
00:34उनका पंदरा साला तजरूबा गहता है, कि जब कोई कैमरा लेकर इस शहर की गलियों या इमारतों के सामने खड़ा
00:40होता है न, तो लाहौर सिर्फ एक बैगराउंड नहीं रहता, बिल्कुल नहीं.
00:44ये एक खामोश साथी बन जाता है.
00:45अपनी रोशनी, साए और सदियों पुरानी कशिश के साथ ये शहर खींची जाने वाली हर तस्वीर की कहानी खुद तेह
00:53करता है.
00:53यानि ये सिर्फ फोटोग्रफी नहीं, बलके कहानी सुनाने का एक मुकमल और गहरा तजरुबा है.
00:58तो चलिए इस शानदार सफर पर निकलते हैं. इस लंबी टाइम लाइन पर एक नजर डालिए. हम देखेंगे कि कैसे
01:05अलग-अलग आती जाती सल्तनतों ने इस शहर के तरज तामीर की कहानी को बार-बार नए सिरे से लिखा
01:11है.
01:12कदीम दास्तानों से शुरू होकर बरतानवी राच के आखिर तक वाकी हर दोड़ ने अपने गहरे और मुनफरिद नुकोश यहां
01:19छोड़े हैं. शरुआत करते हैं बिलकुल पहले बाब से, यानी कदीम दास्ताने और इस शहर की इप्तिदा.
01:26दियो मालाई तारीख को अगर हम देखें, तो कदीम हिंदू पुरानों में इस खित्ते का जिकर लोखपुर या लावापुरी के
01:34नाम से मिलता है, जिसका मतलब क्या है? लावा का शहर.
01:37रिवायतें बताती हैं कि हिंदू देफतार राम के बेटे शहजादा लावा या लूह ने इस बस्ति को अबाद किया था.
01:44और सबसे हिरान कुन बात बताओ, आज भी लावार के शाही किले के अंदर शहजादा लावा से मनसूब एक बिलकुल
01:51खाली मंदिर मौजूद है? ये उन कदीम दास्तानों का एक जिन्दा और ठोस सबूत है.
01:56अच्छा, अगरचे इस दोर के तहरीरी हकाइक बहुत कम मिलते हैं, लेकिन साथवी सदी में आने वाले मशूर चीनी सया
02:04ह्यून सौंग की किताबों में एक जबरदस्त इनकिशाफ मिलता है.
02:07इन मशूर सल्तनतों और हमला आवरों के आने से सदियों पहले ही, 630 इस वी में ह्यून सौंग ने यहां
02:14एक अजीम, खुशहाल और वसी ब्रह्मन शहर का तफसीली जिकर किया था.
02:18इसका मतलब है कि लहूर अपनी शुरुआत से ही एक बेहद एहम तिजारती और सकाफ्ती मरकज था.
02:25अब आते हैं अपने दूसरी बाप की तरफ.
02:27मुगलिया दौर का सुनेहरी जमाना.
02:29अब यहां शीश महल जैसी इमारतों का कुदरती रोशनी के साथ खेल देखने वाला होता है.
02:35इन 81 शीशों और टाइलों का ये शाहकार सुभा की पहली रोशनी में जो लंबे और शानदार साय पैदा करता
02:42है वो वाकई बेमिसाल हैं.
02:43किसी भी फोटोग्राफर के लिए ये चमकते शीशे और साय एक मास्टर पीस बनाने के लिए काफी हैं और इसके
02:50साथ साथ औरंगजेब आलमगीर का बनवाया हुआ अजीमो शान आलमगीरी दर्वाजा और इसके मुतवाजी सहन वाकई हैरत अंगीज मनाजर पेश
02:57करते हैं
02:58शाही कले के बिलकुल सामने ही शाही मस्जित मौजूद है जिसे शहनशा औरंगजेब ने 1673 में तामीर करवाया था अगर
03:06इसे किसी वसी जाविये या वाइड अंगल लेंज से देखा जाए न तो इसकी सुर्ख रितीले पत्थर की दिवहैकल दिवारें
03:13उचे गुमबद �
03:14और मार्बल के नक्षोनेगार कमाल खुबसूरती से कैथ होते हैं और जब शाम ढल रही होती है तो ये सुर्ख
03:19पत्थर एक अजीब से पुरसरार और दिलकश चमक बेखेड़ता है एकदम जादू जैसा फने तामीर की इसी शांदार लड़ी में
03:26शेहनशा शाजहा ने 1641 मे
03:29शालमार बाग तामीर करवाया इसे जमीन पर जन्नत के मुगल तसवर के तोर पर तराशा गया था इस बाग की
03:36बिलकुल परफेक्ट जियॉमेटरी, सीड़ी नुमा सबजाजार और बहते फवारे ये सब एरियल फोटोगरफी या ड्रोन कैमरे के लिए एक मुकंबल
03:45शहकार
03:45हैं आज भी उपर से देखने पर ये बाग वैसा ही पुरसरार और हैरत अंगेज लगता है जैसा कि 400
03:52साल पहले लगता था अब वक्त थोड़ा आगे बढ़ता है और हम आते हैं तीसरे बाब पर सिख दौर और
03:58उनकी यादगारें
03:59ये पॉइंट इस बात को बहुत वाज़ करता है कि तारीख की मारूजी हकीकत कितनी हैरान कुन होती है
04:06सोचिए अलग अलग हुक्मरान सल्तनतों ने बिलकुल उन्ही यादगारों और जगहों को बिलकुल मुक्तलिफ मकासिद के लिए इस्तिमाल किया
04:13जो बादशाही मस्जद मुगलों के दौर में रुहानी अकीदत और अबादत का एक अजीम मरकस थी
04:19वही मस्जद सिख हुकमरानी के दौर में घोडों के अस्तबल और फोजी असलाख खाने के तौर पर इस्तिमाल हुई
04:25ये तारीख का वो रुख है जो वक्त के बदलते मिजाज को जाहिर करता है
04:29अच्छा अब एक बहुत ही दिल्चस्प तारीखी कहानी सुनिये
04:33किला लहौर और बादशाही मस्जद के दर्मियान जो हजूरी बाग है न उसकी तामीर के पीछे एक जबरदस्ट वाक्या है
04:41जब कंधार का हुकमरान शाह शुजा तख्ट से माजूल होकर भागा तो महराजा रंजीत सिंग ने उसे लहौर में पना
04:48दी
04:49जब रंजीत सिंग को बता चला कि शाह शुजा के पास दुनिया का मशूर तरीन कोह नूर हीरा है तो
04:56उसने वो हीरा हासल कर लिया
04:57और बस इसी हीरे के मिलने की खुशी मनाने के लिए 1813 में ये शानदार सुफैद बारादरी बनवाई गई
05:05सिख दौर के फन तामीर की एक और बहतरीन बसरी मिसाल महाराजा रंजीत सिंग की समाधी या मकबरा है
05:13इस मकबरे का डिजाइन वाकई कमाल है क्यूंकि ये हिंदू, इसलामी और सिख तीनों अकाइद के तामीराती अनासर को बहुत
05:22महारत से एक साथ जोड़ता है
05:24इसके उपर नजब कमल के फूल की शकल का सुनहरा गुंबद और पेचीदा नक्षो निगार ये सकाफती हम आहंगी का
05:32एक ऐसा नमूना है जो देखने वाले को पोरी करम मैसूर कर देता है
05:36चलिए अब चलते हैं चोथे बाप की तरफ बरतानवी नुआबादियाती दौर और उनका फने तामीर
05:42बरतानवी दौर में बनने वाली शानदार इमारतों में एक बिलकुल खास किसम का तरजे तामीर देखा गया जिसे इंडो सेरासिनिक
05:50स्टाइल कहा जाता है
05:51असल में ये यूरपी गौथिक और विक्टोरियन साख्त का मकामी इसलामी और मुगल रिवायात के साथ एक बहुत ही खुबसूरत
05:59मिलाब था
06:00माल रोट पर बनी जेनरल पोस्ट आफिस यानी जी पियो लहॉर म्यूजियम और गवर्मिन्ट कॉलिज यूनिवरसिटी जैसी इमारते आज भी
06:08इस बात की गवा हैं
06:09जहां मगर्बी सुतूनों के बिलकुल साथ ही मश्रिकी महराबे खड़ी नजर आती है
06:14इस जदीद और नौबादियाती शहर का खाका तियार करने में एक मैमार का किरदार बहुत बहुत बहुत नमाया रहा
06:20और वो थे सर गंगाराम
06:22लाहॉर को उसकी जदीद पहचान देने में उनका बुन्यादी किरदार था
06:27चाहे लाहूर म्यूजियमों या जीपियों इन अजीम अमारतों के पीछे सरगंगाराम की ही महारत थी जिनोंने जदीदियत और रवायत को
06:35आपस में खुबसूरती से जोड़ दिया
06:37और अब आखिर में अपना पांचवा बाब लाहूर के जदीद सकाफ़ती धड़कन
06:44अब जब हम अपने नजरें उन पुर्वकार तारीखी अमारतों से हटा कर आज के लाहूर पर डालते हैं तो एक
06:50सबर दस तजाद नजर आता है
06:52जरा तसवर करें बादशाही मस्जिद के बिलकुल पीछे का वो इलाका जो सदियों तक सिर्फ खामोश और कदीम पत्थरों पर
06:59मुझतमिल था
06:59वहाँ आज फोर्ट रोड फूड स्ट्रीट आबाद है
07:02जनवरी 2012 में बनने के बाद से यहां हर वक्त चमकती नियोन लाइट्स, हुजूम का शोर और लजीज खानों का
07:09खुशपुदार धुआ महकता रहता है
07:11एक तरफ सदियों की खामोशी है और ठीक दूसरी तरफ जिन्दगी से भरपूर जदीद रौनक
07:16क्या बात है
07:17लेकिन इस तमाम जदीद तेज रफतार तरक्की के बावजूद माजी के कुछ ठोस असार आज भी इस शहर की असल
07:26शनाख्त को मजबूती से थामे हुए हैं
07:28जैसे के अंदरूने शहर के महफूज दर्वाजे भाटी, दहली, लोहारी और शेरामाला दर्वाजे आज भी इस बात के गवाँ हैं
07:36कि कभी ये पूरा शहर एक मजबूत फसील के अंदर महफूज होता था
07:41इन मेंसे अगर एक खास दर्वाजे यानि रोशनाई दर्वाजे की बात करें तो इसे रोशनियों का दर्वाजा कहा जाता था
07:47तारीख बताती है कि शाम के वक्त यहां कसरत से रोशनिया की जाती थी ताकि शाही सवारियां और दर्वारी आसानी
07:54से गुजर सकें
07:55सोचा जाए तो अंधेरे में रोश्णी को कैद करने के फन यानी फोटोग्रफी के लिए रोश्णियों के इस दर्वाजे से
08:02बहतर और शायराना स्तियारा भुला और क्या हो सकता है।
08:25तो वो कौन सा दौर होगा? कदीम देवमालाई खामोशी, मुगलों की शान और शौकत या फिर आज के लाहौर की
08:32जगमगाती धड़कन ये एक ऐसा सवाल है जो वाकि हम सब को सोचने पर मजबूर कर देता है।
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