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Explore the beauty of Lahore, the cultural heart of Pakistan. From the famous food streets and delicious traditional dishes to the historical places and vibrant city life, Lahore is full of beauty, history, and culture. Discover the charm of old Lahore, historical landmarks, colorful bazaars, and the rich taste of Lahori food in this amazing journey through one of Pakistan’s most beautiful cities.
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00:00जब भी तारीख की बात होती है, तो आम तोर पर जंगों और बादशाओं का ही जिकर मिलता है.
00:05लेकिन आज के इस जाइजे में, हम कदीम तारीख और फने तामीर को बिलकुल एक नए जाविये से देखेंगे, एक
00:11जदीद कैमरे के लेंज से.
00:14लहौर, जिसकी बुन्यादे सदियों पुरानी है, वो कोई आम शहर ये सिर्फ इंटों और पत्त्रों का मजमुआ नहीं है.
00:20ये तो एक ऐसी दास्तान है, जिसके हर बाब को इसके शानदार फने तामीर ने बहुत खुबसूरती से अपने अंदर
00:28महفوظ कर रखा है.
00:28अब जरा एक प्रोफेशनल वेडिंग फोटोगरफर, एमा की ये बहतरीन बात सुनिये.
00:34उनका पंदरा साला तजरूबा गहता है, कि जब कोई कैमरा लेकर इस शहर की गलियों या इमारतों के सामने खड़ा
00:40होता है न, तो लाहौर सिर्फ एक बैगराउंड नहीं रहता, बिल्कुल नहीं.
00:44ये एक खामोश साथी बन जाता है.
00:45अपनी रोशनी, साए और सदियों पुरानी कशिश के साथ ये शहर खींची जाने वाली हर तस्वीर की कहानी खुद तेह
00:53करता है.
00:53यानि ये सिर्फ फोटोग्रफी नहीं, बलके कहानी सुनाने का एक मुकमल और गहरा तजरुबा है.
00:58तो चलिए इस शानदार सफर पर निकलते हैं. इस लंबी टाइम लाइन पर एक नजर डालिए. हम देखेंगे कि कैसे
01:05अलग-अलग आती जाती सल्तनतों ने इस शहर के तरज तामीर की कहानी को बार-बार नए सिरे से लिखा
01:11है.
01:12कदीम दास्तानों से शुरू होकर बरतानवी राच के आखिर तक वाकी हर दोड़ ने अपने गहरे और मुनफरिद नुकोश यहां
01:19छोड़े हैं. शरुआत करते हैं बिलकुल पहले बाब से, यानी कदीम दास्ताने और इस शहर की इप्तिदा.
01:26दियो मालाई तारीख को अगर हम देखें, तो कदीम हिंदू पुरानों में इस खित्ते का जिकर लोखपुर या लावापुरी के
01:34नाम से मिलता है, जिसका मतलब क्या है? लावा का शहर.
01:37रिवायतें बताती हैं कि हिंदू देफतार राम के बेटे शहजादा लावा या लूह ने इस बस्ति को अबाद किया था.
01:44और सबसे हिरान कुन बात बताओ, आज भी लावार के शाही किले के अंदर शहजादा लावा से मनसूब एक बिलकुल
01:51खाली मंदिर मौजूद है? ये उन कदीम दास्तानों का एक जिन्दा और ठोस सबूत है.
01:56अच्छा, अगरचे इस दोर के तहरीरी हकाइक बहुत कम मिलते हैं, लेकिन साथवी सदी में आने वाले मशूर चीनी सया
02:04ह्यून सौंग की किताबों में एक जबरदस्त इनकिशाफ मिलता है.
02:07इन मशूर सल्तनतों और हमला आवरों के आने से सदियों पहले ही, 630 इस वी में ह्यून सौंग ने यहां
02:14एक अजीम, खुशहाल और वसी ब्रह्मन शहर का तफसीली जिकर किया था.
02:18इसका मतलब है कि लहूर अपनी शुरुआत से ही एक बेहद एहम तिजारती और सकाफ्ती मरकज था.
02:25अब आते हैं अपने दूसरी बाप की तरफ.
02:27मुगलिया दौर का सुनेहरी जमाना.
02:29अब यहां शीश महल जैसी इमारतों का कुदरती रोशनी के साथ खेल देखने वाला होता है.
02:35इन 81 शीशों और टाइलों का ये शाहकार सुभा की पहली रोशनी में जो लंबे और शानदार साय पैदा करता
02:42है वो वाकई बेमिसाल हैं.
02:43किसी भी फोटोग्राफर के लिए ये चमकते शीशे और साय एक मास्टर पीस बनाने के लिए काफी हैं और इसके
02:50साथ साथ औरंगजेब आलमगीर का बनवाया हुआ अजीमो शान आलमगीरी दर्वाजा और इसके मुतवाजी सहन वाकई हैरत अंगीज मनाजर पेश
02:57करते हैं
02:58शाही कले के बिलकुल सामने ही शाही मस्जित मौजूद है जिसे शहनशा औरंगजेब ने 1673 में तामीर करवाया था अगर
03:06इसे किसी वसी जाविये या वाइड अंगल लेंज से देखा जाए न तो इसकी सुर्ख रितीले पत्थर की दिवहैकल दिवारें
03:13उचे गुमबद �
03:14और मार्बल के नक्षोनेगार कमाल खुबसूरती से कैथ होते हैं और जब शाम ढल रही होती है तो ये सुर्ख
03:19पत्थर एक अजीब से पुरसरार और दिलकश चमक बेखेड़ता है एकदम जादू जैसा फने तामीर की इसी शांदार लड़ी में
03:26शेहनशा शाजहा ने 1641 मे
03:29शालमार बाग तामीर करवाया इसे जमीन पर जन्नत के मुगल तसवर के तोर पर तराशा गया था इस बाग की
03:36बिलकुल परफेक्ट जियॉमेटरी, सीड़ी नुमा सबजाजार और बहते फवारे ये सब एरियल फोटोगरफी या ड्रोन कैमरे के लिए एक मुकंबल
03:45शहकार
03:45हैं आज भी उपर से देखने पर ये बाग वैसा ही पुरसरार और हैरत अंगेज लगता है जैसा कि 400
03:52साल पहले लगता था अब वक्त थोड़ा आगे बढ़ता है और हम आते हैं तीसरे बाब पर सिख दौर और
03:58उनकी यादगारें
03:59ये पॉइंट इस बात को बहुत वाज़ करता है कि तारीख की मारूजी हकीकत कितनी हैरान कुन होती है
04:06सोचिए अलग अलग हुक्मरान सल्तनतों ने बिलकुल उन्ही यादगारों और जगहों को बिलकुल मुक्तलिफ मकासिद के लिए इस्तिमाल किया
04:13जो बादशाही मस्जद मुगलों के दौर में रुहानी अकीदत और अबादत का एक अजीम मरकस थी
04:19वही मस्जद सिख हुकमरानी के दौर में घोडों के अस्तबल और फोजी असलाख खाने के तौर पर इस्तिमाल हुई
04:25ये तारीख का वो रुख है जो वक्त के बदलते मिजाज को जाहिर करता है
04:29अच्छा अब एक बहुत ही दिल्चस्प तारीखी कहानी सुनिये
04:33किला लहौर और बादशाही मस्जद के दर्मियान जो हजूरी बाग है न उसकी तामीर के पीछे एक जबरदस्ट वाक्या है
04:41जब कंधार का हुकमरान शाह शुजा तख्ट से माजूल होकर भागा तो महराजा रंजीत सिंग ने उसे लहौर में पना
04:48दी
04:49जब रंजीत सिंग को बता चला कि शाह शुजा के पास दुनिया का मशूर तरीन कोह नूर हीरा है तो
04:56उसने वो हीरा हासल कर लिया
04:57और बस इसी हीरे के मिलने की खुशी मनाने के लिए 1813 में ये शानदार सुफैद बारादरी बनवाई गई
05:05सिख दौर के फन तामीर की एक और बहतरीन बसरी मिसाल महाराजा रंजीत सिंग की समाधी या मकबरा है
05:13इस मकबरे का डिजाइन वाकई कमाल है क्यूंकि ये हिंदू, इसलामी और सिख तीनों अकाइद के तामीराती अनासर को बहुत
05:22महारत से एक साथ जोड़ता है
05:24इसके उपर नजब कमल के फूल की शकल का सुनहरा गुंबद और पेचीदा नक्षो निगार ये सकाफती हम आहंगी का
05:32एक ऐसा नमूना है जो देखने वाले को पोरी करम मैसूर कर देता है
05:36चलिए अब चलते हैं चोथे बाप की तरफ बरतानवी नुआबादियाती दौर और उनका फने तामीर
05:42बरतानवी दौर में बनने वाली शानदार इमारतों में एक बिलकुल खास किसम का तरजे तामीर देखा गया जिसे इंडो सेरासिनिक
05:50स्टाइल कहा जाता है
05:51असल में ये यूरपी गौथिक और विक्टोरियन साख्त का मकामी इसलामी और मुगल रिवायात के साथ एक बहुत ही खुबसूरत
05:59मिलाब था
06:00माल रोट पर बनी जेनरल पोस्ट आफिस यानी जी पियो लहॉर म्यूजियम और गवर्मिन्ट कॉलिज यूनिवरसिटी जैसी इमारते आज भी
06:08इस बात की गवा हैं
06:09जहां मगर्बी सुतूनों के बिलकुल साथ ही मश्रिकी महराबे खड़ी नजर आती है
06:14इस जदीद और नौबादियाती शहर का खाका तियार करने में एक मैमार का किरदार बहुत बहुत बहुत नमाया रहा
06:20और वो थे सर गंगाराम
06:22लाहॉर को उसकी जदीद पहचान देने में उनका बुन्यादी किरदार था
06:27चाहे लाहूर म्यूजियमों या जीपियों इन अजीम अमारतों के पीछे सरगंगाराम की ही महारत थी जिनोंने जदीदियत और रवायत को
06:35आपस में खुबसूरती से जोड़ दिया
06:37और अब आखिर में अपना पांचवा बाब लाहूर के जदीद सकाफ़ती धड़कन
06:44अब जब हम अपने नजरें उन पुर्वकार तारीखी अमारतों से हटा कर आज के लाहूर पर डालते हैं तो एक
06:50सबर दस तजाद नजर आता है
06:52जरा तसवर करें बादशाही मस्जिद के बिलकुल पीछे का वो इलाका जो सदियों तक सिर्फ खामोश और कदीम पत्थरों पर
06:59मुझतमिल था
06:59वहाँ आज फोर्ट रोड फूड स्ट्रीट आबाद है
07:02जनवरी 2012 में बनने के बाद से यहां हर वक्त चमकती नियोन लाइट्स, हुजूम का शोर और लजीज खानों का
07:09खुशपुदार धुआ महकता रहता है
07:11एक तरफ सदियों की खामोशी है और ठीक दूसरी तरफ जिन्दगी से भरपूर जदीद रौनक
07:16क्या बात है
07:17लेकिन इस तमाम जदीद तेज रफतार तरक्की के बावजूद माजी के कुछ ठोस असार आज भी इस शहर की असल
07:26शनाख्त को मजबूती से थामे हुए हैं
07:28जैसे के अंदरूने शहर के महफूज दर्वाजे भाटी, दहली, लोहारी और शेरामाला दर्वाजे आज भी इस बात के गवाँ हैं
07:36कि कभी ये पूरा शहर एक मजबूत फसील के अंदर महफूज होता था
07:41इन मेंसे अगर एक खास दर्वाजे यानि रोशनाई दर्वाजे की बात करें तो इसे रोशनियों का दर्वाजा कहा जाता था
07:47तारीख बताती है कि शाम के वक्त यहां कसरत से रोशनिया की जाती थी ताकि शाही सवारियां और दर्वारी आसानी
07:54से गुजर सकें
07:55सोचा जाए तो अंधेरे में रोश्णी को कैद करने के फन यानी फोटोग्रफी के लिए रोश्णियों के इस दर्वाजे से
08:02बहतर और शायराना स्तियारा भुला और क्या हो सकता है।
08:25तो वो कौन सा दौर होगा? कदीम देवमालाई खामोशी, मुगलों की शान और शौकत या फिर आज के लाहौर की
08:32जगमगाती धड़कन ये एक ऐसा सवाल है जो वाकि हम सब को सोचने पर मजबूर कर देता है।
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