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  • 21 hours ago
A grand literary event was organized to celebrate the successful completion of one year of the “Battle for Truth.” Renowned writers, poets, intellectuals, and literature lovers gathered to share their thoughts on truth, justice, awareness, and the power of words in society. The event featured inspiring speeches, poetry recitations, storytelling sessions, and discussions highlighting the importance of truth in modern times.

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Transcript
00:00Hmm, consider that one of a very quiet,
00:03very quiet and very quiet and very quiet.
00:07One of those where four books are done,
00:10a poor language has been put in a very quiet and a very quiet area,
00:15a very quiet and quiet,
00:17and that one of those words is a very quiet place with a quiet,
00:20and then there is no quiet and quiet and quiet.
00:22And then there is a very quiet and quiet,
00:29Yes, it is.
00:56If two dunes are in the middle of this state, that one without the other, is completely impossible, then it
01:04would be a bit strange.
01:06Yes, this is really strange.
01:09Today's specificity of the jails, we have to do this strange, strange, kind of thing.
01:14We will see that the last thousand years of the jails, the last thousand years of the jails, the jails,
01:22the jails and the jails, the jails, the jails, the jails and the jails.
01:29I don't know.
01:55और ये मुजाकरा बुनियाने मरसूस और मारका हग की कामियाभी की पहली सालगिरा के मौके पर मुनाकित किया गया।
02:02अच्छा यहां थोड़ा सा रुक कर इन इस्तिलाहात को समझना बहुत जरूरी है ताके हमारे सुनने वालों के लिए गुफ्टगू
02:08का पसे मनजर वाज़ हो सके।
02:10विलकुल मैं बताता हूँ देखें बनियाने मरसूस जो है वो अरबी जुबान का लवज है इसका मतलब है सीसा पिलाई
02:18हुई दीवार।
02:18सही।
02:19असकरी और कौमी सता पर ये इस्तिलाह देशतगर्दी और दुश्मन अनासर के खिलाफ उस गेर मुतजल्जल और मजबूत इतिहात को
02:27जाहर करती है जो एक कौम और उसकी अफवाज के दर्मयान होता है।
02:31और इसी तरह मारके हक से मुराद बातल के खिलाफ सचाई की वो जंग है जो हर मैदान पर लड़ी
02:38जाती है।
03:01और इस जीत को याद रखने में अदब का क्या किरदार होता है।
03:05बिल्कुल और यहीं से इस तक्रीब का वो पहलू सामने आता है जो मुझे सबसे जादा मतलब चौका देने वाला
03:12लगा।
03:12वो क्या।
03:13ये तक्रीब कहा मुनाकद हुई।
03:15कौमी विर्सा और सिकाफ़त डिविजन के जैली इदारे अर्दू लुगत बोर्ड कराची में।
03:20अहाँ, बिल्कुल लुगत बोर्ड में।
03:23यानि ये वो जगा है जो बजाहर अलफाज का घर है, डिक्शनरियों का मरकज है और इसका इनिकाद अर्दू सिंधी
03:32अदबी संगत जिसे असास कहा जाता है, उनके तावन से हुआ।
03:36सही।
03:37तकरीब का बाकाइदा अगाज तिलावत कलाम पाक से हुआ जो प्रोफेसर सहीत कादरी ने की और असास की चेर परसन
03:45गुलनाज महमूद ने खेरमकदमी कलिमात अदा किये।
03:49लेकिन ये जो जगा का इंतिखाब है, ये मुझे एक अजीब सी तश्बीह की तरफ ले जाता है।
03:56कैसी तश्बीह?
03:56मतलब ये ऐसा ही है जैसे किसी इंतिहाई हसास जरासीम से पाक साइंसी लेबाटरी के अंदर इंसानी जजबात, जंगी वलवलों
04:06और बारूत की बू का मुताला किया जा रहा हो।
04:09वा, क्या बात है, ये लेबाटरी वाली तश्बीह तो सूरत इहाल को समझने के लिए बहतरीन है।
04:15तो सवाल ये पैदा होता है कि इल्म औ अदब के उन खामोश मराकिज में जहां आम तोर पर लिसानियात
04:22पर बहस होती है, वहां अचानक ऐसे वलवला अंगेज और दिफाई मौजवात पर बहस की जरूरत क्यों पेशा गई।
04:29ये एक बहुत एहम सवाल है।
04:31मतलब क्या फौज का काम सिर्फ सरहदों पर नहीं होता।
04:35कि जब हम ये सवाल उठाते हैं कि लोगत बोर्ड जैसे इल्मी मराकिज में दिफागी बात क्यों हो रही है,
04:41तो इसका जवाब हमें बियानिये की साइंस में मिलता है।
04:44अच्छा।
04:44हाँ, क्योंके जगे अब सिर्फ गोला वारूत से नहीं लड़ी जाती, जदीद दोर की फिफ्ट जिनरेशन वारफेर में जो सबसे
04:51बड़ा महाज है ना, वो इनसानी जहन है।
04:54बिलकुल, माइंड सेट।
04:55जी, और इनसानी जहनों को कंट्रोल करने वाला जो हत्यार है, वो बियानिया या नेरिटिफ कहलाता है।
05:01अब इस मुझाकरे को देखें जिसकी निजामत डॉक्टर इर्फान शाने की थी।
05:05अगर हम वहां मौझूद सामेइन पर गोर करें, तो वहां जामियात के MFIL और PhD के तलबा, तद्रीस और मीडिया
05:12से वाबस्ता अफराद मौझूद थे।
05:14यानि वो लोग जो मौशरे में राय बनाते हैं।
05:17बिल्कुल, ये वो लोग हैं जो माशरे में सोच पैदा करते हैं।
05:20ये एक बहुत वाज़े इशारा है कि रियासत और दानिशवर तबका उस बात को समझ चुका है कि
05:25कौमी बियानिये सड़कों पर खड़े होकर या सिर्फ प्रेस रिलीस जारी करके नहीं बनते हैं।
05:47इसी फिक्री बियानिये के हवाले से इस तक्रीब के सदार्ती खुटबे में एक ऐसी बात कही गई जिसने मुझे थोड़ा
05:54सा उलज़ा दिया है।
05:55अच्छा, वो क्या बात थी।
05:57देखें, वफाकी जामिया अर्दू के साबिक शेखल जामा, डॉक्टर जफर अक्बाल ने इस निशस्त की सदारत की।
06:03उन्होंने जहां मौजू के इन्तखाब को सराहा, वहीं उनका एक जुम्ला बहुत तवज्यो तलब था।
06:08जी।
06:08उन्होंने कहा के मुसल्ला अफवाज के साथ हम हामेगी बहैसियत कौम हमारा मुस्तकिल वतीरा होना चाहिए।
06:17मुस्तकिल वतीरा
06:19अब मैं यहां थोड़ा सा मतलब इखतलाफ करना चाहूंगी या कमस कम इसकी गहराई में जाना चाहूंगी।
06:27Yes, absolutely.
06:32Yes, absolutely.
06:58Yes, sir.
07:37अच्छा, अमन के दौर की भूल चूख?
07:40जी, अब होता ये है कि जंग के वक्त बका की जिबलत पूरी कौम को इकठा कर देती है
07:45लेकिन जैसे ही अमन काइम होता है न, तो रोज मर्रा की रूटीन, मौशी मसाइल और सियासी एक्तिलाफात कौम को
07:51दुबारा टुकडों में बांट देते हैं
07:53बिल्कुल, लोग अपनी अपनी जिन्दिगियों में मगन हो जाते है
07:56और फिर अवाम ये भूलने लगते हैं कि जो अमन उन्हें आज मैसर है, इसकी सरहदों पर क्या कीमत अदा
08:02की गई है
08:02वो जो फिक्री हमाहंगी है, वो खतम होने लगती है
08:05और इदारों के दर्मयान फासले पैदा हो जाते है
08:08बिल्कुल, तो इस तनाजर में मुस्तकिल वतीरा होने का मतलब ये है
08:12कि बहुरानों के लावा भी अमन के वक्त में इदारों और अवाम के दर्मयान जहनी और फिक्री हमाहंगी होनी चाहिए
08:19पकि कोई बेरुनी बियानिया उस खला का फाइदा ना उठा सके
08:22तो मतलब ये वो खला है जिसे अदब पुर कर सकता है
08:26जी और ये ही वो मकाम है जहां अदब दाखिल होता है
08:28अदब वो वहिद जरिया है जो जंग खत्म होने के बाद भी उसकी याद और जजबों को मौशरे के इश्तिमाई
08:35शूर का हिस्सा बनाए रखता है
08:36अच्छा तो मतलब ये के अदब वो गोंद है जो अमन के दिनों में कौम को उस वक्त भी जोड़े
08:43रखता है जब कोई बैरूनी खत्रा बजाहिर नजर नहीं आ रहा होता
08:47सौ फीसद
08:48और जब हम इस गोंद या इस पुल की बात करते हैं तो रपोर्ट में एक और गुफ्तगू का हवाला
08:54आता है जो मुझे लगता है इस बहस का ओरूज है
08:57हाँ वो डॉक्टर शादाब एहसानी वाली बात
08:59दिलकुल तकरीब के महमाने खसूसी जामिया कराची के शोबा उर्दू के साबिक चेर्मेन डॉक्टर शादाब एहसानी ने एक बहुती गहरा
09:08तारीही नुक्ता उठाया
09:09जी उन्होंने बहुत कमाल बात की
09:11उन्होंने जंग और अदब की बात करते हुए किसी मौझूदा दौर के लिखारी का नहीं बलकि तारीह के दो बहुती
09:18गदावर नामों का हवाला दिया
09:20गदीम युनान का शायर हूमर और फारिस का अजीम शायर फिर्दोसी
09:24उनका कहना था कि रजमिया अदब होसले बुलंद करता है और यग जहती को फरोग देता है
09:31बिल्कुल रजमिया अदब यानि एपिक लिटरिचर
09:33जी और अगर हम उनकी इस बात को आज के तनाजुर में देखें
09:37तो मुझे ये रजमिया अदब या ये दास्ताने किसी कौम की जजबाती जिरा बक्तर की तरह लगती है
09:43जजबाती जिरे बुखतर वा बहुत उंदा तश्बी है
09:47हाँ मतलब जैसे मैदान जंग में एक फौजी अपने सीने पर बुलिट प्रूफ जैकेट या जरा बुखतर पहनता है ताके
09:54गोलियों से बच सके
09:55वैसे ही ये दास्ताने कौम के जहन और होसले की हिफाज़त करती है
10:00बिल्कुल ऐसा ही है
10:01लेकिन मुझे ये समझाएं के आखिर होमर और फर्दोसी ही क्यों
10:07उनके काम में ऐसा क्या था जिसका हवाला आज इतनी सद्यों बात दिया जा रहा है
10:12इस जजबाती जिरा बुखतर के स्तारे को अगर हम होमर और फर्दोसी की तारीख पर लागू करें
10:17तो डॉक्टर शादाब इसानी की इस इंतिखाब की असल ताकत समझ में आती है
10:21अच्छा
10:22ये महज पुरानी किताबों का जिक्र नहीं है
10:24ये दरसल कौमों की बका की साइंस है
10:27पहले हम होमर को देखते हैं
10:29हमर ने आज से लगबग तीन हजार साल पहले इलियाड लिखी
10:33जी इलियाड
10:34उस वक्त युनान कोई एक मुतहिद मुल्क नहीं था
10:37बलकि छोटे-छोटे शहरों में बटा हुआ था
10:39हमर ने ट्रॉय की जंग की दास्तान को इस तरह लिखा
10:42कि उसने तमाम बिखरे हुए मुराल को इकठा कर दिया
10:45यानि उसने उनको एक शनाख्त दे दी
10:48बिलकुल जब वो ये दास्ताने सुनते थे
10:50तो वो खुद को एक अजीम युनानी तहजीब का हिस्सा मानते थे
10:54और फिर्दॉसी का मामला तो इससे भी ज्यादा हैरान कुन है
10:57वो कैसे?
10:58फिर्दॉसी ने जब शाहनामा लिखना शुरू किया
11:01तो उस वक्त एरान पर अर्बों की हकुमत थी
11:04और फार्सी जुबान तेजी से खतम हो रही थी
11:07फिर्दॉसी ने तीस साल लगा कर ये रजमिया दास्तान लिखी
11:11तीस साल? वा?
11:12जी, उसने इरान के पुराने बाच्चाहों और सूर्माओं की कहानिया लिखी
11:17इस शाहनामे ने मरती हुई फार्सी जुबान को दुबारा जिन्दा कर दिया
11:22और इरानियों की पहचान को सदियों तक के लिए महफूस कर दिया
11:26ये तो वाकई कमाल है
11:27डॉक्टर शादा बैसानी दरसल यही बताना चाहरे हैं
11:30कि अजीम कौमें अपनी जंगें सिर्फ जोग्राफियाई मैदानों में नहीं जीती
11:34वो जंगें सफात पर भी जीती जाती हैं
11:36बिलकुल यानि अगर होमर और फिर्दोसी ना होते
11:40तो शायद आज युनान और इरान की तारीख कुछ और होती
11:43यकीनन कुछ और होती
11:45ये बात तारीख के लिहाज से तो बहुत मज़ूर कुन है
11:48लेकिन यहां हम अगर होमर और फिर्दोसी की
11:52इन तारीखी मिसालों से निकल कर थोड़ा आगे आएं
11:55तो मुझे ये देखना है कि इस मुझाखरे में
11:58मौझूद मौझूदा दौर के दानिश्वर इस हवाले से क्या कर रहे हैं
12:02हाँ ये देखना बहुत एहम है
12:04तक्रीब में ख्यालात का इजहार करने वाले दीगर शुरका के नामों पर अगर हम नज़र डालें
12:09जैसे डॉक्टर रईस हमत समदानी, रह्मान निशाद और प्रोफेसर सईद कादरी
12:14इसके लावा इखतामी लमहात में मुहमद तारिक बिन आज़ाद और डिरेक्टर जेनरल प्रोफेसर डॉक्टर मुहमद सलीम मज़र की जानिब से
12:24कलमाते तशक्र भी अदा किये गए
12:26जी बिलकुल अदा किये गए
12:28और हाँ, तकरीब में मौझूद दीगर प्रोफेसर जैसे इमरान गौरी और मेराद जामी वगएरा की मौझूदगी भी बहुत नमाया थी
12:36तो मैं ये सोच रही थी कि इस फेरिस को देखकर एक सवाल जहन में आता है
12:42कि इतने सारे मौहकेकीन, असातिजा और सहाफियों का एक ही निशस में इस मौझू पर मुझूदग होना क्या माने रखता
12:51है
12:52देखे, ये हर्गिस कोई छोटी बात नहीं है
12:55जब आपके पास तद्रीज से जुड़े प्रोफेसर्स, खबरों की दुनिया से जुड़े लोग और जुबान की बारीकिया खोजने वाले मुहकेकीन
13:02एक ही छट की नीचे बैठे हो
13:04और मौजू कौमी सलामती और अदब हो
13:07बिलकुल, तो इससे ये साबित होता है कि मौशरे के दानिश्वर तपके में इस बात का ऐसा शिद्दत इख्तियार कर
13:13रहा है
13:14कि कौमी बियानिये की तश्कील में उनका फाल किरदार नागुजीर है
13:18यानि वो अपनी जिमधारी महसूस कर रहे हैं
13:20जी हाँ, ये एक इच्तिमाई कोशिश की शिरुवात नजर आती है
13:24माजी में शायद ये समझा जाता था कि ये हमारा काम नहीं है
13:27लेकिन अब वो समझ गए हैं कि उन्हें खुद मुतहरिक होना पड़ेगा
13:30तो अगर हम इस सारी गुफ्तगू को समेटने की कोशिश करें
13:33तो पूरे जायजे का निचोड ये निकलता है
13:36कि किस तरह बुन्याने मरसूस और मारकाय हक की काम्यादी को महज
13:40एक असकरी फता के तौर पर नहीं मनाया गया
13:44बलकि उसे इल्म औ अदब के जाविय से देखकर
13:47मौशरे की फिक्री बुन्यादों को मजबूत करने की कोशिश की गई
13:50सही कहा आपने
13:51और अगर हम इस बात को अपने सुनने वालों के लिए
13:55एहमियत के जाविय से देखें
13:57तो एक बहुत गहरा सबक है
13:58वो सबक क्या है
13:59वो ये के हम सब जो खबरें पढ़ते हैं
14:03जो कहानिया या किताबें हम पढ़ते हैं
14:05वो सिर्फ तफरीह नहीं होती
14:06हाँ वो लाशोरी तौर पर
14:09कौम का इज्टमाई मुराल और यकजहती ते कर रही होती है
14:12बिलकुल वो खामोशी से हमारे वजूद का हिस्सा बन रही होती है
14:16क्या जबरदस्त बात है
14:18और बिलकुल इसी मकाम से इसी सोच से
14:21एक ऐसा सवाल जनम लेता है
14:23जो वाकई जहन को जंजोडने के लिए काफी है
14:25जी बताईए
14:26हमने इस जायजे में माजी की बात की
14:28कि माजी में तो होमर और फिर्दोसी ने
14:31अपनी कौमों के लिए अजीम दास्ताने लिखी
14:33हम सफाहात पर जंगें जीती
14:35बिलकुल लेकिन आज की इस तेस तरीन
14:38डिजिटल और सोशल मीडिया के दोर में
14:40हमारा रिजमिया अदब क्या शकलिक त्यार कर रहा है
14:43ये बहुत बड़ा सवाल है
14:44मतलब क्या आज हम स्मार्टफोन की स्क्रीनों पर
14:47कोई ऐसी तखलीक दे रहे हैं
14:49जो हजार साल बाद आने वाली नसलों का भी
14:52खून गर्मा सके
14:53वाकई सोचने का मकाम है
14:55या फिर हम इस रोजमर्रा के मालूमाती शोर में
14:59वो दाइमी कहानिया लिखना ही भूल गए है
15:02ये एक ऐसा सवाल है
15:04जो हम सब के लिए एक फिक्री चैलिंज है
15:07इसी फिकरंगे सवाल के साथ
15:09आज के इस तफसीली जाइजे का वक्त
15:12इखताम को पहुंचता है
15:14बिलकुल अगली बार नए हवालों के साथ मिलेंगे
15:17जी तब तक के लिए अपना खयाल रखिएगा
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