00:00Hmm, consider that one of a very quiet,
00:03very quiet and very quiet and very quiet.
00:07One of those where four books are done,
00:10a poor language has been put in a very quiet and a very quiet area,
00:15a very quiet and quiet,
00:17and that one of those words is a very quiet place with a quiet,
00:20and then there is no quiet and quiet and quiet.
00:22And then there is a very quiet and quiet,
00:29Yes, it is.
00:56If two dunes are in the middle of this state, that one without the other, is completely impossible, then it
01:04would be a bit strange.
01:06Yes, this is really strange.
01:09Today's specificity of the jails, we have to do this strange, strange, kind of thing.
01:14We will see that the last thousand years of the jails, the last thousand years of the jails, the jails,
01:22the jails and the jails, the jails, the jails, the jails and the jails.
01:29I don't know.
01:55और ये मुजाकरा बुनियाने मरसूस और मारका हग की कामियाभी की पहली सालगिरा के मौके पर मुनाकित किया गया।
02:02अच्छा यहां थोड़ा सा रुक कर इन इस्तिलाहात को समझना बहुत जरूरी है ताके हमारे सुनने वालों के लिए गुफ्टगू
02:08का पसे मनजर वाज़ हो सके।
02:10विलकुल मैं बताता हूँ देखें बनियाने मरसूस जो है वो अरबी जुबान का लवज है इसका मतलब है सीसा पिलाई
02:18हुई दीवार।
02:18सही।
02:19असकरी और कौमी सता पर ये इस्तिलाह देशतगर्दी और दुश्मन अनासर के खिलाफ उस गेर मुतजल्जल और मजबूत इतिहात को
02:27जाहर करती है जो एक कौम और उसकी अफवाज के दर्मयान होता है।
02:31और इसी तरह मारके हक से मुराद बातल के खिलाफ सचाई की वो जंग है जो हर मैदान पर लड़ी
02:38जाती है।
03:01और इस जीत को याद रखने में अदब का क्या किरदार होता है।
03:05बिल्कुल और यहीं से इस तक्रीब का वो पहलू सामने आता है जो मुझे सबसे जादा मतलब चौका देने वाला
03:12लगा।
03:12वो क्या।
03:13ये तक्रीब कहा मुनाकद हुई।
03:15कौमी विर्सा और सिकाफ़त डिविजन के जैली इदारे अर्दू लुगत बोर्ड कराची में।
03:20अहाँ, बिल्कुल लुगत बोर्ड में।
03:23यानि ये वो जगा है जो बजाहर अलफाज का घर है, डिक्शनरियों का मरकज है और इसका इनिकाद अर्दू सिंधी
03:32अदबी संगत जिसे असास कहा जाता है, उनके तावन से हुआ।
03:36सही।
03:37तकरीब का बाकाइदा अगाज तिलावत कलाम पाक से हुआ जो प्रोफेसर सहीत कादरी ने की और असास की चेर परसन
03:45गुलनाज महमूद ने खेरमकदमी कलिमात अदा किये।
03:49लेकिन ये जो जगा का इंतिखाब है, ये मुझे एक अजीब सी तश्बीह की तरफ ले जाता है।
03:56कैसी तश्बीह?
03:56मतलब ये ऐसा ही है जैसे किसी इंतिहाई हसास जरासीम से पाक साइंसी लेबाटरी के अंदर इंसानी जजबात, जंगी वलवलों
04:06और बारूत की बू का मुताला किया जा रहा हो।
04:09वा, क्या बात है, ये लेबाटरी वाली तश्बीह तो सूरत इहाल को समझने के लिए बहतरीन है।
04:15तो सवाल ये पैदा होता है कि इल्म औ अदब के उन खामोश मराकिज में जहां आम तोर पर लिसानियात
04:22पर बहस होती है, वहां अचानक ऐसे वलवला अंगेज और दिफाई मौजवात पर बहस की जरूरत क्यों पेशा गई।
04:29ये एक बहुत एहम सवाल है।
04:31मतलब क्या फौज का काम सिर्फ सरहदों पर नहीं होता।
04:35कि जब हम ये सवाल उठाते हैं कि लोगत बोर्ड जैसे इल्मी मराकिज में दिफागी बात क्यों हो रही है,
04:41तो इसका जवाब हमें बियानिये की साइंस में मिलता है।
04:44अच्छा।
04:44हाँ, क्योंके जगे अब सिर्फ गोला वारूत से नहीं लड़ी जाती, जदीद दोर की फिफ्ट जिनरेशन वारफेर में जो सबसे
04:51बड़ा महाज है ना, वो इनसानी जहन है।
04:54बिलकुल, माइंड सेट।
04:55जी, और इनसानी जहनों को कंट्रोल करने वाला जो हत्यार है, वो बियानिया या नेरिटिफ कहलाता है।
05:01अब इस मुझाकरे को देखें जिसकी निजामत डॉक्टर इर्फान शाने की थी।
05:05अगर हम वहां मौझूद सामेइन पर गोर करें, तो वहां जामियात के MFIL और PhD के तलबा, तद्रीस और मीडिया
05:12से वाबस्ता अफराद मौझूद थे।
05:14यानि वो लोग जो मौशरे में राय बनाते हैं।
05:17बिल्कुल, ये वो लोग हैं जो माशरे में सोच पैदा करते हैं।
05:20ये एक बहुत वाज़े इशारा है कि रियासत और दानिशवर तबका उस बात को समझ चुका है कि
05:25कौमी बियानिये सड़कों पर खड़े होकर या सिर्फ प्रेस रिलीस जारी करके नहीं बनते हैं।
05:47इसी फिक्री बियानिये के हवाले से इस तक्रीब के सदार्ती खुटबे में एक ऐसी बात कही गई जिसने मुझे थोड़ा
05:54सा उलज़ा दिया है।
05:55अच्छा, वो क्या बात थी।
05:57देखें, वफाकी जामिया अर्दू के साबिक शेखल जामा, डॉक्टर जफर अक्बाल ने इस निशस्त की सदारत की।
06:03उन्होंने जहां मौजू के इन्तखाब को सराहा, वहीं उनका एक जुम्ला बहुत तवज्यो तलब था।
06:08जी।
06:08उन्होंने कहा के मुसल्ला अफवाज के साथ हम हामेगी बहैसियत कौम हमारा मुस्तकिल वतीरा होना चाहिए।
06:17मुस्तकिल वतीरा
06:19अब मैं यहां थोड़ा सा मतलब इखतलाफ करना चाहूंगी या कमस कम इसकी गहराई में जाना चाहूंगी।
06:27Yes, absolutely.
06:32Yes, absolutely.
06:58Yes, sir.
07:37अच्छा, अमन के दौर की भूल चूख?
07:40जी, अब होता ये है कि जंग के वक्त बका की जिबलत पूरी कौम को इकठा कर देती है
07:45लेकिन जैसे ही अमन काइम होता है न, तो रोज मर्रा की रूटीन, मौशी मसाइल और सियासी एक्तिलाफात कौम को
07:51दुबारा टुकडों में बांट देते हैं
07:53बिल्कुल, लोग अपनी अपनी जिन्दिगियों में मगन हो जाते है
07:56और फिर अवाम ये भूलने लगते हैं कि जो अमन उन्हें आज मैसर है, इसकी सरहदों पर क्या कीमत अदा
08:02की गई है
08:02वो जो फिक्री हमाहंगी है, वो खतम होने लगती है
08:05और इदारों के दर्मयान फासले पैदा हो जाते है
08:08बिल्कुल, तो इस तनाजर में मुस्तकिल वतीरा होने का मतलब ये है
08:12कि बहुरानों के लावा भी अमन के वक्त में इदारों और अवाम के दर्मयान जहनी और फिक्री हमाहंगी होनी चाहिए
08:19पकि कोई बेरुनी बियानिया उस खला का फाइदा ना उठा सके
08:22तो मतलब ये वो खला है जिसे अदब पुर कर सकता है
08:26जी और ये ही वो मकाम है जहां अदब दाखिल होता है
08:28अदब वो वहिद जरिया है जो जंग खत्म होने के बाद भी उसकी याद और जजबों को मौशरे के इश्तिमाई
08:35शूर का हिस्सा बनाए रखता है
08:36अच्छा तो मतलब ये के अदब वो गोंद है जो अमन के दिनों में कौम को उस वक्त भी जोड़े
08:43रखता है जब कोई बैरूनी खत्रा बजाहिर नजर नहीं आ रहा होता
08:47सौ फीसद
08:48और जब हम इस गोंद या इस पुल की बात करते हैं तो रपोर्ट में एक और गुफ्तगू का हवाला
08:54आता है जो मुझे लगता है इस बहस का ओरूज है
08:57हाँ वो डॉक्टर शादाब एहसानी वाली बात
08:59दिलकुल तकरीब के महमाने खसूसी जामिया कराची के शोबा उर्दू के साबिक चेर्मेन डॉक्टर शादाब एहसानी ने एक बहुती गहरा
09:08तारीही नुक्ता उठाया
09:09जी उन्होंने बहुत कमाल बात की
09:11उन्होंने जंग और अदब की बात करते हुए किसी मौझूदा दौर के लिखारी का नहीं बलकि तारीह के दो बहुती
09:18गदावर नामों का हवाला दिया
09:20गदीम युनान का शायर हूमर और फारिस का अजीम शायर फिर्दोसी
09:24उनका कहना था कि रजमिया अदब होसले बुलंद करता है और यग जहती को फरोग देता है
09:31बिल्कुल रजमिया अदब यानि एपिक लिटरिचर
09:33जी और अगर हम उनकी इस बात को आज के तनाजुर में देखें
09:37तो मुझे ये रजमिया अदब या ये दास्ताने किसी कौम की जजबाती जिरा बक्तर की तरह लगती है
09:43जजबाती जिरे बुखतर वा बहुत उंदा तश्बी है
09:47हाँ मतलब जैसे मैदान जंग में एक फौजी अपने सीने पर बुलिट प्रूफ जैकेट या जरा बुखतर पहनता है ताके
09:54गोलियों से बच सके
09:55वैसे ही ये दास्ताने कौम के जहन और होसले की हिफाज़त करती है
10:00बिल्कुल ऐसा ही है
10:01लेकिन मुझे ये समझाएं के आखिर होमर और फर्दोसी ही क्यों
10:07उनके काम में ऐसा क्या था जिसका हवाला आज इतनी सद्यों बात दिया जा रहा है
10:12इस जजबाती जिरा बुखतर के स्तारे को अगर हम होमर और फर्दोसी की तारीख पर लागू करें
10:17तो डॉक्टर शादाब इसानी की इस इंतिखाब की असल ताकत समझ में आती है
10:21अच्छा
10:22ये महज पुरानी किताबों का जिक्र नहीं है
10:24ये दरसल कौमों की बका की साइंस है
10:27पहले हम होमर को देखते हैं
10:29हमर ने आज से लगबग तीन हजार साल पहले इलियाड लिखी
10:33जी इलियाड
10:34उस वक्त युनान कोई एक मुतहिद मुल्क नहीं था
10:37बलकि छोटे-छोटे शहरों में बटा हुआ था
10:39हमर ने ट्रॉय की जंग की दास्तान को इस तरह लिखा
10:42कि उसने तमाम बिखरे हुए मुराल को इकठा कर दिया
10:45यानि उसने उनको एक शनाख्त दे दी
10:48बिलकुल जब वो ये दास्ताने सुनते थे
10:50तो वो खुद को एक अजीम युनानी तहजीब का हिस्सा मानते थे
10:54और फिर्दॉसी का मामला तो इससे भी ज्यादा हैरान कुन है
10:57वो कैसे?
10:58फिर्दॉसी ने जब शाहनामा लिखना शुरू किया
11:01तो उस वक्त एरान पर अर्बों की हकुमत थी
11:04और फार्सी जुबान तेजी से खतम हो रही थी
11:07फिर्दॉसी ने तीस साल लगा कर ये रजमिया दास्तान लिखी
11:11तीस साल? वा?
11:12जी, उसने इरान के पुराने बाच्चाहों और सूर्माओं की कहानिया लिखी
11:17इस शाहनामे ने मरती हुई फार्सी जुबान को दुबारा जिन्दा कर दिया
11:22और इरानियों की पहचान को सदियों तक के लिए महफूस कर दिया
11:26ये तो वाकई कमाल है
11:27डॉक्टर शादा बैसानी दरसल यही बताना चाहरे हैं
11:30कि अजीम कौमें अपनी जंगें सिर्फ जोग्राफियाई मैदानों में नहीं जीती
11:34वो जंगें सफात पर भी जीती जाती हैं
11:36बिलकुल यानि अगर होमर और फिर्दोसी ना होते
11:40तो शायद आज युनान और इरान की तारीख कुछ और होती
11:43यकीनन कुछ और होती
11:45ये बात तारीख के लिहाज से तो बहुत मज़ूर कुन है
11:48लेकिन यहां हम अगर होमर और फिर्दोसी की
11:52इन तारीखी मिसालों से निकल कर थोड़ा आगे आएं
11:55तो मुझे ये देखना है कि इस मुझाखरे में
11:58मौझूद मौझूदा दौर के दानिश्वर इस हवाले से क्या कर रहे हैं
12:02हाँ ये देखना बहुत एहम है
12:04तक्रीब में ख्यालात का इजहार करने वाले दीगर शुरका के नामों पर अगर हम नज़र डालें
12:09जैसे डॉक्टर रईस हमत समदानी, रह्मान निशाद और प्रोफेसर सईद कादरी
12:14इसके लावा इखतामी लमहात में मुहमद तारिक बिन आज़ाद और डिरेक्टर जेनरल प्रोफेसर डॉक्टर मुहमद सलीम मज़र की जानिब से
12:24कलमाते तशक्र भी अदा किये गए
12:26जी बिलकुल अदा किये गए
12:28और हाँ, तकरीब में मौझूद दीगर प्रोफेसर जैसे इमरान गौरी और मेराद जामी वगएरा की मौझूदगी भी बहुत नमाया थी
12:36तो मैं ये सोच रही थी कि इस फेरिस को देखकर एक सवाल जहन में आता है
12:42कि इतने सारे मौहकेकीन, असातिजा और सहाफियों का एक ही निशस में इस मौझू पर मुझूदग होना क्या माने रखता
12:51है
12:52देखे, ये हर्गिस कोई छोटी बात नहीं है
12:55जब आपके पास तद्रीज से जुड़े प्रोफेसर्स, खबरों की दुनिया से जुड़े लोग और जुबान की बारीकिया खोजने वाले मुहकेकीन
13:02एक ही छट की नीचे बैठे हो
13:04और मौजू कौमी सलामती और अदब हो
13:07बिलकुल, तो इससे ये साबित होता है कि मौशरे के दानिश्वर तपके में इस बात का ऐसा शिद्दत इख्तियार कर
13:13रहा है
13:14कि कौमी बियानिये की तश्कील में उनका फाल किरदार नागुजीर है
13:18यानि वो अपनी जिमधारी महसूस कर रहे हैं
13:20जी हाँ, ये एक इच्तिमाई कोशिश की शिरुवात नजर आती है
13:24माजी में शायद ये समझा जाता था कि ये हमारा काम नहीं है
13:27लेकिन अब वो समझ गए हैं कि उन्हें खुद मुतहरिक होना पड़ेगा
13:30तो अगर हम इस सारी गुफ्तगू को समेटने की कोशिश करें
13:33तो पूरे जायजे का निचोड ये निकलता है
13:36कि किस तरह बुन्याने मरसूस और मारकाय हक की काम्यादी को महज
13:40एक असकरी फता के तौर पर नहीं मनाया गया
13:44बलकि उसे इल्म औ अदब के जाविय से देखकर
13:47मौशरे की फिक्री बुन्यादों को मजबूत करने की कोशिश की गई
13:50सही कहा आपने
13:51और अगर हम इस बात को अपने सुनने वालों के लिए
13:55एहमियत के जाविय से देखें
13:57तो एक बहुत गहरा सबक है
13:58वो सबक क्या है
13:59वो ये के हम सब जो खबरें पढ़ते हैं
14:03जो कहानिया या किताबें हम पढ़ते हैं
14:05वो सिर्फ तफरीह नहीं होती
14:06हाँ वो लाशोरी तौर पर
14:09कौम का इज्टमाई मुराल और यकजहती ते कर रही होती है
14:12बिलकुल वो खामोशी से हमारे वजूद का हिस्सा बन रही होती है
14:16क्या जबरदस्त बात है
14:18और बिलकुल इसी मकाम से इसी सोच से
14:21एक ऐसा सवाल जनम लेता है
14:23जो वाकई जहन को जंजोडने के लिए काफी है
14:25जी बताईए
14:26हमने इस जायजे में माजी की बात की
14:28कि माजी में तो होमर और फिर्दोसी ने
14:31अपनी कौमों के लिए अजीम दास्ताने लिखी
14:33हम सफाहात पर जंगें जीती
14:35बिलकुल लेकिन आज की इस तेस तरीन
14:38डिजिटल और सोशल मीडिया के दोर में
14:40हमारा रिजमिया अदब क्या शकलिक त्यार कर रहा है
14:43ये बहुत बड़ा सवाल है
14:44मतलब क्या आज हम स्मार्टफोन की स्क्रीनों पर
14:47कोई ऐसी तखलीक दे रहे हैं
14:49जो हजार साल बाद आने वाली नसलों का भी
14:52खून गर्मा सके
14:53वाकई सोचने का मकाम है
14:55या फिर हम इस रोजमर्रा के मालूमाती शोर में
14:59वो दाइमी कहानिया लिखना ही भूल गए है
15:02ये एक ऐसा सवाल है
15:04जो हम सब के लिए एक फिक्री चैलिंज है
15:07इसी फिकरंगे सवाल के साथ
15:09आज के इस तफसीली जाइजे का वक्त
15:12इखताम को पहुंचता है
15:14बिलकुल अगली बार नए हवालों के साथ मिलेंगे
15:17जी तब तक के लिए अपना खयाल रखिएगा
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