00:10मीरा बाई के इस बजन में जब ये कहा जाता है कि विश्का प्याला मीरा के पास बेजा गया
00:16तो क्या आप ये जानते हैं कि ये लफ्स प्याला गुजराती का नहीं बलके फार्सी जबान से आया है
00:22सिर्फ ये लफ्स ही नहीं मेहमान, जजबा, शिकायत और तालुका जैसे कई ऐसे लफ्स हैं जो आज गुजराती के बोलचाल
00:30का हिस्सा है उनकी जड़े फार्सी जबान में मिलती है
00:33और इन सब के पीछे छुपी है एरान और गुजरात की सद्यो पुरानी कहानी
00:41फार्सी आज एरान की कौमी जबान है
00:43एरानियों की कदीम जबान अवस्ता थी जिसका संस्क्रिट जबान से गहरा रिश्टा माना जाता है
00:49वक्त के साथ ये जबान पहल भी और फिर जदीद फार्सी में बदलती चली गई
00:53बहुत से माहिरीन का मानना है कि फार्सी जबान गुजरात तक पार्सियों के जर्ये पहुंची
00:59लेकिन ये वाजिया नहीं कि इसका असर वहां कब से मौजूग था
01:03कुछ माहिरीन इस तरफ भी इशारा करते हैं कि एरान और गुजरात के दर्मियान कदीम तिजारती रवाबित इस असर की
01:10बुनियाद बन सकते हैं
01:11माहिरीन के मुताबिक फार्स और हिंदुस्तान के दर्मियान तिजारत छटी या साथवी सदी कबले मसी से चली आ रही थी
01:19और इस तिजारत के साथ जबान और सकाफत का तबादला भी हुआ
01:25बाद अजान पार्सियों की गुजरात, हिजरत और दिली सल्तनत और मुगल दोर में फार्सी का दर्बार की जबान बन जाना
01:32ये सब इस सिलसले की एहम कड़ियां बनती चली गई
01:37फार्सी के मशूर शायर हलवी शीराजी अपनी किताब तारीक एहमद शाही की वज़े से पहचाने जाते हैं
01:43उन्होंने एहमदबाद के कियाम को फार्सी के अद्बी रंग में बयां किया
01:48और इस शहर को इस फाहन और खुरसान जैसे कदीम शहरों के मुकाबल करार दिया है
01:53ये सिर्फ तारीफ नहीं थी बलके उस दोर की पहचान थी
02:00जब मुगल का दोर सुरू हुआ तो तकरीबन 200 साल तक जो हमारी दर्बारी भाशा थी वो फार्सी हो गई
02:07और इस वज़े से गुजरात में भी जीतने सूवेदार आए तो उस वज़े से भी फार्सी हो गई
02:11और हमारी गुजराती प्रजा पहले से आपको पता है मौके की नजाकत को बहुत अच्छे से समझती है
02:18और नागर ब्रहमन जो थे कायस्त जो थे उतरी भारत की और से
02:37अच्छे से काम कर सकते हैं तो फिर लोगों ने अच्छे से फार्सी सीखना सुभू किया और बहुत अच्छे अच्छे
02:42और उन्हों
02:42काम किया फार्सी का जो आर्किटेक्ट था वो भी हमने अपनाया पहले एंदाबाद में हमारे पुरानी धब के मकान बनते
02:50थे जिसमें जैन और बॉद्दिजम की जल्लक हमें नजर आती थी फिर अरबो और फार्सी के वजह से हमने उनकी
02:58तरह के स्ट्रक्चर को अपनाया जिस
03:12की निशानियों के लिए सनद अखबारात खरीदा और अर्जदाज जैसे अलफाज इस्तिमाल होते थे जबकि फौज और दीगर एदारों में
03:20सकाफती और इंतिजामी अलफाज ज्यादतर अर्बी या फार्सी थे
03:24जबान से मुतालिक मतून और कद्बो पर लिखी हुई तहरीरे भी अर्बी फार्सी में होती थी
03:30इस तरह दिली सर्टनत के दौर में फार्सी का गल्बा बढ़ता चला गया और कई अर्बी फार्सी अलफाज संस्कृत और
03:37इंडियन जबानों के भी हिस्ता बन गए
03:41आजगर चे गुजरात में फार्सी जबान का इस्तिमाल कम हो गया है मगर ये जबान अब भी पढ़ाई जाती है
03:47और हर बार जब हम मेहमान शिकायत और जजबा जैसे लफ्स इस्तिमाल करते हैं तो हम बेख्तियार उस रिष्टे को
03:55जिन्दा रखते हैं जो गुजरात और एरां के दर्मिया सद्यों पहले बना था
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