00:02पुराने लखनव के खंजर का तक्या इलाके के एक कार खाने की छट पर सब सफेध ही सफेध नजर आ
00:09रहा है।
00:10ऐसा लग रहा है कि महीन महीन धागे पूरी छट पर बास में लटके हों।
00:16लेकिन ये धागे नहीं सेवई है जो इस कार खाने में ईद से पहले तैयार की जा रही है।
00:22सेवई खाते वक्त अंदाजा नहीं होता कि ये कितनी महनत से तैयार हुई है।
00:28सिमई ये पूरी दुन्या में अलग-अलग हूप में खाय जाती है।
00:32उसका अस्तिमाल होता है।
00:34कहीं इसको नंकीन खाया जाता है, कहीं इसको मीठा खाया जाता है।
00:37कभी इसको कोई बहमसली समझ क काता है।
00:39लग अलग तरह से।
00:43लेकिन जो लखनवी प्रक्रिया है इसकी सिमाई बनाने की ये बहुत अच्छे से है एक परंपरागत मशीन है जो पहले
00:50हाथ से चला करती थी अब लेकिन उसके अंदर मोटर्स के इस्तिमाल होने लगे उस मशीन में ये पूरी तरह
00:55से सिमाई पूरी बारीक बारीक परतों में �
00:57निकल के आती है उसके बाद फिर इसको आप जैसे देख सकते हैं कि इसको सुखाने की प्रक्रिया होती है
01:04लक्नों में आज भी सेवई बनाने में हाथ का इस्तेमाल ज्यादा होता है
01:08पहले इसे 6 गंटे धूप में सुखाया जाता है और फिर 12 गंटे भट्टी में पकाया जाता है
01:14भट्टी में करीब 50 किलो लकडी जलाई जाती है और फिर उस लकडी को बाहर निकाल लिया जाता है
01:21भट्टी के अंदर ही ही हीट में सेवई धीरे धीरे भुंती है
01:26रमजान पिशले 20 साल से सेवई बनाने का काम कर रही है
01:30उनका तजुर्बा उन्हें बता देता है कि सेवई कब सफेद से सुनहरी हो गई
02:0020 साल हो गए तो इतना तो अंदाजा ही है कि अभी अभी हो गया उन्नीस वीज तो हो गया
02:06नहीं तो हाथ डालते है देख चे पता चल जाता है कि तेज है या नार्मल है बगने लाए एक
02:10भठी में जो है पचास-पच्पन किलो लगता है यह जलाने में कमें डेर दो घंटा ल
02:38तो इसका काम अभ हो गया लोग इसको बिल्गुल ही बना सकते यहां तक यह आप घर पे अगर मैक्रोवेव
02:50या वन में यह किसी में करने कई कोशिश करेंगे तो वह भी नहीं तो इसका बहुत ही पर्टिकुलर टमट्रेचर
02:55है उस तरमट्रेचर से ज़रा भी च्र्ण-च्�
02:58तो सिवाई या तो जादा वो हो जाएगी या कच्ची रह जाएगी इसलिए इसके परफेक्ट टमप्रेचर के ओपर ध्यान रखके
03:04उसके बाद इसको भूना जाता है आपको मैंने बताया कि लकली पूरी बाहर निकाल ली आती है और जो इसका
03:09आवण है वो एक पर्टिकुलर
03:19सेवाई का इतिहास भी काफी दिल्चस्म है इतिहासकार बताते हैं कि इरान में सेवाई काफी मशूर थी मुगल बादशाह सेवाई
03:28भारत लेकर आए अवद के नवाब इरानी ओरिजन के थे और उनके जरीए सेवाई लखनाव पहुंची
03:35सेवाई की जो खासियत है वो यह है कि बहुत मीठी होना चाहिए अगर वो फीकी हो गई तो उसमें
03:41मदा नहीं है उसमें दूद और उसके साथ साथ बालाई और मेवे जो इतने भी ड्राइफ रूट्स हैं वो उसमें
03:49अंदर मिक्स भी किया जाते हैं उसमें उसमें गारनेश
04:04ती उसमें जो एक रिचनेस होना चाहिए है वो रिचनेस होती थी उसमें अरोमा जो है वो हो कि जैसे
04:10यहां पर अगर आप कही पर पक रही है तो दूर आप उसकी खुश्बू जो है वो सूम लिया और
04:16उसकी जो मिठास उसकी जो चाशनी होती उसकी मिठास की जो खुश्ब
04:56इद को तो सेवयों वाली एद भी कहते है
04:59लोगों को पूरे सहार इंतजार रहता है कि कब इद आए और हम कब समया खाए
05:07इनसान एक चमचा खाए तो नियत सेर हो जाए
05:11रिखनाओं के पानी में असर है
05:14इसका असर जो यहां का मज़ा है और कहीं ने मिलता है नहीं
05:29झाल
Comments