00:00इस कहानी का नाम है च्छास में पड़े दो मेंड़क.
00:10एक जमाने की बात है.
00:13एक गाओ था. उस गाओ में एक ग्वाला रहता था.
00:17वह ग्वाला हर दिन उसके दूद का दही जमा देता था.
00:22और फिर उसमें से वह च्छास बनाता था.
00:26और और फिर उस च्छास से बहुत सारा मक्खन भी निकाल लेता था.
00:32एक दिन उस ग्वाले ने च्छास बनाई और जल्दी जल्दी में उस च्छास के मटके को ऐसे ही खुला चोड़कर अपने काम के लिए चला गया.
00:44उस ग्वाले के घर से लग कर दो मेंड़क रहा करते थे.
00:49वे दो मेंड़क ऐसे ही घर के आजू बाजू घूनते घामते घर के खिड़की पर आकर बैड़ गये.
00:58उस खिड़की से दोनों मेंड़कों ने उस रखे हुए च्छास की तरफ दीखा.
01:05और फिर चलाँग लगा कर उस मत के में वो जागिरे.
01:10उस मत के में रखे हुए च्छास में विह तयर ने लगे, और फिर उस मत के से बाहर आने ती कोशिश करने लगे.
01:21दोनों मेंड़कों ने उस मटके के बाहर आने की कोशिश की
01:25पर उन कोशिशों के बाद भी
01:28दोनों भी उस मटके के बाहर नहीं निकल पाए।
01:33कुछ कोशिश करने के बाद एक मेंड़क निराश हो गया
01:37और बोला,
01:39आ, आ, मैं इतनी देव से इस छास में
01:43हाथ पाउ मार कर देव रहा हूँ,
01:47पर, पर उसका कुछ फाइडा ही नहीं हो रहा है।
01:52मुझे नहीं लगता मैं यहाँ से निकल पाउंगा।
01:56शायद, शायद मैं यही पर दम दोडने वाला हूँ।
02:00अगर मैं मरने ही वाला हूँ,
02:03तो बचने की कोशिश भी क्यों करूँ।
02:06ऐसा सोचकर, उसने हाथ पाउ मार कर तैरना छोड़ दिया।
02:12और आखिरकार, वह मैंडक उस छास में डूब के मर गया।
02:19लेकिन, दूसरे मैंडक ने हार नहीं बनी।
02:23वह हाथ पैर मारता रहा।
02:26वह तैरने की कोशिश करता रहा।
02:29उसने लगातार हाथ पैर मारने की कारण,
02:32उस छास का खूब मन्थन हुआ।
02:36और धीरे धीरे उसमें मक्हन जमने लगा।
02:41जैसे ही परियाप्त मक्हन तयार हुआ,
02:44तो वह मक्हन उस छास के सतह पर आ गया।
02:48और उस मक्हन का आधार लेकर,
02:51वहां मेंड़क एक चलांग में उस मटके के बाहर आ गया।
02:57इस तरह से उसके अथक परिश्रम के वज़ा से,
03:01वहां उस संकत से अपनी जान बचा पाया।
03:06तो बच्चों, इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है,
03:10कि हमें परिश्रम की पराकाश्ठा करनी चाहिए।
03:14और अंत तक किसी भी परिस्थिती में हार मान कर,
03:20कभी कोशिश करनी नहीं छोड़नी चाहिए।