00:28नमस्कार
00:34ब्रम्ह का विवर्त बन रहा है एक ही ब्रम्ह सुक्ष्मितम इस्तर से पांच अग्नियों में आहुत होकर इस्थूल देह धारन
00:42कर रहा है पंच परवा विश्व में स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, चंद्रिमा और पित्वी ही सब्त लोगों की संस्था में विवर्त
00:51हो �
00:55स्वयंभू के तपन और स्वेदन से उत्पन आपह लोग में व्रिगू अंगीराव अत्री प्राणों के योग से अव्य पुरुष्की योनी
01:04मह लोग बनता है मम योनिर महत ब्रम्ह तस्मिन गर्भम दधाम्यम सूर्य अक्षर संस्था है तथा प्रित्वी और चंद्रमा �
01:13अक्षर संस्था है स्विष्टी को आधिदैविक आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक तीन इस्तरों पर विभाजित किया जा सकता है इनमें सूर्य संस्था
01:23आधिदैविक पार्थिव संस्था आधिभौतिक तथा पुरुष्ट संस्था आध्यात्मिक है स्विष्टी का प
01:42प्राणी यग्य के भीद से दो प्रकार का माला जाता है।
01:45इस द्रिष्टी से सौर संस्था और आध्यात्मिक संस्था के यग्य दो दो प्रकार के हो जाते हैं।
01:52तथा आदि भौतिक यग्यों अर्थात पाशान मिट्टी आदिके यग्यों से अन्य यग्य उत्पन्य नहीं होने से उनको किवल एक ही
01:59प्रकार का कहा जाता है।
02:01इन तीनों संस्थाओं के ये यग्य ही पंचागनी विद्या के रूपने जाने जाते हैं।
02:06प्राणी यग्य के तीन पर्व हैं सूर्य, अंतरिक्ष और प्रित्वी वहीं प्राणी यग्य के दो पर्व योशा एवं रिशा हैं।
02:15दिवलोग के अधिष्टाता सूर्य के आगने प्राणों से पुरुष की उत्पत्ति होती है नथा चंद्रमा जो की भूर लोग का
02:22अधिष्टाता है, उसके सौमे प्राणों से इस्त्री स्रिष्टी का आविठाव पुआ है।
02:27आधि देविक संस्था में जैसे दिवलोग रूपी पिता एवं प्रिथ्वी रूपी माता से प्राणी यग्य संपन्न होता है वैसे ही
02:35आधियात्मिक संस्था में पुरुष एवं योशा के दामपत्य भाव से प्राणी यग्य संपन्न होता है।
02:42Prithvi, Antariksh, Tathar, Dio, Log 3 are Pranayagya, Prithak Prithak, Prithak, Rheathak,
02:48Vrishya, Yosha, Pranayagya, Antariksh, Sanstha, Yosha, Kee, Garg, Rooq, Mee, Antarabhut, Rheathati,
02:56Vrishya, Yosha, Prithvi, Antariksh, Ewan, Dio, Log, In 5 Ishtan, Opa, Srishti, Yagya,
03:04Prithal, Poj Lasarayagya, Prith ultimately haslar project, due to the
03:05Velasicyaowser being Keeingrチャンネル, Msada, Prithasali,iggs, Fraathak,
03:12Prithva, Tritha, Vedaksh, Naras, Yosha, Prithasara, Sonwar, Expeza,
03:14Pansala, Prithakar, Prithasali, Satsang, Maye, Tathara, Opa, Keeingr,
03:20Pritha, Prithak, Prithiك, Entariksh, Asama, Keeingr, Entariksh,
03:58ुद्धा
04:10इस लोग की अगनी सौर प्रानागनी या सावित्यागनी कहा जाता है
04:15यह अगनी दो स्वरुखों में परिनत होकर भूपिंड से संबंद रखता है
04:20सूर्य से आता हुआ तेज इंद्र प्रधान है तथा भूपिंड से टकलाकर प्रति फलित होता हुआ सौर तेज अगनी प्रधान
04:28है
04:28इस यग्य में सावित्यागनी अगनी है आदित्य समीधा है रश्मिया धूम
04:33एहकाल अर्ची, चंड्रमा, अंगार, दक्षत, स्फुलिंग, शधा, आखुत, द्रव्य तथा सोम इस यग्य का फल है
04:42सूर्य और प्रित्वी के मध्य स्थान से संबंदित विधा को आंतिरिक्ष्य कहा जाता है
04:48पर्मेश्टी सोम ही सूर्य से नीचे अंतिरिक्ष में व्याप्त रहता है
04:52तृतिय अस्याम इतो दिवी सोम आसीत रूप में सोम को दिव्य लोक से संबंद होने के कारण दिव्य कहा जाता
05:00है
05:00यह सोम गन, तरल और विदल भेट से क्रमशह, प्रित्र, परजन्य और सोम तीन प्रकार का है
05:08इनमें आपके प्राणों से युक्त वायू ही परजन्य है
05:11यह परजन्य द्यू लोक से आति हुए सोम को अपने गर्भ में प्रतिश्चित कर लेता है
05:17अतहय आप्यागनी कहलाता है परजन्य वा अगनी ही परजन्य ही विष्टी द्वारा समस्य संसार का उत्पत्ति कारक है
05:26परजन्याद ही दम सर्वं भवति है
05:29इस यग्यमें परजन्य अगनी अगनी है आपके प्राण्यूक्त परजन्य वायू ही समित है
05:35विद्युत अर्ची है, अब्र धूम है, वज्र अंगार है, गर्जन तर्जन पुलिंग है, परजन्य अगनी में अंतरिक्ष के बायो देवताउं
05:45द्वारा सोम की आहुती होती है, दोनों के सम्मिश्ण से व्रिष्टी होती है, यही इस यग्य का फल है।
05:52पार्थ्य विधा प्रिथ्वी लोग से संबंदित है, पिंडाक्मी का प्रिथ्वी फुमी कहलाती है तथा प्रानाक्मी का प्रिथ्वी प्रिथ्वी कही जाती
06:00है, संसार की प्रतेक वस्तु के निर्मापक तत्व विक्यजू तथा साम होते हैं, केंद्र से व्रुभू प्रि
06:48The
06:53ुपतिशाय विस्कुलिंग है पार्थिव अगनी में पार्थिव आगनेय देवताउं द्वारा प्रिष्ठी की आपुती होती है पार्थिव प्राणागनी तथा आंतरिक्ष्य जल
07:03के योग से अन्न का उत्वन्न होना ही इस आधिभौतिक यग्य का फल है
07:09पुरुष विधा में पुरुष है शडंग वैश्वानर अपनी विराठ खिरनेगर्व सरवग्य तथा इनके प्रवर्ग्य वैश्वानर तेजस तथा प्राग्य का सम्हू
07:21शडंग वैश्वानर कहा जाता है यही समस्त प्राणियों में अंतर भूत रहता है
07:26Krishna Swayam Vaishwanar Svarooq
07:28Me Samasthitaniyao Me Vidyaman
07:30Rehate Hai
07:31Aham Vaishwanar O Bhutva Praninam
07:33Deha Maash Chita
07:34Is Yergya Me
07:36Purush Shari Rast Vaishwanar
07:38Agni Agni Hai
07:395 Bhautik Shari Ravag
07:41Jho Samidha Hai
07:42Praan Dhum Hai
07:43Jivha, Archi, Chakshu, Angar
07:46Shrotra Sphuling Hai
07:47Is Aadhyatmik Purushaagni Me
07:49Aadhyatmik Indriya Devatau Dwarah
07:52Varsha Se Udpan
07:53Unruf Havi
07:54Dravya Ki Aamkuti Dhe Jati Hai
07:57Is Se Aadhyatmik Indriya
07:59Rast, Rakt, Maas, Me
08:01Asthi, Madja Ke Rupi
08:02Varendat Ho Tee Ho Tee Ho
08:04Shukra Bantta Hai
08:05Red, Ajwa, Shukra Hi
08:06Is Yagya Ka Palli Hai
08:08Yehi Aadhyatmik Indriya Ka
08:10Platham Parv Hai
08:11Aadhyatmik Sarstha Ka
08:13Duesra Parv Hai
08:13Yosha Vidha
08:14Istri Ke Shonit Me
08:16Pradishthit Agni Tattvihi
08:19Yosha Yagya Ki
08:20Mool Pradishthah Hai
08:21Us Ka Upaasthi Khi Samidha Hai
08:22Upa Mantra Na Ki Jati Hai
08:24Arthahat
08:25Hau Bhau
08:26Cheshna Aadhi Dhoom Hai
08:27Yoni Archi Lingg Hi
08:29Angara Hai
08:30Anand Vizfulling Hai
08:31Purush Shari Rast
08:32Pranadevtao Dwarah
08:34Is Yosha Yosha Agni Me
08:35Redh Ki Aadhyatmik Indriya
08:37Redh Ki Aadhyatmik Indriya
08:38Redh Khi Gharv Me
08:38Parinatth Ho
08:39Jata Hai
08:39Santati Is Yagya Ka
08:41Parinatmik Indriya
08:42Is Prakar
08:42Pancha Agniyong Arthahat
08:44Aadhyatmik Indriya Agni
08:45Parjanyagni
08:46Parthi Vagni
08:47Vaiswana Raghni
08:47Pranadevtao Dha
08:48Ra-Kharv
08:49Shraddha
08:50Soma
08:51Rishhti
08:51Anhva
08:52Redh Ki Aadhyi
08:53Ho Tih
08:53Jis Se
08:54Kramashah
08:55Som
08:55Vishhti
08:56Anhra
08:57Redhva
08:57Santati
08:58Rukh
08:58Panou
08:59Ki
08:59Pranadevtao
08:59Hodhi
09:00Ho Tih
09:00Hai
09:00यही ब्रह्म की सुक्षु से स्थूल तक की यात्रा का ब्रह्म है
09:04नमस्कार
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