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Transcript
00:00जब आप स्वामी वेकानंद के बारे में आज सुनते हैं आप पढ़ते हैं तो उन्होंने पैसे के लिए कितनी जद्दो
00:06जहद करी ये बात कभी ख्याल में आती है उनका नाम कभी पैसे से जोड़ कर रखा ही नहीं जाता
00:10हमको लगता है कि नहीं वो जो काम कर रहे थे वो तो �
00:26धन कौन देता इसलिए दिवान जी महराज मैं अमेरिका आगे आओं आपको याद हो कि सारा धन तो मैं आम
00:34लोगों से मांगता था धनी लोग मेरी बात समझ ही नहीं पाते थे तो उनका धन तो मैंने अस्विकार किया
00:42आम लोगों को उठाने के लिए स्वामी जी का सारा गाम
00:56सहाइता नहीं देपा रहे थे
00:58ज analytic मेरे देश वासी मेरे इतना भी नहीं कर पाए कि कहे दें कि में हिंदू धर्म प्रतिनिधेत तो
01:03कर रहा हूं
01:04भारत में तो सौमी जी को डोनेशन नहीं मिली वो अमेरिका भी गये
01:08तो वहाँ भी भारतवासियों ने आकर जो पुरानी संस्थाएं और जो रूडिवादी लोग थे परंपरावादी उन्होंने अमेरिका भी आकरके स्वामी
01:15जी के काम में अडंगा डालने कोशिश की
01:16तो आगे कहते हैं स्वामी जी शावाश मेरे देशवासियों तुमने भारत में भी मुझे कुछ नहीं दिया और मैं अब
01:23अपने काम के लिए धनी कठा करने अमेरिका है तो तुम अमेरिका में भी मुझे धन नहीं पाने दे रहे
01:28आगे कह रहे हैं दिवान जी मैं अपने भारतवासियों को प्यार करता हूँ
01:33इनसान मुझे जो कुछ भी दे सकता है उसको मैं लात मारता हूँ
01:38सुख में दुख में परवतों मरुस्थलों वनों में जो मेरे साथ रहें वो तो मेरे साथ रहेंगे ही
01:45और अगर मैं सफल नहीं हो पाया
01:48तो भारत में कभी आगे मुझसे भी कहीं योगिता संपन
01:53किसी और वीर का जन्म होगा
01:55जो मेरे कारे को संपन करेगा
01:58उन्हें दिख रहा था
02:00ये 1894 की बात है अभी उनके जिवन में अभी कई वर्ष शेश थे
02:04लेकिन उस वक्त भी उनको दिखने लग गया था
02:05कि भारत वासी ही उनका इतना घोर विरोध कर रहे हैं
02:07कि शायद उनका मिशन सफल नहीं हो पाएगा
02:10तो फिर उन्होंने भी भविशे से आशा रखी कि
02:12मुझसे नहीं हो पाएगा तो मेरे बाद कोई और आएगा
02:15जो मेरा ये जो काम है संपन करेगा
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