00:00जब हम लाइफ में कोई डिसिशन लेते हैं और हमारे पेरिंट्स के डिसिशन उनसे कॉंट्रडिक्ट करते हैं
00:07मुझे मास्टर्स के लिए जर्मनी जाना है
00:10दो साल मास्टर्स करोगी, फिर नौकरी करोगी, शादी कब होगी?
00:15तो most of the time हमें उनकी बात मानने बढ़ती है
00:18तो हम उन्हें कैसे समझा सकते हैं कि what is art perspective?
00:24आप 8 साल के नहीं हो, आप 12 साल के भी नहीं हो, आप adult हो, आप vote दे सकती
00:31हो
00:32आप इस देश के शासक को चुन सकती हो
00:37सड़क पर गाड़ी चलाने का आपका हक है
00:40आप कल को किसी कंपनी में जाएंगे, वहाँ पर आपको जिम्मेदारी का एक पद दिया जाएगा
00:46उस जिम्मेदारी निभाने का आपका हक है
00:49और उसके बाद हम कहें कि
00:51मैं मेरे घरवाले यार दोस्त या कोई और मेरी बात नहीं सुनता
00:55ये मजबूरी कैसी है?
00:57और क्यों मानू मैं इस मजबूरी को?
01:01मैं जो बोल रहा हूँ आप अलाओ करो कि तब मैं बोलूँगा
01:05आजाद जी आहूँ और
01:08ऐसे ऐसे मूख विद्रोह करे हैं कि
01:11जादा तर लोग कल्पना भी न कर पाए
01:14पेरेंटिंग की भी सार्थक्ता इसी में होती है
01:18कि हमने अब एक ऐसी आलाद खड़ी कर दिये
01:23जो सक्षम है, सबल है और अपने जीवन के निरणे सोयम ले सकती है
01:29हाँ, कभी संतान ही सोयम आकर के कहे
01:32कि पापा, मम्मी आपसे एक बात करनी थी, आपकी सलाह चाहिए
01:36तो जरूर तुम उन्हें अपने अनुभाव से, अपने विवेक से
01:41जो भी उचित सलाह है वो दो, बिल्कुल दो
01:44पर मेरी परमीसन के बिना तो कुछ नहीं करेगी
01:48ये ये प्रेम की बात नहीं है
01:51और इसमें कोई गरिमा भी नहीं है
01:55जानों की प्रेम कहते किसको है
01:58फिर माबाप का संतान के प्रति भी प्रेम होगा
02:02और संतान भी माबाप से प्यार कर पाएगी
02:05और तब फिर ऐसे सवाल नहीं पैदा होते
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