00:00कोई लजाएगा नहीं ये शर्म जो है न ये प्रयास को खा जाती है आप लोग सोचते हो कि शर्म
00:05से व्यक्ति बहतर बनता है सफल होता है उल्टी बात है अपने बच्चों को ये बोल बोल के बोल बोल
00:11के कि तुमको सफल होना है सफल होना है हमने उनमें शर्म भर दिये मट डा
00:29में हो रहा है मुझे शर्म नहीं आती ना आएगी मैं बेशर्म हूं और देखिए जो जितनी नहीं कोशिश करता
00:36है उसको उतनी नए थरीके की चोटे भी लगती हैं गलतियां भी होती हैं बाहर वाले हसे समझ में आता
00:41है उन्हें हसने तो जैसे भी हसे अपने भीतर ये भाव �
00:44आना चाहिए कि मैं छोटा हूं मैं ऐसा हूं मैं ऐसा हूं कुछ नहीं भाई जैसे भी पैदा हुए हम
00:49भैतर होने की कोशिश में लगातार हैं
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