00:00जो आपसे कहा जाता है कि सुमिरो या याद रखो या समरण रखो तो समरण रखना उदेश नहीं है विधी
00:06है उदेश वो होता है जो प्राप्त किया जा सके प्राप्त तो ये उदेश किया ही नहीं जा सकता क्योंकि
00:12वो जो है परम्तत्त उसको याद करना संभव ही नहीं है त
00:28हुमारी सारी शक्त लग जाएगी उसको याद करने में,
00:30याद तो उसको तब भी नहीं कर सकते,
00:32लेकिन उसको याद करने के प्रेत्न में,
00:35कम से कम जमीनी गौरक धंदे से तो आजाद हो जाओगे,
00:39ये है विधी, उपाय की तरह बताया गया है,
00:41बहुत सूक्ष्म उपाय है,
00:44लेकिन उपाय भी हम पर बिफल हो जाता है,
00:46बताओ क्यों,
00:47क्योंकि हम कभी उसको पूरी तरह याद करते नहीं,
00:52कभी अपनी पूरी शक्ति उसको याद करने में लगाते नहीं,
00:56हमारी शक्ति लगी रहती है,
01:03हम कहते हैं कि हम नाम इस्मरन कर रहे हैं,
01:05तो फिर हम क्या करते हैं,
01:07हम जबते रहते हैं,
01:09कभी सतनाम बोलेंगे,
01:11कभी उंकार बोलेंगे,
01:12कभी कुछ और,
01:13और साथ ही साथ,
01:14मन की सामगरी यथावत पड़ी रहती,
01:17हमने ये कुटिल संतुलन बनाना वह खूबी सीख लिया है
01:21हम दोनों काम एक साथ कर जाते हैं
01:23कोई पूछे का कर क्या रहे हो
01:24तो कहेंगे अभी सुमिरन कर रहे हैं
01:26और उस सुमिरन चल रहा है बहुत उपर उपर सतह पर
01:29नीचे नीचे क्या चल रहा है
01:30नीचे नीचे यही सब बाजार की आद
01:33काम की आद, रुपए पैसे की आद, जाने मन की आद
01:36ये सब चल रहे हैं
01:37ये नहीं हट रहे हैं
01:38उपर उपर उसकी आद, अंदर अंदर तो
01:40हमारा अपना संसार है भई व्यक्तिकत
01:42इसी को फिर साहब कह गए हैं
01:44हाथ सुमरनी, पेट कतरनी, पढत भागवत गीता
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