00:04इसी डिजाइन नहीं होता 50-55 डिगरी के लिए
00:08आप ठीक से सोच पाओ
00:09उसके लिए भी जरूरी है कि शरीर का तापमान एक सीमा में रहे
00:13और शरीर पर जो हवा पड़ रही है जो धूप पड़ रही है
00:16उसका भी तापमान एक सीमा में रहे
00:18जब तापमान उससे हटता है तो आपकी वैचारिक प्रक्रिया भी एकदम बिगड़ जाती है, इंसान का व्यवहार ही बदल रहा
00:27है, इंसान कुछ का कुछ हो जाएगा
00:29पुटा मुटा अंतर नहीं है न, तापमान में चार डिगरी, पांच डिगरी की व्रिद्धी देखी जा रही है, और जितनी
00:34व्रिद्धी देखी जा रही है वो लगातार है, हमारी जो पूरी शारिरिक व्यवस्था है, वो इतने तापमान के लिए इवॉल्व
00:41नहीं हुई है
00:42एवालूशन की पूरी प्रक्रिया में इंसानों को और बाकी प्रजातियों को जीव जनतों को कभी इतना तापमान जहिलना पड़ा ही
00:48नहीं था
00:49यह हमारे शरीर की लिमिट्स से बाहर का है उससे यह नहीं होने वाला कि हमारी खाल जल रही है
00:54हम मास एक्स्टिंशन से पहले मास इंसियनिटी के दौर से गुजरने वाले हैं
00:59हम मरने से पहले पागल होकर मरेंगे विक्षिप्त सब भूम रहे होंगे सडकों पर
01:04पागल अपनी कपड़े फाड़ते हुए बिलकुल तपती हुई सडकों पर निकलेंगे कुछ दूर तक चलेंगे और फिर लाश बनकर जलती
01:12हुई सडक पर ढह जाएंगे
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