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Transcript
00:00पशु बली बहुत प्रचलित हो गई थी एक समय पर हिंदू धर्म में
00:04हिंदू ने खुद समझा कि ये कुरीती है, ये गलत रिवाज है
00:08इसका धर्म की आत्मा से कोई लेना देना नहीं
00:12तो धर्म के नाम पर पशुओं की बली या कुर्बानी हिंदू ने बंद कर दी
00:16पुद ही समझ गए कि इसका धर्म की आत्मा से कोई संबंधी नहीं है
00:21ये तो हमने सपरदस्ती अपने स्वाध के लिए, अपने स्वार्थ के लिए
00:24अपने अज्यानवश एक परंपरा चला रखी है
00:28तो उन्होंने उसको हटा दिया
00:30तो अधिकांच हिंदू शाकाहारी रहे हैं
00:33आज भी दुनिया के शाकाहारीों में ज्यादातर हिंदू ही हैं
00:37हालंकि अब हिंदूओं में भी मासाहार बढ़ गया है
00:39लेकिन फिर भी दुनिया में आज भी जितने लोग शाकाहारी हैं
00:43उनमें से ज्यादा तर हिंदू है, तो वो इसलिए, इसलिए नहीं कि बात परंपरा भर की है, बात मर्म की
00:51है, बात सिथान्त की है, बात दर्शन की है, कोई बात है जो हमें विदान्त ने समझाई है, और जो
00:57विदान्त ने हमें बात समझाई है, उसका सीथा निशकर्ष निकल
01:13को दुख दें, जो उसकी चेतना, वही मेरी चेतना, जो वो चाहता है, वही मैं चाहता हूँ, जो मेरी आखों
01:18की प्यासा, वही उसकी आखों की प्यासा, मैं गरदन कैसे काट दू उसकी, यही वज़ा है कि भारत कभी बहुत
01:23आकरामत नहीं हो पाया, क्योंकि भारत को कुछ ब
01:28जाएगी उसके भीतर की हिंसा हट जाएगी जिसको बात समझ में नहीं आई वो निश्चित रूप से हिंसा करेगा वो
01:34गला काटने में ही यकीन रखेगा
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